वो नेता जिसने पीएम को फ़ोन पर किया बेइज्ज़त

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बड़े शायर वसीम बरेलवी कहते हैं कि…

खुद को मनवाने का मुझको भी हुनर आता है,
में वो कतरा हूँ समंदर मेरे घर आता है!

शेर में शायद आपको थोड़ा सा घमंड मालूम पड़े, लेकिन असलियत ये है कि शेर बड़ा ही सच्चा है. और अपने अन्दर घमंड नहीं आत्मसम्मान समेटे हुए है. और कुछ ऐसा ही रवैया रखते थे कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलजारी लाल नंदा.

एक ऐसे राजनेता जो दो बार कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने, लेकिन प्रधानमंत्री कभी नहीं बने. एक ऐसे नेता जो सादगी और उसूलों के साथ जीते रहे, लेकिन उन्हें याद करना, और उनका नाम लेना उन्ही की पार्टी के लोग गवारा नहीं समझते.

सादगी को पाल कर रखना बड़ा मुश्किल है, और ऐसा जब राजनीति में हो तो और भी मुश्किल. लेकिन कुछ नेता हैं जो ना सिर्फ सादगी से जीते हैं, बल्कि सादगी के साथ अपना रुतबा भी बरकरार रखते हैं.

राजनीति में सादगी और रुतबे की ऐसी ही एक मिसाल थे गुलजारी लाल नंदा. 4 जुलाई 1898 को पंजाब के सियालकोट में इनका जन्म हुआ. पंजाब का ये हिस्सा अब पाकिस्तान में आता है. इनके पिता का नाम था बुलाकीराम नंदा तथा माता का नाम था ईश्वरदेवी नंदा.

उन्होंने लाहौर, आगरा और इलाहाबाद से अपनी पढ़ाई की, और इसके बाद इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में ही मजदूर समस्याओं के रिसर्च स्कॉलर के रूप में काम किया. 18 साल की उम्र में उनकी शादी हुई. उनकी धर्मपत्नी का नाम लक्ष्मी देवी था. उनके 3 बच्चे थे. दो बेटे और एक बेटी. साल 1921 में वो मुम्बई के नेशनल कॉलेज में इकोनॉमिक्स के प्रोफेसर बन गए.

देश उस वक़्त आज़ादी के लिए लड़ रहा था. हवाओं में नारे थे और गली- गली में आन्दोलन. गुलजारीलाल नंदा भी इस माहौल की छुअन से अछूते नहीं रहे और साल 1921 में ही असहयोग आंदोलन में शामिल हो गए.

साल 1922 में उन्हें अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन का सचिव नियुक्त किया गया . साल 1932 में सत्याग्रह आन्दोलन के चलते उन्हें पहली बार जेल जाना पड़ा. और फिर इसके बाद भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने की वज़ह से 1942 से 1944 तक का वक़्त भी उन्होंने जेल में ही गुज़ारा.

गुलजारीलाल नंदा साल 1937 से लेकर 1939 तक, और 1947 से लेकर 1950 तक, मुंबई विधानसभा में कांग्रेस के टिकट पर विधायक रहे. इसके बाद 1947 में इन्होने ‘इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस’ यानी इंटक की स्थापना में महत्वपूर्ण कदम उठाया.

गुलजारी लाल नंदा 1950 से लेकर 1953 तक और 1960 से लेकर 1963 तक योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे. इस सब के अलावा उन्होंने गृहमंत्री और श्रम व रोजगार मंत्री की ज़िम्मेदारी भी बखूबी निभाई.

गुलजारी लाल नंदा एक ऐसे नेता थे जो दो बार देश के कार्यवाहक प्रधानमंत्री बने, लेकिन अपने पद का दुरुपयोग उन्होंने कभी नहीं किया. वो कांग्रेस पार्टी से जुड़े हुए उन नेताओं में शामिल थे जिनके नाम की मिसालें दी जाती हैं.

साल 1964 में जब नेहरू जी का निधन हुआ तो 27 मई से लेकर 9 जून तक के लिए उन्हें प्रधानमंत्री बनाया गया. इसके बाद 1966 में जब शाश्त्री जी का निधन हुआ, तब भी 11 जनवरी से 24 जनवरी तक वो प्रधानमंत्री रहे. इसके बाद इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनीं.

कार्यवाहक प्रधानमंत्री बनने के अलावा भी वो बहुत से महत्वपूर्ण पदों पर रहे, कई सालों तक देश और राजनीति की सेवा की, लेकिन इसके बाद भी उनकी बात करने पर, उनकी तारीफ़ में उठती बहुत सी आवाजें हैं जो उनकी सादगी के किस्से कहती हैं.

राजनीति के गलियारों से किस्से बटोरने जाओ तो पता चलता है कि राजनीति का एक बड़ा नाम होने के बावजूद भी, गुलजारी ला नंदा के नाम पर अपनी कोई संपत्ति ही नहीं थी. वो हमेशा किराए के घर में ही रहते रहे.

