प्रमोद महाजन जिनको कहा जाता है भाजपा का पहला चाणक्य

आज़ादी के बाद से जैसे- जैसे वक़्त बदला है, देश का माहौल भी बदला है, और बदली है देश की राजनीति. ये सच है कि जब राजनीति अपना रूप बदलती है, तो बहुत कुछ बदल जाता है. चुनाव की तारीख सामने आती है तो राजनीति के गलियारों में चहल- पहल बढ़ जाती है. पांडाल सजा दिए जाते हैं, और बड़े नेता इन पंडालों में आकर छुटभैये नेताओं को जनता पर जाल फेंकने की ट्रेंनिग देने लगते हैं.

कोई नेता चाहे काम करे या ना करे लेकिन खुद को राजनीति के चरम पर ही पहुंचाना चाहता है; ये कितना भी भ्रष्ट हो, कितना भी दल बदलू हो, लेकिन हर नेता समझता खुद को चाणक्य ही है.

यही वज़ह है कि आज हर राजनीतिक पार्टी के पास अपने अलग चाणक्य हैं. बहुत सी पार्टियों के पास तो दो- दो, तीन- तीन तक हैं. लेकिन आज हम आपके सामने जिस राजनेता की कहानी लेकर आये हैं उसके सामने सच में राजनीतिज्ञ शब्द छोटा पड़ जाता है.

वो एक ऐसे राजनेता थे जिनकी सियासी समझ और ईमानदारी नें उनके नाम को भारतीय राजनीति की बुलंदियों तक पहुंचा दिया. उन्होंने जनता का भला करने के साथ ही अपनी पार्टी की नीव को भी मजबूत किया. पार्टी की तरफ से उन्हें जहां भी भेजा गया वो हमेशा जीत के ही आये.

वो आज अगर हमारे बीच होते तो शायद देश के प्रधानमंत्री होते. क्योंकि काम और सियासी समझ के नाम पर उनके सामने खड़ा होने वाला राजनेता कोई नज़र ही नहीं आता. भारतीय राजनीति में उनका ओहदा ही अलग था.

Source- Aajtak

उनका नाम था प्रमोद महाजन, और लोग उन्हें भारतीय राजनीति का “पहला चाणक्य” कहते थे. 90 के दशक में उनके नाम की आंधी ने विपक्षी दलों के तम्बू उड़ा दिए.

राजनीति से जुड़ा हुआ हर इंसान उनका नाम इज्ज़त किए साथ लेता है, फिर चाहे वो पक्ष का हो या कि विपक्ष का.

90 के दशक में भाजपा की स्थिति काफी मजबूत थी, और भाजपा के पास लाल कृष्ण अडवानी और अटल बिहारी बाजपाई जैसे एक से बढ़कर एक ज़ोरदार वक्ता मौजूद थे. एक फौज थी भाजपा के पास इन ज़ोरदार वक्ताओं की. और इस फौज के बीच भी प्रमोद महाजन सबसे अलग खड़े होते थे.

वो जब भाषण देना शुरू करते थे तो लोग अपनी-अपनी जगहों पर जम से जाते थे.

पत्रकारिता के बाद राजनीति की दुनिया में कदम रखने वाले प्रमोद महाजन का जन्म साल 1949 में 30 अक्टूबर को महबूब नगर, तेलंगाना में हुआ.

अपने कॉलेज के दिनों में वो गोपीनाथ नाथ मुंडे के सहपाठी हुआ करते थे. और दोनों ही अम्बाजोई, महाराष्ट्र के स्वामी रामानंद कॉलेज में एक साथ पढ़ते थे.

साल 1970 में वो सब एडिटर के तौर पर ‘मोद संघ’ के मराठी अखबार तरुण भारत से जुड़े, और एक लंबी राजनीतिक यात्रा तय करने के बाद राजनीति का बड़ा नाम बने. उन्होंने आगे बढ़ने के लिए शॉर्टकट नहीं अपनाए, बल्कि अपनी मेहनत और राजनीतिक समझ के दम पर अपनी पहचान बनाई.

