वो खुलासा जिसने हिला दीं जाने कितनी सरकारों की बुनियादें

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दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था ,

तालों की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था!

किसी गुमनाम शायर का ये शेर बात करता है उस दौर की जब इंसान आधुनिक नहीं हुआ था और भरोसा ही सबकुछ होता था. ये दौर हमारी आम दुनिया में भी रहा है और सियासत में भी. सियासत के उसी दौर से एक कहानी लाये हैं हम आपके लिए.

ये कहानी है 90 के दशक की. भारतीय राजनीति का वो दौर था जब देश का मीडिया बेहद  ताकतवर और साफ़ हुआ करता था. ये दिन को दिन और रात को रात कहा करता था और सत्ता के बदलने के साथ अपनी कलम की रफ़्तार नहीं बदलता था.

इसी दौर में सामने आया था ‘जैन हवाला काण्ड’ जिसने भारतीय लोकतंत्र की तुरपन खोलकर रख दी. इसने भारतीय राजनीति, चुनाव और नेताओं के सफ़ेद कुर्तों को कालिख से रंग दिया. इसी काण्ड में एक आरोप लगा भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी पर.

उस वक़्त खुद को निर्दोष बताते हुए लाल कृष्ण आडवाणी ने एक प्रतिज्ञा की, और इस प्रतिज्ञा का जो नतीजा आया उसी पर आधारित है हमारी आज की ये कहानी.

साल 1991, कश्मीर के हालात ऐसे ही थे जैसे आज हैं. देश के सुरक्षा बल बुलंद इरादों के साथ घाटी में शान्ति बनाए रखने के लिए दिन-रात मशक्कत कर रहे थे, लेकिन हर बार नाकामी उनके इरादों को पस्त किये दे रही थी. वो ना तो आतंकवादियों पर लगाम लगा पा रहे थे और ना ही उनको भड़काने वाले अलगाववादियों पर. घाटी में अशांति बरकरार थी, अलगाववादी आतंकवादियों को भड़का रहे थे और आतंकवादी देश की छाती पर चढ़कर नाच रहे थे.

दोनों के ही पर काटने का जो एकमात्र तरीका सरकार और देश के क़ानून को नज़र आ रहा था, वो था इनकी विदेशी फंडिंग पर लगाम लगा देना. पूरे देश की पुलिस इसके लिए एकजुट होकर काम कर रही थी.

सन 1991 की 25 मार्च को दिल्ली पुलिस के हत्थे एक बड़ा सुराग लगा. लम्बी भागदौड़ और कई हफ़्तों की मशक्कत के बाद एक कश्मीरी नौजवान अशफाक हुसैन लोन को गिरफ्तार किया गया. ये गिरफ्तारी हुई जमायत-ए-इस्लामी के दिल्ली हेडक्वॉटर से.

पुलिस ने जब अशफाक हुसैन लोन का कॉलर कसा तो उसने नाम कुबूला शहाबुद्दीन गोरी का. दिल्ली पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की और जामा मस्जिद इलाके से इसे भी धर दबोचा. शहाबुद्दीन गोरी JNU से पढ़ाई कर रहा था और अशफाक हुसैन के साथ मिलकर, हवाला की मदद से मिला पैसा आतंकी संगठन ‘जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट’ तक पहुंचाता था.

इन दोनों ने पुलिस हिरासत में दो ऐसे नाम कुबूले जो इन्हें लन्दन और दुबई से पैसा भेजते थे. लंदन से पैसा भेजने वाले का नाम डॉ. अयूब ठाकुर था और दुबई से पैसे भेजने वाला था तारिक भाई. मामला गहराता नज़र आया और नतीज़ा इसका नतीज़ा ये हुआ कि मामले की बागडोर पुलिस से लेकर CBI को सौंप दी गई.

पूछताछ चली, सुराग मिले, मुखबिरी हुई और करीब एक महीने बाद 3 मई को CBI ने ताबड़तोड़ 20 हवाला अड्डों पर दबिश दी. दनादन छापे पड़े और इन्हीं छापों में से एक छपा पड़ा महरौली में सुरेंद्र कुमार जैन के फार्म हाउस पर. सुरेन्द्र कुमार जैन प्रबंध निदेशक थे भिलाई इंजीनिरिंग कॉर्पोरेशन के.

