EVM, चुनाव , VVPAT के बारे में आप नहीं जानते होंगे इन बातों को

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लोकसभा चुनाव की घोषणा और चुनाव आचार संहित लगने के बाद राजनीतिक पार्टियों पर एक लगाम सी लग जती है. एक तरफ सरकार अपनी उपलब्धियों को गिनवाती है वहीं दूसरी ओर विपक्ष उनकी खामियों को. वैसे तो सरकार ने काफी अच्छे काम किये हैं . चाहे वो भारत को डिजिटल इंडिया के तहत जोड़ना हो या फिर आतंकी हमलों का बदला लेना . सरकार ने शिक्षा,स्वच्छता, स्वस्थ, यातयात ,बिजली ,पानी और विकास के हर पहलुओं पर काम किया . लेकिन EVM पर काम नहीं कर सके . इसलिए तो आज से नहीं 2014 से ही विपक्ष EVM को गलत ठहराने में लगे हुए है.

सुप्रीम कोर्ट ने 21 विपक्षी दलों की उस याचिका पर चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है जिसमें मांग की गई थी कि आगामी चुनावी नतीजों से पहले 50 फीसदी वोटिंग की जांच बैलेट पेपर से कराई जाए। गुरुवार को 21 विपक्षी दल सुप्रीम कोर्ट पहुंचे थे जहां उन्होंने अपनी मांग को लेकर याचिका दायर की थी। कई विपक्षी दल ईवीएम में गड़बड़ी की शिकायत करते रहे हैं और बैलैट पेपर से चुनाव कराए जाने की मांग उठाते रहे हैं।

वैसे थोड़ा अटपटा सा लग रहा है जहाँ एक तरफ हम पुरे भारत को digitalise कर रहे वहीं दूसरी ओर बैलेट पेपर से वोटिंग की मांग कर रहे हैं . वैसे कुछ सवाल हैं, EVM से जुडें जिन्हें हम सब को समझना बहुत जरूरी हो गया है . तो आइये जानतें है क्या है वो सवाल :

पहला सवाल – क्या है EVM ?

इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानि की EVM वोट डालने की मशीन है जो की नाम से ही ज़ाहिर हो गया है. इसके दो हिस्से होते हैं एक हिस्सा होता है बैलट यूनिट और दूसरा हिस्सा होता है कंट्रोल यूनिट . बैलेट यूनिट के ज़रिये मतदाता अपना वोट डालते है वहीं कण्ट्रोल यूनिट जो की पोलिंग अफसरों के पास होती है . वैसे तो EVM हमेशा से विवादों के घेरे में रही है लेकिन चुनाव आयोग ने हमेशा से इसे बेदाग़ साबित किया है .

दूसरा सवाल- किस तरीके से काम करती है ये EVM ?

EVM की बनावट ही कुछ ऐसी है कि बिना पढ़े लिखे लोग भी इससे वोट डाल सकते है. EVM में अंतिम बटन ‘नोटा’ या ‘ऊपर दिए नामों में से को कोई नहीं’ का होता है. कंट्रोल यूनिट में वोट दर्ज हो जाते हैं. ईवीएम का ये हिस्सा पोलिंग ऑफ़िसर के पास रहता है. किसी भी वोटर के वोट देने से पहले पोलिंग अफ़सर बैलट बटन दबाकर मशीन को वोट दर्ज़ करने के लिए तैयार करता है. हर बैलट बटन के पास एक स्पीकर भी होता है. जो हर वोट के सही ढ़ंग से दर्ज होने के बाद तेज़ आवाज़ करता है.

तीसरा सवाल – क्या है VVPAT?

