पार्टियाँ जो कभी कांग्रेस के साथ तो कभी बीजेपी के साथ!

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2019 लोक सभा चुनाव नजदीक हैं. भारत के ज़्यादातर राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ हैं जिनकी भूमिका केंद्र में सरकार बनाने में बहुत अहम होती है. इस बार भी माहौल कुछ ऐसा ही है. केंद्र में सरकार बनाने के लिए महा गठबंधन बन रहे है. कहीं कहीं तो क्षेत्रीय पार्टियों का महा गठबंधन ही राष्ट्रीय पार्टियों को गठबंधन से बाहर कर रहा है.

तो आज बात करते हैं कुछ ऐसी पार्टियों के बारे में जो कभी कांग्रेस से तो कभी बीजेपी से गठबंधन करके इन राष्ट्रीय पार्टियों को समर्थन देती है वाही इनकी मुश्किलें भी बड़ा देती हैं. राष्ट्रीय स्तर पर गठबंधन करने वाली करीब 35 पार्टियाँ हैं जिनमें से 9 पार्टियाँ कभी कांग्रेस के साथ जाती है तो कभी बीजेपी के साथ.

पिछले चार लोक सभा चुनावों को देखा जाये तो तमिलनाडु कि चार प्रमुख राजनीतिक पार्टियाँ इस खेल में सबसे आगे हैं. ये पार्टियाँ कांग्रेस, बीजेपी के साथ साथ तीसरे मोर्चे तक का समर्थन कर चुकी हैं. इतना ही नहीं चुनावी नतीजे अगर ठीक नहीं आते तो ये पार्टियाँ अगले चुनाव में अपना अलायन्स पार्टनर ही बदल लेती हैं.

1999 में एमडीएमके, डीएमके, और पीएमके तमिलनाडु में 31 सीटो के साथ बीजेपी की एनडीऐ सरकार का हिस्सा थे. वही एआईएडीएमके 10 सीटो के साथ कांग्रेस के साथ थी.लेकिन अगले 2004 लोक सभा चुनावों में एमडीएमके, डीएमके, और पीएमके युपीए सरकार में कांग्रेस के साथ चली गयी वही एआईएडीएमके 10 सीटो के साथ बीजेपी के एनडीऐ के साथ गठबंधन में शामिल थी.

युपीए के साथ गयी पार्टियों को तो ज्यादा सीटें मिली लेकिन एआईएडीएमके अपना खाता तक नहीं खोल पाई.
2004 में एक भी सीट नहीं मिलने पर एआईएडीएमके ने 2009 में तीसरे मोर्चे से हाथ मिला लिया और 9 सीट जीत गयी. इसके बाद एआईएडीएमके ने 2014 में अकेले चुनाव लड़ा और 39 में से 37 सीट जीत ली. एनडीऐ के साथ चुनाव लड़ने वाली अन्य तमिल पार्टियों को सिर्फ दो सीटे ही मिली जिसमें बीजेपी और पीएमके को एक एक सीट ही मिली. इस बार एआईएडीएमके एक बार फिर बीजेपी के एनडीऐ गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने जा रही है.

पीएमके भी एनडीए, यूपीए, थर्ड फ्रंट और एनडीए के बाद फिर से 2019 बीजेपी नित एनडीए गठबंधन के साथ चुनाव लड़ने जा रही है.1999 में तमिलनाडु कि सबसे बड़ी पार्टी डीएमके ने एनडीए के साथ चुनाव लड़ा था वही 2004 में डीएमके यूपीए के पाले में चली गयी थी और 16 सीटो पर जीत हासिल की. 2014 में डीएमके ने एआईएडीएमके कि तरह अकेले चुनाव लड़ा और एक भी सीट नहीं जीत पाई. लेकिन डीएमके 27 सीटो पर दूसरे नम्बर कि पार्टी थी.