वो अपनी ईमानदारी से कभी नहीं हिले और ना ही कभी उन्होंने इससे कोई समझौता किया. एक किस्सा है उनकी ज़िंदगी का, जो बताता है कि वो ना तो खुद गलत करते थे और ना ही किसी और को गलत करता देख चुप रहते थे.

वो अपने सिद्धांतों के इतने पक्के थे कि अपनी ही पार्टी की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी खिलाफत कर दी. इंदिरा गांधी ने जब देश में इमरजेंसी लगवाई तब गुलजारीलाल नंदा रेलमंत्री हुआ करते थे. वो इंदिरा गांधी के इस फैसले से नाराज हो गए.

उन्होंने आपातकाल के बाद साफ़ तौर पर चुनाव लड़ने से इंकार कर दिया, और ऐसा कद्दावर नेता अगर यूं एकाएक चुनाव से मुंह फेर ले तो सवाल तो उठेंगे ही. और ये सवाल ना उठें इस डर से बड़ी- बड़ी हस्तियों ने उन्हें मानाने की कोशिश की. इन हस्तियों में राजा कर्णसिंह और खुद इंदिरा गांधी भी शामिल थीं.

वो साल था 1975 जब देश में इमरजेंसी लगा दी गई. इमरजेंसी के कुछ दिन बाद ही गुलजारीलाल नंदा का जन्मदिन था. उनके बहुत से साथी उन्हें बधाई देने के लिए दिल्ली आए थे, और गुलजारीलाल नंदा अपने उन्ही साथियों से बातचीत करने में मशगूल थे. फ़ोन की घंटी बजी और उन्होंने फ़ोन उठाया तो पता चला कि फ़ोन पीएम हाउस से था, और इंदिरा गांधी उन्हें बधाई देने आना चाहती थीं.

गुलजारीलाल नंदा पहले से ही उनसे काफी नाराज़ थे, सो उन्होंने फ़ोन पर दो टूक जवाब दिया,

‘मैंने शुभकामना ले ली, आने की जरूरत नहीं है.’

देश की प्रधानमंत्री और पार्टी की मुखिया को इस तरह जवाब देना बताता है कि उनका गुस्सा कितना था. और उनके कद का पता इस बात से लगता है कि, उनसे इस तरह का जवाब सुनने के बाद भी कुछ ही देर में इंदिरा गांधी उनके घर पहुँच गईं.

ऐसा बताया जाता है कि बंद कमरे में बात करते हुए इंदिरा गांधी ने उन्हें मनाने का प्रयास किया. वो चाहती थीं की गुलजारीलाल नंदा इमरजेंसी के हक़ में कुछ कहें. उन्होंने गुलजारीलाल नंदा से कहा भी कि वो इमरजेंसी पर कुछ कहें.

गुलजारीलाल नंदा ने इंदिरा गांधी को जवाब देते हुए कहा,

‘आपके पिता नेहरू जी ने देश में लोकतंत्र को सींचकर मजबूत बनाया, आपने इमरजेंसी लगा गलत किया.’

उनका जवाब सुनकर इंदिरा गांधी चुपचाप वहां से चली गईं. गुलजारीलाल नंदा चुनाव ना लड़ने के अपने फैसले पर टिके रहे, और इसके बाद उन्होंने फिर कभी भी चुनाव नहीं लड़ा.

गुलजारीलाल नंदा ने कुरुक्षेत्र के लिए बहुत कुछ किया है. लेकिन उनकी राजनीति की शुरुआत कुरुक्षेत्र से नहीं हुई थी. उनके कुरुक्षेत्र पहुँचने का भी अपना एक अलग ही किस्सा है.

साल 1963 के करीब नेपाल के प्रधानमंत्री की मां और मौसी ब्रम्हसरोवर में स्नान करने के लिए कुरुक्षेत्र आईं. लेकिन ब्रह्मसरोवर की खस्ता हालत देखकर वो दुखी हो गईं. उन्होंने दिल्ली जाकर बताया कि ब्रम्हसरोवर की हालत बहुत खराब है, और वहाँ जीर्णोद्वार की ज़रुरत है.

अहमदाबाद से सांसद गुलजारीलाल नंदा तब गृहमंत्री थे. उन्होंने खुद कुरुक्षेत्र जाकर सरोवर के हालातों का जायजा लिया, और ब्रह्मसरोवर के जीर्णोद्वार के लिए अपने शिष्य और पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल से कहा.

बंसीलाल ने उन्हें जो रास्ता सुझाया वो था कैथल लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का. गुलजारीलाल नंदा को उनका ये सुझाव पसंद आया और साल 1967 का चुनाव उन्होंने यहाँ से ही लड़ा, उन्होंने ऑटो से अपना प्रचार किया, और स्वतंत्र पार्टी के इंद्रसिंह को हराकर सांसद की कुर्सी संभाली. इसके बाद साल 19 71 में भी उन्होंने इंद्रसिंह को हराकर सीट को अपने नाम कर लिया.