इसके अलावा एक छापा पड़ा सुरेन्द्र कुमार जैन के भाई जे.के. जैन के ऑफिस पर. इस छापे में CBI के हाथ लगा 4 किलो सोना, करीब 50 लाख से ज्यादा देशी रुपया, बड़ी मात्रा में बहुत से अलग-अलग देशों का पैसा और दो डायरियाँ.

तारीख थी 16 जून और साल था 1991, ये छापे पड़े हुए अभी डेढ़ महीना भी नहीं हुआ था कि CBI के DIG ओ.पी. शर्मा सस्पेंड कर दिए गए. उनपर जैन भाइयों के खिलाफ टाडा के अंतर्गत मुकदमा ना बनाने के लिए घूस लेने का इलज़ाम लगा.

घूस की रकम 10 लाख रुपए बताई गई. ओ.पी. शर्मा पर मुकदमा चलने लगा. लेकिन लोग हवाला मामले में पड़े छापों को उनके सस्पेंड होने की वज़ह बताने लगे. लोग उस वक़्त ये अंदाजा लगाने लगे कि इस मामले की जांच को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उन्हें सस्पेंड किया गया है.

मामले को वहीँ पर दबा दिया गया. करीब 2 सालों तक इसपर कोई बात ही नहीं की गई. लेकिन एक बात थी जो अबतक साफ़ नहीं हुई थी कि छापे में वो जो 2 डायरियां मिली थीं उनमें क्या था? उनमें कुछ तो ऐसा था जिसे दबाने की कोशिश की जा रही थी.

साल 1993 में जून की 22 तारीख की बात है. सुब्रमण्यम स्वामी तब जनता पार्टी में हुआ करते थे, पीवी नरसिम्हाराव देश के प्रधानमंत्री थे और लाल कृष्ण आडवाणी नेता प्रतिपक्ष. एक प्रेस कांफ्रेंस में सुब्रमण्यम स्वामी ने लाल कृष्ण आडवाणी पर निशाना साधते हुए कहा कि, लाल कृष्ण आडवाणी ने हवाला कारोबारी एस.के. जैन से 2 करोड़ रुपए लिए हैं, और ये बात वो साबित भी कर सकते हैं. उनके पास सबूत हैं.

Source-Mumbai Mirror

इस प्रेस कांफ्रेंस को कवर करने गए थे जनसत्ता के पत्रकार दिनकर शुक्ल. दिनकर शुक्ल ने सुब्रमण्यम स्वामी के इस दावे पर एक खबर बनाई. लेकिन जनसत्ता के ब्यूरो चीफ रामबहादुर राय को इस खबर से संतुष्टि नहीं मिली.

वो जानते थे कि मामला इतना छोटा नहीं है जिसे ऐसे एक कॉलम की खबर में समेटा जाए. यही वज़ह रही कि वो बयान की तह तक जाने की कोशिश में लग गए. भागदौड़ की, सुब्रमण्यम स्वामी से मिले और अपने किन्ही ‘गुप्त सूत्रों’ से वो डायरियों की फोटोकॉपी हासिल कर लाये.

अगस्त का महीना था. जनसत्ता के दफ्तर में रोजाना जैसी ही चहल-पहल थी. बाहर उमस भरी दोपहर अपना कहर बरसा रही थी और दफ्तर के अन्दर क्राइम रिपोर्टर राजेश जोशी रोज़ की तरह ही अपने काम में लगे हुए थे. ब्यूरो चीफ रामबहादुर राय ने आकर उनकी टेबल पर एक लिफाफा ला पटका. इस लिफ़ाफ़े में थी छापे में बरामद हुई उन्ही 2 डायरियों की कॉपी.

डायरियों की कॉपी हाथ लगने के बाद एक क्राइम रिपोर्टर होने के नाते राजेश जोशी ने इन्हें पढ़ना शुरू कर दिया. इनमें बहुत कुछ था जिसपर स्टोरी बनाई जा सकती थी.

