लोगों की नही रास आ रहा है सपा-बसपा का गठबंधन, ये रही रिपोर्ट

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लोगों को सपा और बसपा का गढ़बंधन रास क्यों नही आ रहा है? क्यों इस गठबंधन से लोगो में नाराजगी है?
उत्तर प्रदेश में लोकसभा चुनाव से पहले सपा और बसपा के बीच गठबंधन हो गया है. सालों से चली आ रही राजनैतिक और व्यक्तिगत खटास को किनारे धकेल अब बुआ और बबुआ साथ में चुनाव लड़ेंगे. दोनों ने एक दुसरे को अपनाने में देर नही लगायी लेकिन यहाँ सवाल ये खड़ा होता हो कि दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता आखिर किस हद तक इस गठबंधन को अपना पायेंगे?
सोशल मीडिया पर लोग सवाल उठा रहे हैं कि ऐसा कौन सा तूफ़ान आ गया था, ऐसा कौन से सुनामी आ गयी थी और कौन सी आफत आ गयी थी कि दो कट्टर दुश्मन को एक होने पर मजबूर होना पड़ रहा है. लोग तो यह भी कह रहे हैं कि यह गठबंधन ना तो देशहित में हैं और ना प्रदेश हित में हैं…ये गठबंधन सिर्फ स्वार्थ हित में हुआ है.


मायावती और अखिलेश दोनों अपनी इज्जत बचाने के लिए गठबंधन करने पर मजबूर हुए हैं. लोग तो यहाँ तक कह रहे हैं कि जो अपने बाप का नही हुआ वो मायावाती का क्या होगा?
राजनीति में इंसान कितना गिर सकता है इस बात का अंदाजा भी नही लगाया जा सकता. लोग तो यह भी कह रहे हैं कि ये ये गठबंधन आगे नही चल पायेगा.
सपा के कार्यकर्ता बसपा सुप्रीमों की मूर्ति तोड़ते थे. दोनों पार्टियां एक दुसरे की धुर विरोधी थी लेकिन आज ऐसा समय आ गया है कि एक दूसरे को आँख दिखाने वाली पार्टी एक साथ गठबंधन करने पर मजबूर हो रही है.

कहा जाता है कि दिल्ली तक पहुँचने का रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर ही गुजरता है. ऐसे में उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी जीत के लिए सभी पार्टियों की नजर होती है. ऐसे में 2014 में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बनाकर उभरी थी और नरेद्र मोदी बहुमत के साथ दिल्ली की सत्ता पर बैठे. अखिलेश यादव पारिवारिक कलह के बाद प्रदेश की सत्ता से हाथ धो बैठे और अब लोकसभा चुनाव पर नजर गड़ाये बैठे हैं. हालाँकि इस बार हाथी, साइकिल पर सवार होकर बड़ी जीत की उम्मीद से चुनाव में उतर रही हैं. अब देखने वाली बात तो यह है कि अपने कार्यकर्ताओं की नाराजगी झेल रही दोनों पार्टियाँ मिलकर कितनी सीटें जीतने में कामयाब होती है.


अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव और मायावती ने भी गठबंधन किया था लेकिन वो गठबंधन ज्यादा दिन तक नही चल सका…अब बीजेपी और मोदी को सत्ता से हटाने के लिए सपा-बसपा को गठबंधन करने पर मजबूर हुए हैं. याद दिला दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में सपा सिर्फ खानदानी सीट बचाने और बसपा तो पूरी तरफ साफ़ हो चुकी थी.