पंडित दीनदयाल उपाध्याय की मौत का राज़

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पंडित दीनदयाल उपाध्याय, ये नाम आपने कई जगह सुना होगा। इस नाम पर कई स्कूल, कॉलेज, सरकारी स्कीम्स, अस्पताल, आदि  भी सुने होंगे। 25  सितम्बर को उनकी जयंती भी मनाई गई। सोशल मीडिया और अन्य जगहों पर भी अपने उनका नाम सुना होगा। आप सोचते होंगे आखिर पंडित दीनदयाल कौन हैं? चलिए आज आपको पंडित जी के बारे में बताए, पंडित जी का जन्म 25 सितंबर 1916 को हुआ था। भारतीय जनसंघ सह -संस्थापक थे। नरेंद्र मोदी से लेके अटल बिहारी तक, पंडित जी सबके लिए एक आइडल थे। पंडित जी ने देश को कई विचारधाराएं दी हैं जिनमें एकात्म मानववाद काफी मशहूर है, जिसपे भारतीय जनता पार्टी आज भी चलने की बात करती है। एकात्म मानववाद क्या है इस बारे  हम फिर कभी बात करेंगे, आज हम पंडित जी के जीवन के उस रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं जो 51 सालों से एक रहस्य ही है। उनकी मौत के रहस्य।

बात है फरवरी 1968 की, संसद का बजट सत्र आने वाला था। जिसके लिए 12 फरवरी 1968 को दिल्ली में भारतीय जनसंघ के संसदीय दल की बैठक रखी गयी थी।वहीँ दूसरी ओर पटना में बिहार प्रदेश की भारतीय जनसंघ की कार्यकारिणी बैठक भी थी। बिहार के जनसंघ के मंत्री अश्विनी कुमार चाहते थे कि पंडित जी भी इस बैठक में आएं। वहीँ पंडित जी लखनऊ में अपनी मुँह बोली बहन के यहाँ गए हुए थे।अश्वनी कुमार ने पंडित जी को बुलाने के लिए 10 फरवरी को फोन किया और उन्हें निमंत्रण दिया।

पंडित जी लखनऊ से रवाना हो गए। पंडित जी की ट्रेन लखनऊ से चली थी,आधी रात को जौनपुर पहुंची। जौनपुर के महाराज दीनदयाल के दोस्त थे उन्होंने अपने सेवक के हाथों पंडितजी को पत्र भिजवाया, जो उन्हें रात को 12 बजे मिला। उसके बाद ट्रेन 2:15 बजे मुगलसराय स्टेशन पहुंची। पंडित जी जिस ट्रैन पर बैठे थे वो ट्रेन डिरेक्ट दिल्ली नहीं जाती थी, इसलिए बोगी काटकर उसे दिल्ली-हावड़ा ट्रेन से जोड़ दी गयी जिसमे लगभग आधे घंटे का समय लगा। और तकरीबन 4 बजे पंडित जी का शव उसी स्टेशन के पास मिला। ट्रेन 6 बजे पटना स्टेशन पहुँच गई। वहां बिहार के जनसंघ नेता पंडित जी की मृत्यु से अनजान उनका इंतज़ार कर रहे थे। ट्रेन 9:30 बजे मुकामा पहुंची। नेताओं ने ट्रैन में ढूंढा तो पंडित जी मिले नहीं। ट्रेन में एक शख्स को एक लावारिस सूटकेस मिला, उसने वो रेलवे में जमा करा दिया। जांच करने पर पता चला वह सूटकेस पंडित जी का ही था।

पंडित जी का शव 11  फरवरी 1968  को मुग़ल सराय रेलवे स्टेशन जिसे अब आप दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन के नाम से जानते हैं, उसी स्टेशन पर लगभग 4  बजे प्लेटफार्म मिला। लोहे, पत्थर , कंकड़ों के ढेर पर दीनदयाल उपाध्याय पीठ के बल सीधे पड़े हुए थे। मृत्यु के समय उनके पास एक प्रथम श्रेणी का टिकट,एक आरक्षण की पावती,हाथ में बंधी घड़ी, जिस पर नाना देशमुख दर्ज था, 26 रुपए और साथ ही उनके हाथ में मृत्यु के वक़्त एक 5 रुपए का नोट भी मिला था।

आखिर कैसे हुई थी उनकी मौत ?और कैसे पहुंचे वो लखनऊ से मुग़ल सराय स्टेशन ? यह एक मौत थी या एक हत्या ?

सीबीआई जांच चालू हुई, 5 दिन के अंदर ही सुराग मिलने शुरू हो गए। 2 सप्ताह में तो केस ही सुलझा डाला। सीबीआई के पास ऐसे केवल 2 नाम थे जो इस पुरे केस के आगे पीछे घूम रहे थे- राम अवध और भारत लाल। इन्हीं दोनों को मुल्ज़िम बना कर अदालत  गया। पंडित जी का मुकदमा वाराणसी न्यायालय में चला,जज थे मुरलीधर जी, उन्होंने कहा कि सीबीआई जांच के बावजूद कई सारी चीजें ऐसी हैं, जिनके कारण स्पष्ट नहीं हैं। सबूतों के अभाव में दोनों आरोपियों को हत्या के आरोप से बरी कर दिया गया. हालांकि भरत लाल को चोरी करने के आरोप में चार साल की सजा दी गई।

इसके बाद अलग अलग सरकारों में दोबारा जाँच करने की बात भी हुई और आज तक होती हैं। लेकिन ना तो अब कोई सबूत बचा है और ना ही कोई गवाह। तो कुछ इस तरह पंडित जी की एक नामालूम हादसे में मृत्यु हो गयी।