वो संवैधानिक संकट जब राज्यपाल ने बना दिया इस नेता को एक दिन का मुख्यमंत्री

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राजनीति में किसी बात की गारंटी नहीं होती. होनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि ये लोकतंत्र वाला देश है साहब, किसी महंगे ब्रांड का शोरूम नहीं, जहाँ सबकुछ गारंटी के साथ मिले. और बात जब कभी लोकतंत्र की चलती है तब मुझे महशर बदायुनी साहब का एक शेर खुद- ब- खुद याद आता है कि,

अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा.

जब ये शेर याद आता है, तो साथ ही याद आता है साल 1998 और याद आते हैं जगदम्बिका पाल. अपनी 13वीं विधानसभा में उत्तर प्रदेश कपड़ों की तरह मुख्यमंत्री बदल रहा था, और इसी दौरान जगदम्बिका पाल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने थे, एक दिन के मुख्यमंत्री.

Source-Navodaya times

ये वक़्त था उत्तर प्रदेश की 13वीं विधानसभा का. उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन का एक साल पूरा हो चुका था. 17 अक्तूबर 1996 को उत्तर प्रदेश में चुनाव हुआ. नतीजा आया तो पता चला कि 425 सीटों वाली इस विधानसभा में भाजपा ने 173 सीटें हासिल की, सपा को 108 तो बसपा को 66 सीटें मिलीं, और 33 सीटों पर कब्जा जमाने में सफल हुई थी कांग्रेस.

किसी भी पार्टी के पलड़े में उतनी सीटें नही थीं, जिनसे कि सरकार बनाई जा सके. उस वक़्त के राज्यपाल रोमेश भंडारी ने केंद्र को सिफारिश भेज दी कि राज्य में राष्ट्रपति शासन 6 महीने के लिए और बढ़ा दिया जाए.

राष्ट्रपति शासन छह महीने बढ़ाने की मंजूरी मिली और चुनाव के बाद इस विधानसभा का गठन होते ही इसे छह महीने के लिए निलंबित कर दिया गया. उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लग गया. इस विधानसभा ने लोकतंत्र के कुछ ऐसे कारनामों को जिया जिन्हें शायद उत्तर प्रदेश के लोग और उत्तर प्रदेश की राजनीति दोनों ही भुला देना चाहते होंगे.

ये वो वक़्त था जब उत्तर प्रदेश की राजनीति में राजनीति जैसा कुछ नहीं बचा था, कुछ भी ऐसा नहीं रह गया था जो टिकाऊ हो. नेता बार- बार दल बदल रहे थे, खुलेआम विधायकों की बोली लग रही थी, और वो बिक भी रहे थे.

विधानसभा का ये काल ऐसा रहा जिसमें चार मुख्यमंत्री बने. एक बार तो दो दावेदारों ने इस पद के लिए शक्ति प्रदर्शन भी किया. इस शक्ति प्रदर्शन के बाद फैसला हुआ कि असलियत में मुख्यमंत्री कौन है. एक बार तो तो ऐसा भी हुआ कि विधायकों के बीच विधानसभा में मारपीट हो गई. और इस मारपीट को पूरे देश ने टीवी पर देखा भी. बहुत सी ऐसी घटनाएं हुईं इस दौरान जो पहले कभी भी नहीं हुई थीं.

राष्ट्रपति शासन हटा तो 21 मार्च 1997 को शुरुआती 6 महीनों के लिए सरकार बनी बसपा की, और उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं मायावती. विधानसभा अध्यक्ष बनाया गया भारतीय जनता पार्टी के केसरीनाथ त्रिपाठी को. बहुजन समाज पार्टी ने खुद इसके लिए मंजूरी दी. लेकिन ये बहुजन समाज पार्टी का एक ऐसा फैसला था जिसपर पार्टी को बाद में अफ़सोस हुआ था.

Source-New Indian Express

मायावती 6 महीने तक मुख्यमंत्री रहीं, और ये 6 महीने पूरे होने के बाद 21 सितंबर 1997 को भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने. इसके बाद मायावती सरकार ने जो फैसले लिए उनमें से बहुत से फैसलों को बदल दिया गया.

खुले तौर पर एक- दूसरे का विरोध हुआ और 19 अक्तूबर 1997 को बस एक ही महीने में मायावती ने कल्याण सिंह सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया. और सिर्फ दो दिन में ही राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह से कहा कि वो अपना बहुमत साबित करें. और इन दो दिनों में ही उत्तर प्रदेश की राजनीति का पूरा नक्षा ही बदल गया.

बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और जनता दल के बहुत से विधायक अपनी पार्टियों से टूटकर भारतीय जनता पार्टी के समर्थन में आ गए. और फिर तारीख आई 21 अक्टूबर, विधानसभा के अन्दर विधायकों के बीच हाथापाई, मारपीट हो गई. लात- घूंसे चले, जूते- चप्पल चले, एक- दूसरे को दौड़ाया गया, माइक फेंककर मारे गए.

विपक्ष की ग़ैरमौजूदगी में कल्याण सिंह ने 222 विधायकों के साथ अपना बहुमत साबित किया. ये संख्या भारतीय जनता पार्टी के विधायकों की मूल संख्या से 46 विधायक ज्यादा थी. विधानसभा में हुई मारपीट को देखकर राज्यपाल रोमेश भंडारी ने फिर से राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की, लेकिन इस मांग को मंजूरी नहीं मिली.