वो हमेशा ही फिजूलखर्ची खिलाफ थे. राजनीति में होते हुए भी उन्होंने कभी पार्टी का फालतू पैसा नहीं खर्च नहीं किया. वो जब कुरुक्षेत्र जाते तो नाभाहाउस के साधारण से कमरों में ही रुकते.

साल 1967 के बाद से वो अपना ज्यादातर वक़्त कुरुक्षेत्र में ही गुजारते थे. अपने निजी कामों के लिए वो कभी सरकारी गाड़ी का इस्तेमाल नहीं करते थे. जब वो गृहमंत्री थे तब उनकी बेटी डॉ. पुष्पा यूनिवर्सिटी में फॉर्म भरने के लिए सरकारी गाडी ले गईं. गुलजारी लाल नंदा को जब ये बात पता चली तो वो नाराज़ हो गए. और साथ ही उन्होंने आवास से यूनिवर्सिटी तक की दूरी का पूरा किराया अपनी तरफ से सरकार को भरा.

उन्होंने पैसों का कभी मोह नहीं किया और नतीजा ये हुआ कि ज़िंदगी के आखिरी पड़ाव पर उन्हें पैसों की अच्छी-खासी किल्लत से जूझना पड़ा, और इन्ही कारणों के चलते जीवन के आख़िरी दिनों में उन्हें पहली बार स्वतन्त्रता सेनानियों को मिलने वाली पेंशन के लिए आवेदन करना पड़ा.

बाहरवाले तो दूर उन्होंने कभी अपने बेटों नरिंदर नंदा और महाराज कृषेण नंदा के सामने भी पैसों के लिए हाथ नहीं फैलाया. उनके पास जब पैसों की बहुत तंगी हुई तो उनके एक दोस्त शीलभद्र याजी ने उन्हें सलाह दी कि वो स्वतंत्रता सेनानियों को मिलने वाली पेंशन के लिए आवेदन कर दें.

शीलभद्र जी ने जब बहुत जोर दिया तब जाकर गुलजारीलाल नंदा ने 500 रुपए के स्वतन्त्रता सेनानी भत्ते के लिए पहली बार आवेदन किया.

गुलजारीलाल की जिंदगी से किसी के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि भ्रष्टाचार से उनका कितनी दूर का नाता है. उन्होंने ना कभी भ्रष्टाचार किया और ना पद-प्रतिष्ठा की लालच में कभी भ्रष्टाचार सहा. वो अक्सर कहा करते थे कि,


‘भ्रष्टाचार खत्म करने के लिए पहले नेताओं को ही अपना व्यवहार सुधारना होगा.’

इंदिरा गांधी जब देश की प्रधानमंत्री थीं तब गुलजारीलाल नंदा गृहमंत्री हुआ करते थे. वह 19 अगस्त साल 1963 से लेकर 14 नवंबर साल 1966 तक देश के गृहमंत्री रहे.

वो भ्रष्टाचार को ख़त्म करने के लिए किसी क्रान्ति की उम्मीद नहीं करते थे. वो ये नहीं कहते थे कि भ्रष्टाचार के बिना एक अलग दुनिया बना ली जाए, लेकिन इंदिरा गांधी के इमरजेंसी लगाने के बाद देश में जब दोबारा चुनाव हुआ तब सरकार बनी जनता पार्टी की और प्रधानमंत्री बने मोरारजी देसाई.

तब गुलजारीलाल नंदा ने जनता पार्टी के नेताओं को निशाना बनाते हुए खुद कहा कि,

“जनता पार्टी के लोग अपनी संपत्ति की घोषणा करने की बात कई बार कह चुके हैं लेकिन उन्होंने अभी तक ऐसा किया नहीं है.”

साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि,

‘राजनीति में भ्रष्टाचार दाल में नमक के बराबर हो तो चल जाता है. लेकिन यहां दाल ही पूरी भ्रष्टाचार से भरी है.’

राजनेता होने के अलावा गुलजारीलाल नंदा एक लेखक भी थे.

उन्होंने सम ऑस्पेक्ट्स ऑफ खादी, अप्रोच टू द सेकंड फाइव ईयर प्लान, गुरु तेगबहादुर: संत एंड सेवियर, और हिस्ट्री ऑफ एडजस्टमेंट इन द अहमदाबाद टेक्सटाइल्स जैसी कई किताबें भी लिखीं.

उनकी ज़िंदगी के बारे में पढ़ते हुए, उनके बारे में जानते हुए हमने जो समझा, उससे बस इतना ही पता चला कि,उनमें वो सबकुछ था जो एक अच्छे राजनेता में होना चाहिए. लेकिन हमारे देश की राजनीति का एक कड़वा सच ये भी है कि,

“वो जो सच में नेता रहे हैं उनका नाम एक दिन हम भूल जाएंगे, हमें जो याद रह जायेंगे वो नेता हैं नहीं बल्कि नेता बनाए गए हैं.”

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