कश्मीर पर बहुत उछल रहा था तुर्की, पीएम मोदी ने ऐसे सिखाया सबक

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कश्मीर पर अकेले पड़ चुके पाकिस्तान को तुर्की का सहारा मिला है. UN जनरल असेम्बली को संबोधित करते हुए तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन ने पाक के प्रोपगैंडा को हवा देने की कोशिश की और कश्मीर की फ़िक्र का दिखावा किया तो तुर्की को पीएम मोदी ने उसी की भाषा में जवाब दिया.

तुर्की को सबक सिखाने के लिए पीएम मोदी ने ऐसा कुटनीतिक दांव चला कि तुर्की तिलमिला जाएगा. UN के जनरल असेम्बली को संबोधित करने के बाद पीएम मोदी ने तीन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से मुलाक़ात की. ये तीन देश थे- साइप्रस, आर्मेनिया और ग्रीस. इन तीन देशों के राष्ट्राध्यक्षों के साथ पीएम मोदी की मुलाक़ात के गहरे मायने हैं. तुर्की का इन तीनों ही देशों के साथ विवाद का लम्बा इतिहास रहा है.

तुर्की और साइप्रस का झगड़ा

अगर आप साइप्रस के नक़्शे पर नज़र डालें तो बीचों बीच एक लकीर दिखाई देगी जो उसे दो हिस्सों में बांटती है. ये लकीर साइप्रस को एक नासूर कि तरह चुभता है. ये जो लकीर है वो बफर जोन है और संयुक्त राष्ट्र के अधीन है. इसे ग्रीन लाइन भी कहते हैं. इस बफर जोन की लम्बाई 180 किलोमीटर है और चौड़ाई साढ़े सात किलोमीटर. इस जोन के उत्तर का क्षेत्र यानी उत्तरी साइप्रस तुर्की के नियंत्रण में है जबकि दक्षिणी हिस्सा साइप्रस है. 1974 में तुर्की की सेना ने साइप्रस पर हमला कर के इसके एक हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया था. ये हिस्सा एकीकृत साइप्रस का 40 प्रतिशत है. इस पर अधिकार के साथ ही तुर्की ने इस क्षेत्र को टर्किश रिपब्लिक ऑफ नॉर्दन साइप्रस का नाम दिया.

संयुक्त राष्ट्र असेम्बली में अपने भाषण के तुरंत बाद पीएम मोदी ने साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस अनास्तासियादेस से मुलाक़ात की और साइप्रस की स्वतंत्रता, संप्रभुता और क्षेत्रीय स्वायत्ता पर जोर दिया. ये मुलाक़ात तुर्की के राष्ट्रपति को असहज करने वाली थी क्योंकि अगर तुर्की कश्मीर पर पाकिस्तान का साथ देगा तो भारत भी स्वतंत्र और एकीकृत साइप्रस की बात करेगा.

तुर्की और आर्मेनिया का झगड़ा

पीएम मोदी ने आर्मेनिया के प्रधानमंत्री निकोल पशिन्याँ से भी मुलाक़ात की और भारत और आर्मेनिया के बीच द्विपक्षीय सम्बन्धी को मजबूत करने पर जोर दिया. अगर दुनिया के नक़्शे पर नज़र डालें तो तुर्की के पड़ोस में एक बहुत ही छोटा सा देश दिखेगा आर्मेनिया. तुर्की और आर्मेनिया की दुश्मनी करीब 1 सदी पुरानी है.. साल 1915 से 1918 के बाच प्रथम विश्व युद्ध के दौरान तुर्की के तत्कालीन ऑटोमन साम्राज्य ने आर्मेनिया के लोगों को उनके घरों से निकालने को लेकर अभियान चलाया था. इस दौरान करीब 15 लाख आर्मेनियाई  नागरिकों का नरसंहार किया गया लेकिन तुर्की ने कभी इसे नरसंहार माना ही नहीं. तुर्की आज भी कहता है कि ये लोग नरसंहार में नहीं बल्कि अकाल और महामारी में मारे गए थे. तब से आर्मेनियाई लोगों के दिल में तुर्की के लिए नफरत है. कभी भी दोनों पडोसी देशों के बीच अच्छे सम्बन्ध नहीं रह पाए. अब पीएम मोदी ने तुर्की पर लगाम कसने के लिए आर्मेनिया के साथ भारत के द्विपक्षीय रिश्तों को मजबूत करने की पहल की है.

तुर्की और ग्रीस का झगड़ा

पीएम मोदी ने ग्रीस के प्रधानमंत्री किरियाकोस मित्सोताकिस से भी मुलाकात की और दोनों देशों के बीच रिश्ते मजबूत बनाने पर जोर दिया. अगर नक़्शे पर देखें तो ग्रीस और तुर्की के बीच लम्बी समुद्री सीमा है और ये समुद्री सीमा ही दोनों देशों के बीच विवाद का कारण है. वैसे तुर्की और ग्रीस के बीच विवाद का इतिहास काफी पुराना है. ग्रीस को 1832 में ग्रीस को तुर्की से आज़ादी मिली. उसके बाद दोनों देश अब तक चार बार युद्ध लड़ चुके हैं.

बात करें भारत और तुर्की के रिश्तों की तो हालाँकि तुर्की खुद को भारत का दोस्त कहता है लेकिन हमेशा खुल कर पाकिस्तान का साथ देता है. तुर्की ने न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (NSG) में भारत की सदस्यता का यह कहकर विरोध किया था कि इस्लामाबाद को सदस्यता दिए बगैर नई दिल्ली को ग्रुप में एंट्री न दी जाए. ग्रीस, आर्मेनिया और साइप्रस के प्रमुखों से पीएम मोदी की मुलाकातों का कूटनीतिक उद्देश्य तुर्की के राष्ट्रपति को ये साफ़ सन्देश देना था कि वो भारत के आंतरिक मामले से दूर रहे वरना तुर्की के लिए मुश्किल हो जायेगी.