जैन बंधुओं की डायरियों की उस फोटोकॉपी में ये पूरा ब्यौरा दर्ज था कि कि कैसे देश के बड़े नेताओं को हवाला कारोबार से फायदा पहुंचाया जा रहा था. इन डायरियों में पक्ष-प्रतिपक्ष के कई धुरंधर नेताओं के नाम लिखे गए थे जो हवाला रूट से पैसा हासिल करते थे.

इस सब को अगर दरकिनार कर दिया जाये तो इस लिस्ट की जो सबसे खतरनाक बात थी, वो ये थी कि देश के पक्ष और प्रतिपक्ष के नेताओं को वही लोग फंडिंग कर रहे थे जो कश्मीर के आतंकवादियों और अलगाववादियों को पैसा पहुंचा रहे थे.

राजेश CBI दफ्तर के चक्कर लगाते रहे और एकदिन CBI के महानिदेशक के. विजय रामाराव से मिले. इंटरव्यू लिया और कुछ ख़ास सवाल-जवाबों के बाद बहुत कुछ साफ़ हो गया.

डायरी के आधार पर पड़ताल की जाती रही, और जनसत्ता के दफ्तर में विचार होता रहा, विमर्श चलता रहा कि डायरी में मौजूद नामों को छापा जाए या नहीं. लम्बे विचार-विमर्श के बाद भी जब  सहमति नहीं बन पाई तब 17 अगस्त, 1993 को जनसत्ता ने पहली खबर छापी.

इस खबर में किसी के नाम नहीं छपे. मज़ा नहीं आया. सच सामने नहीं आया. और उस वक़्त तक ख़बरों को दबाना मीडिया का काम नहीं हुआ करता था. इसलिए दोबारा विचार-विमर्श हुआ और फैसला लिया गया कि अगली खबर में नाम छापे जायेंगे. 

23 अगस्त 1993 को आए जनसत्ता अखबार ने देश के राजनीतिक महलों की बुनियादें हिला दीं. अखबार के पहले ही पन्ने पर 64 करोड़ की रिश्वत वाले जैन हवाला काण्ड में शामिल सभी नेताओं के नाम छाप दिए गए. खबर की तासीर कुछ इस तरह से थी कि,

“प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव के मंत्रियों, कांग्रेस के एन.डी. तिवारी और विद्याचरण शुक्ल, विपक्ष नेता एल. के. आडवाणी और शरद यादव जैसे बड़े नामों के हवाला काण्ड में शामिल होने के कारण सीबीआई जांच से डर रही है.”

इन नामों के सामने आते ही सरकार के सदनों में आरोपों और प्रत्यारोपों का दौर चल निकला. भाजपा के वरिष्ठ नेता लाल कृष्ण आडवाणी पर 60 लाख रुपए और विद्याचरण शुक्ल पर 39 लाख रुपए लेने का आरोप लगा था.

ख़बर को छपे हुए अभी बस कुछ ही हफ्ते बीते थे कि विनीत नारायण ने सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर कर दी.

मुख्य न्यायाधीश जेएस वर्मा ने फटकार लगाने के बाद सीबीआई को हवाला काण्ड की जांच के आदेश दिए. कोर्ट ने हुक्म दिया तो सीबीआई को मजबूरन हरकत में आना पड़ा और मामले की जाँच तेज़ करनी पड़ी.

मामले ने तूल पकड़ ली और 12 नवंबर, 1994 को एक चर्चित पत्रिका में उन डायरियों में दर्ज 115 नामों को छाप  दिया गया. इसमें कैबिनेट मंत्रियों के अलावा सरकार के सात अन्य मंत्रियों, कांग्रेस के बहुत से नामी नेताओं, दो राज्यपालों, बहुत से सरकारी अफसरों और विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी, विद्याचरण शुक्ल के अलावा और भी बहुत से नेताओं का नाम शामिल था.

लिस्ट में मौजूद कुल 115 नामों में से 92 नामों को पहचान लिया गया, लेकिन बाकी 23 की पहचान नहीं की जा सकी. जिन नेताओं के इस लिस्ट में नाम थे उनपर आरोप लगाया गया कि उन्होंने इस पैसे का इस्तेमाल साल 1991 में हुए लोकसभा चुनावों में किया.