कल्याण सिंह की खुशी का ठिकाना नहीं रहा. और उन्होंने उन सभी विधायकों को मंत्री बना डाला जो पाला बदलकर उनके साथ आए थे. ये एक इतिहास बन गया कि एकसाथ 93 मंत्रियों के मंत्री परिषद ने एकसाथ शपथ ली. सदन का लगभग हर चौथा विधायक मंत्री हो गया था.

कुछ राजनीतिक पार्टियां थीं जो कल्याण सिंह को कुर्सी से उतारने की कोशिश में लगी हुई थीं.

लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता जगदम्बिका पाल ने इसी दौरान राज्यपाल रोमेश भंडारी के सामने दावा कर दिया किउनके पास सदन का बहुमत है. उनके दावे के बाद राज्यपाल रोमेश भंडारी ने ना कुछ पूछा, ना कुछ बताया, और कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री पद से बर्खास्त कर, 21 फ़रवरी 1998 को रात के साढ़े दस बजे जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी.

राज्यपाल के इस फैसले का जमकर विरोध हुआ. भारतीय जनता पार्टी की नींव अटल बिहारी वाजपेयी लखनऊ में आमरण अनशन पर बैठ गए. कल्याण सिंह उच्च न्यायालय के पास पहुंचे और अगले ही दिन राज्यपाल के आदेश पर स्टे ले आए, और कल्याण सिंह की सरकार को फिर से बहाल कर दिया गया.

जगदम्बिका पाल बिलकुल सुबह- सुबह ही उठकर सचिवालय गए, और मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठ गए. मुख्यमंत्री कल्याण सिंह जब सचिवालय पहुंचे तो देखा कि एक मुख्यमंत्री पहले से उनकी कुर्सी पर डंटे हुए हैं. राज्य सचिवालय में ये एक अजीब सा नज़ारा था, कार्यालय में राज्य के दो-दो मुख्यमंत्री एकसाथ मौजूद थे.

कल्याण सिंह ने जब जगदम्बिका पाल को उच्च न्यायालय का लिखित आदेश दिखाया तब जाकर जगदम्बिका कुर्सी छोड़कर हटे. कल्याण सिंह फिर से मुख्यमंत्री बने और जगदम्बिका पाल एक दिन के मुख्यमंत्री.

इसके बाद भी जगदम्बिका पल माने नहीं और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा. सुप्रीम कोर्ट ने एक बार और शक्ति प्रदर्शन का आदेश दिया. इसी साल 26 फ़रवरी को फिर से शक्ति प्रदर्शन किया गया.फिर से कल्याण सिंह को जीत मिली. और सुप्रीम कोर्ट के सामने भी मुंह की खाने के बाद जाकर जगदम्बिका पाल शांत हुए.

मुख्यमंत्री बने कल्याण सिंह भी बहुत दिनों तक कुर्सी पर बैठे नहीं रह सके.साल 1999 में 13वीं लोकसभा के चुनाव हुए, और इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को झटका लगा. प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के साथ कल्याण सिंह के मतभेदों ने उन्हें पार्टी से निकलवा दिया.

कल्याण सिंह अपना कार्यकाल बीच में ही छोड़कर एक अलग ही पार्टी बनाने निकल पड़े और भारतीय जनता पार्टी ने 12 नवंबर 1999 को पार्टी के एक कम जानेमाने नेता रामप्रकाश गुप्ता को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंप दी.

वो मुख्यमंत्री बने तो पार्टी के ही नेता रामप्रकाश गुप्ता पर भुलक्कड़ होने के आरोप लगाने लगे.उनके बहुत से किस्से भी सुनने को मिलने लगे कि किस तरह वो अपने ही मंत्रियों के नाम भूल जाते थे. पार्टी में उनकी खिलाफत दिन पर दिन बढ़ती देख, दिल्ली से एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता में बदलाव किया गया.

कुर्सी पर आए एक साल भी नहीं हुआ होगा और रामप्रकाश गुप्ता को इस्तीफ़ा देना पड़ा. 28 अक्तूबर साल 1999 को पार्टी के दिग्गज और विश्वसनीय नेता राजनाथ सिंह के हाथ में उत्तर प्रदेश की सत्ता सौंप दी गई.

कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की उस 13वीं विधानसभा ने देश को राजनीति का हर स्तर दिखा दिया. राजनीति कहाँ तक है, और कहाँ तक जा सकती है ये सबके सामने ला दिया. इसने बता दिया कि यहाँ बहुत बार न नाम की चलती है और न काम की.

पार्टियां आज भी वही हैं, राजनीति अब भी वही है, बस अब तरीके बदल गए हैं, वो नेता जो पहले छोटे थे वो बड़े हो गए हैं, उनके नाम दिग्गजों में शुमार हो गए हैं, दल बदलना अब भी जारी है, खरीद- फ़रोख्त अब भी होती ही होगी, लेकिन उन दिनों जो उत्तर प्रदेश में जो देखने को मिला वो फिर दुबारा कभी नहीं दिखा. लेकिन वो जो कुछ भी था, राजनीति के पन्नों में ‘सबसे बुरा दौर’शीर्षक के साथ दर्ज है.

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