एमडीएमके भी 1999 में एनडीए, 2004 में यूपीए और 2009 में थर्ड फ्रंट और फिर 2014 में एनडीए के साथ चुनाव लड़ी. 2014 में मोदी हवा के बावजूद एमडीएमके तमिलनाडु में खाता तक नहीं खोल पाई थी.
वही बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने 1999 और 2004 में एनडीए के साथ मिल के चुनाव लड़ा. पहली बार तृणमूल कांग्रेस को आठ सीटे मिली लेकिन दूसरी बार सिर्फ दो सीटे. वही 2009 में तृणमूल कांग्रेस ने यूपीए से हाथ मिलाया और उन्नीस सीटों पर जीत हासिल की. इसके बाद तृणमूल कांग्रेस ने 2014 में किसी के साथ गठबंधन नहीं किया और वो 42 में से 34 लोक सभा सीट जी गयी. वही 2019 में तृणमूल कांग्रेस महागठबंधन का हिस्सा बन सकती है.

बिहार कि लोक जनशक्ति पार्टी यानी एलजेपी के नेता राम विलास पासवान भी कांग्रेस बीजेपी की केंद्र कि सरकार में कई बार शामिल हो चुके हैं. एलजेपी 2004 में यूपीए के साथ चुनाव लड़ी थी और चार सीट जीती थी. वही 2009 में एलजेपी ने लालू यादव और सपा की और से बनाये चौथे मोर्चे के साथ चुनाव लड़ा लेकिन कोई भी सीट नहीं जीत पाई. हार के बाद 2014 में एलजेपी बीजेपी के साथ गठबंधन कर के चुनाव लड़ी और सात में से छह सीटे हासिल कर ली.

राष्ट्रीय लोक दल की भी कहानी कुछ ऐसी ही है. लेकिन रालोद ने जिस पार्टी के साथ गठबंधन किया वो कभी सत्ता तक पहुँच ही नहीं पाई. 1999 में रालोद ने कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन यूपीए से हाथ मिला लिया जबकि 2009 में वे एनडीए पास पहुँच गयी. इस बदलाव से सीटे 2 से बढ़कर 5 तो ज़रूर हुई लेकिन समर्थन वाला गठबंधन सत्ता तक नहीं पहुँच पाया. इसके बाद 2014 में रालोद फिर से यूपीए के साथ आई लेकिन उसे एक भी सीट पर जीत नहीं मिली. वर्तमान में रालोद 2019 लोक सभा चुनावों में सपा और बसपा के गठबंधन में शामिल है और तीन सीटो पर चुनाव लड़ रही है.

महाराष्ट्र में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया का भी रिकॉर्ड कुछ ऐसा ही है. 2004 में और 2014 में आरपीआयी यूपीए का हिस्सा रही, जहाँ 2009 में पार्टी को कोई सीट हासिल नहीं हुई. 2014 में रिपब्लिकन पार्टी ऑफ़ इंडिया एनडीए के साथ चुनाव लड़ी लेकिन इस बार भी आरपीआयी को कोई सीट नहीं मिली.

वही उत्तर पूर्वी क्षेत्र में भी एक ऐसी पार्टी है जो कभी कांग्रेस के साथ तो कभी बीजेपी के साथ चुनाव लड़ती रही है. अरुणाचल कांग्रेस 1999 में एनडीए के साथ चुनाव लड़ा लेकिन जब कोई सीट नहीं मिली तो 2004 में यूपीए के साथ आ गयी. लेकिन जगह बदलने के बाद भी पार्टी को कोई सीट नहीं मिली.

लोक सभा चुनाव 2019 अब बहुत नज़दीक है और कई प्रदेशों में गठबंधन बन रहे है. देश के सबसे बड़े सूबे में तो सपा बसपा और रालोद ने कांग्रेस को बाहर का रास्ता दिखा दिया है. प्रधानमंत्री मोदी देश के वर्तमान में सबसे लोकप्रिय नेता है. वही विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती ये रहेगी कि वे नरेन्द्र मोदी के खिलाफ किसी प्रबल दावेदार को चुनाव में उतारे क्योंकि ज़ाहिर है अगर महागठबंधन चाहता है कि उससे जनता का समर्थन मिले तो महागठबंधन के नेताओं को जनता के बीच नरेन्द्र मोदी के विकल्प को भी रखना पड़ेगा.