वोटर वेरीफ़ाएबल पेपर ऑडिट ट्रेल यानी वीवीपैट (वीवीपीएट) व्यवस्था के तहत वोट डालने के तुरंत बाद काग़ज़ की एक पर्ची बनती है.  इस मशीन की मदद से वोट डालने के तुरंत बाद एक पर्ची निकलती है जिससे यह पता लगता है कि वोट किसको डाली है . अगर अलग शब्दों में  कहे तो यह मशीन ये बताता है कि मद्दत ने किस उमीदवार को वोट दिया है. ये इंतजाम इसलिए किया गया है ताकि ये पता चल सके कि वोट देने वाले को पता रहे कि उसका वोट सही जगह पड़ा है. इसे भेल ने साल 2013 में तैयार किया था. इसका पहली बार इस्तेमाल 2013 में नगालैंड के विधानसभा चुनाव में किया गया था. अभी चुनाव नतीजों के दौरान एक विधानसभा सीट पर एक ईवीएम के मतों का वीवीपैट पर्चियों से मिलान किया जाता है. अब राजनीतिक दलों का कहना है कि इस दायरा बढ़ाया जाना चाहिए.

 चौथा सवाल-  क्या चाहते है ये राजनीतिक दल ?

ये राजनीतिक दालें चाहती है कि VVPAT की पर्चियों को EVM मशीन से वेरीफाई किया जाए . हालांकि यह प्रक्रिया काफी लम्बी हो सकती है . इसके लिए 21 राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है.

पांचवा सवाल – कौन है ये राजनीतिक दल जो EVM से VVPAT को वेरीफाई करवाना चाहते हैं ?

इस मामले में कांग्रेस, चंद्रबाबू नायडू की तेलुगु देशम पार्टी, शरद पवार की एनसीपी, अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी, वामपंथी पार्टियां, समाजवादी पार्टी और मायावती की पार्टी बसपा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बता दें कि इस लोकसभा चुनाव में ईवीएम के साथ हर मतदान केंद्र पर वीवीपीएटी का भी इस्तेमाल किया जाएगा। चुनाव आयोग विपक्ष की इस मांग को पहले ही नकार चुका है जिसके बाद अब राजनीतिक दलों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

छठा सवाल सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा नेताओं की याचिका पर ?


सुप्रीम कोर्ट ने अभी चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया. बेंच की अध्यक्षता कर रहे चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने इस बाबत कोर्ट की सहायता के लिए चुनाव आयोग से एक वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त करने को कहा है. मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी.

सातवां सवाल-विपक्षी दल का ईवीएम पर सवाल खड़े करने का कारण ?


विपक्षी दल इस मुद्दे को लेकर बीते कई महीनों से अभियान चला रहे हैं. 4 फरवरी, 2019 को चुनाव आयोग को लिखे पत्र में विपक्षी पार्टियों ने ऐसी ही गुजारिश की थी. इस दौरान मांग की गई थी कि ऐसे चुनाव क्षेत्र में जहां जीत-हार का अंतर 5 फीसदी या इससे कम हो, वहां ईवीएम और वीपीपैट की पर्चियों का मिलान जरूरी किया जाए. विपक्षी दल दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश और तेलंगाना में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान कुछ क्षेत्रों में मतों का मिलान न होने का मसला भी उठा रहे हैं. ये दल साल 2014 में जबसे मोदी सरकार बनी है तब से आरोप लगाते आ रहे हैं कि सत्ताधारी पार्टी बीजेपी अपने पक्ष में ईवीएम से छेड़छाड़ कर रही है. ये बात और है कि चुनाव आयोग हमेशा कहता रहा है कि ईवीएम की हैकिंग या रीप्रोग्रामिंग नहीं की जा सकती है.

बहरहाल अब देखते है कि सुप्रीम कोर्ट इस याचिका पर क्या सुनवाई करती है और अगर इसके पक्ष में निर्णय आता है तो क्या विपक्ष फिर भी शांत बैठेगा या कोई और मुद्दा सामने ला खड़ा कर देगा. हालांकि यह प्रक्रिया काफी लम्बी होगी और यह निश्चित नहीं सरे वोट वेरीफाई हो पाएँगे भी या नहीं.