इसके बाद देश के मीडिया ने इस मुद्दे को ख़बरों का केंद्र बना लिया और इसपर दनादन खबरें छपने लगीं. सीबीआई पर और भी दबाव बनने लगा. सुप्रीम कोर्ट का आदेश और मीडिया का दबाव, दोनों अपना काम कर गए. जांच पड़ताल तेज़ हुई मगर फिर भी एक साल और गुज़र गया.

साल 1995 में सीबीआई ने एस.के. जैन को दबोच लिया. जैन की तरफ से सीबीआई को दिये गए 29 पेज के लिखित  बयान से पता चला कि उनकी तरफ से राजीव गांधी को 4 करोड़ रुपये पहुंचाए गए. इस बयान में उन्होंने साफ़ तौर पर लिखा कि, 2 करोड़ रुपये खुद राजीव गांधी का सेक्रेटरी जॉर्ज उनके घर आ के ले गया और 2 करोड़ उन्होंने कांग्रेस के तत्कालीन कांग्रेस के कोषाध्यक्ष सीताराम केसरी को दिए.

जैन ने पीवी नरसिम्हा राव, सतीश शर्मा और चंद्रास्वामी जैसे कई नेताओं तक पैसा पहुंचाने की बात कही. बहुत से नाम लिए उसने लेकिन ये सारे नाम वो थे जो उस लिस्ट में मौजूद नहीं थे. सिर्फ एक राजीव गांधी का ही नाम ऐसा था जो लिस्ट में भी था और उस बयान में भी. लेकिन 1991 में ही राजीव गांधी की हत्या की जा चुकी थी इसलिए उनके खिलाफ कार्रवाई हो पाना मुमकिन नहीं था.

अपने इस बयान में जैन ने ये भी बताया कि किस तरह वो इतालियन बिजनेसमैन क्वात्रोची की मदद से हवाला कारोबारी आमिर भाई से जुड़ा. गिरफ्तारी के 20 दिन बाद ही जैन को ज़मानत पर छोड़ दिया गया. उसके बयानों और दावों को अपुष्ट बताकर उनपर कार्रवाई करने से मना कर दिया गया.

जांच फिर से आगे बढ़ती गई, दिन फिर से बिना कार्रवाई खिसकने लगे. सीबीआई के अधिकारी मामले के बिखरे और टूटे हुए तारों को इधर से उधर जोड़ने की कोशिश करते रहे. लेकिन नतीजा कुछ हाथ नहीं लगा.

दूसरी तरफ वो नेता परेशान थे जिनके नाम लिस्ट में मौजूद थे और अखबार में छपे थे. वो नेता जो सत्ता में थे वो भी घबराए हुए से मालूम होते थे. विपक्ष के नेता लाल कृष्ण आडवाणी के चेहरे पर जांचों के उस दौर में शिकन नहीं नज़र आती थी.

लेकिन 16 जनवरी, 1996 को इस मामले में एक चार्जशीट दाखिल हुई. इस चार्जशीट में सबसे पहले जिन दो नेताओं के नाम आए वो थे लाल कृष्ण आडवाणी और विद्याचरण शुक्ल. इस चार्जशीट के दाख़िल होते ही लालकृष्ण आडवाणी ने लोकसभा से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी और आत्मविश्वास के साथ कहा कि,

“जबतक वो इस पूरे मामले में उनके ऊपर लगाए गए हर बयान से साफ़ बरी नहीं हो जाते हैं तबतक वो ना तो सदन में आयेंगे और ना ही चुनाव लड़ेंगे.”

Source-The quint

लाल कृष्ण अडवानी ने  संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया. अटल बिहारी बाजपेई लाल कृष्ण आडवाणी के बेहद करीबियों में से थे. यही वज़ह थी कि अटल जी उनकी बात कभी नहीं टालते थे, लेकिन इस बार जब अटल बिहारी बाजपेई ने उन्हें इस्तीफा देने से रोकना चाहा तो उन्होंने अटल जी की बात नहीं मानी.

जांच शुरू हुई और एक के बाद एक 25 नेता जांच के दायरे में आते गये. लेकिन जांच में तेज़ी अब भी नहीं आई. इस दौरान ना जाने कितनी बार सीबीआई के अफसरों को मुख्य न्यायाधीश जे.एस. वर्मा से लताड़ सुननी पड़ी.