साल 1986 में उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा यानी भाजयुमो का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया था. और यहीं से हुई उनके राजनीतिक सफ़र की शुरुआत. यहाँ से वो एक ऐसे रास्ते  पर चल निकले जहाँ से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा.

भारतीय जनता युवा मोर्चा का अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने ही राजनाथ सिंह को उत्तर प्रदेश भाजयुमो अध्यक्ष बनाया था.

वो प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीतिक सलाहकार भी रहे और संचार मंत्री भी. उन्हें जो भी ज़िम्मेदारी मिली, उन्होंने पूरी ईमानदारी से निभाई. यही वज़ह थी कि वो भारतीय जनता पार्टी में चोटी के नेताओं में गिने जाते थे.

एक वक़्त ऐसा भी आया जब राजनाथ सिंह भाजपा के अध्यक्ष थे, और प्रमोद महाजन पार्टी के महासचिव. लेकिन वो बस कहने भर को ही पार्टी के महासचिव थे, क्योंकि उनकी गिनती पार्टी के सबसे हाईप्रोफ़ाइल नेताओं में होती थी.

पार्टी के लिए डोनेशन इकठ्ठा करना हो, या कि कोई बड़ा आयोजन करना हो, प्रमोद महाजन का नाम सबसे पहले लिया जाता था. ऐसा कुछ होता ही नहीं था पार्टी में जिसमें कि उनका नाम शामिल हो, उनका योगदान ना हो.

बहुत बार अपनी ही पार्टी के नेताओं के साथ उनकी कोल्ड वॉर भी चली. बहुत बार उनका नाम भी चर्चा में आया. लेकिन ये सब राजनीति में आम सा ही है. बहुत कम ही ऐसे नेता होते हैं जो सफल हों, और उनकी किसी से कोल्ड वॉर ना हुई हो.

साल 2005 में भाजपा का रजत जयन्ती आयोजन था, और इसका जिम्मा सौंपा गया था प्रमोद महाजन को. आयोजन के दौरान जब अटल बिहारी वाजपई मंच पर पहुंचे तो उन्होंने लाल कृष्ण अडवाणी को ‘भारतीय जनता पार्टी का राम’ और प्रमोद महाजन को ‘लक्ष्मण’ बताया.

ये एक बड़ी बात थी, और इसके बाद से ही ये चर्चा भी शुरू हो गई कि प्रमोद महाजन को कभी भी पार्टी का अध्यक्ष बनाया जा सकता है. सभी कहते थे कि वो एक लम्बी रेस का घोड़ा हैं, लेकिन प्रमोद महाजन खुद अटल बिहारी वाजपेयी के उस बयान का ये मतलब नहीं निकालते थे कि उनको पार्टी का अध्यक्ष बनाया जाएगा.

साल 2004 में सरकार ने वक़्त से पहले चुनाव करवाने का फैसला लिया, और इस फ़ैसले में प्रमोद महाजन की ख़ास भूमिका रही. इस चुनाव के लिए उन्हें ही भारतीय जनता पार्टी के हाईटेक प्रचार की कमान भी सौंप दी गई.

इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की हार हुई और कहा गया कि हाईटेक प्रचार की वज़ह से ऐसा हुआ है.

करीब 2 साल बाद, 2006 में शनिवार 22 अप्रैल को उनके भाई ने ही उन्हें गोली मार दी. उनके मुंबई स्थित निवास से लेजाकर उन्हें हिंदुजा अस्पताल में भर्ती कराया गया. उनका ऑपरेशन और इलाज तो किया गया, लेकिन इसका नतीजा कुछ नहीं निकला. डॉक्टर्स की जी तोड़ कोशिशों के बाद भी 3 मई, 2006 को उनका निधन हो गया.

देश की राजनीति ने उनके रूप में एक बड़ा, कर्मठ आयर ईमानदार नेता खो दिया. एक ऐसे नेता जो दूसरी पीढ़ी के नेताओं में सबसे ज्यादा सक्रिय, सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहे. अपनी कर्मभूमि मुंबई के अलावा भी पूरे देश भर में पार्टी के सबसे जाने पहचाने चेहरे, प्रमोद महाजन जब दुनिया से गए, तो वो अपनी कर्मभूमि से ही गए.

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