जे.एस. वर्मा ने सीबीआई को सरकार से दबावमुक्त करने के लिए सीधे कोर्ट के निर्देशों पर काम करने का आदेश दिया. जांच सुस्त होकर अपनी ही रफ़्तार से रेंगती रही, आडवाणी अपनी बात पर टिके रहे और सदन से दूर रहे लेकिन नतीज़ा कुछ भी नहीं निकला.

सीबीआई किसी पर भी आरोप साबित नहीं कर पाई. साल 1997 में अप्रैल की 8 तारीख को हाईकोर्ट के जज मोहम्मद शमीम ने अपना फैसला सुनाते हुए लाल कृष्ण आडवाणी को साफ़ बरी कर दिया. उनके साथ ही बरी हुए कांग्रेस के विद्याचरण शुक्ल.

कोर्ट ने सबूत के तौर पर पेश की गई डायरियों को पक्का खाता मानने से इनकार कर दिया. इन डायरियों को कोर्ट में सबूत के तौर पर स्वीकार ही नहीं किया गया. जस्टिस शमीम ने इन डायरियों को सुबूत मानने से इनकार करते हुए कहा,

“काग़ज़ों के ऐसे पुलिंदे को, जिसमें एक मिनट में काग़ज़ निकाले या जोड़े जा सकते हों, पक्का खाता नहीं कहा जा सकता.”

हाईकोर्ट के इस फ़ैसले पर सीबीआई तुनक गई और इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुँच गई. सबूत के तौर पर सीबीआई के पास अब भी बस वही डायरियां ही थीं. सुप्रीम कोर्ट ने भी ठोस सबूत ना होने की वज़ह से सीबीआई की अपील को खारिज कर दिया और इन दोनों को क्लीन चिट मिल गई.

डायरियों को सबूत नहीं माना गया तो एक के बाद एक बाकी सभी नेता भी मामले में बेदाग़ साबित होते गए. आखिरकार मामले को बंद कर दिया गया. कौन दोषी था और किसको निर्दोष होने के बावजूद भी फंसाने की कोशिश की गई थी ये पता ही नहीं चल सका.

दोषी कोई भी हो लेकिन लाल कृष्ण आडवाणी के भरोसे के साथ दिए गए इस्तीफे ने इतना तो बता ही दिया था कि उन्हें अपने बेदाग़ होने पर भरोसा है. साल 1996 में इस्तीफा दे चुके आडवाणी क्लीनचिट मिलने तक अपने फैसले पर अड़े रहे.

साल 1998 में वो संसद के लिए फिर से चुने गए. एक बार जब चर्चित मीडिया संस्थान के साथ चल रहे इंटरव्यू में पत्रकार ने उनसे सवाल किया,

“क्या आपके इस्तीफे को आपके निर्दोष होने का मापदंड होना चाहिए?”

लाल कृष्ण आडवाणी ने जवाब दिया,

“’मैं अपने बारे में कह सकता हूं, दूसरे क्या करेंगे,उनका क्या मामला है मैं नहीं जानता हूं और मैं उस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता हूं.”

अपने इस्तीफे के बारे में आगे बात करते हुए उन्होंने कहा,

“इस्तीफा देना किसी और का फैसला नहीं था. यह मेरा था. फैसला लेने के तुरंत बाद मैंने इसके बारे में सूचित करने के लिए वाजपेयी को कॉल किया. उन्होंने मुझसे इस्तीफा नहीं देने को कहा, लेकिन मैंने किसी की नहीं सुनी. लोग चुनाव में हमारे पक्ष में मतदान करते हैं इसलिए लोगों के लिए निष्ठा सबसे ज़रूरी है.”

सीबीआई की जांच ने कुछ भी कहा हो, कोर्ट का फैसला जो भी रहा हो, इस्तीफा लाल कृष्ण आडवाणी के साफ़ और बेदाग़ होने का मापदंड हो या ना हो, लेकिन उनके इस फैसले ने उन्हें लिस्ट में मौजूद बाकी सभी नेताओं से अलग लाकर खड़ा कर दिया. उनके इस्तीफे ने ये बताया कि उन्हें इस बात का भरोसा था कि वो निर्दोष हैं. क्योंकि इस्तीफा देने के लिए बाकी के सभी नेता भी तो आज़ाद थे.

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