10 अरब से ज्यादा के कर्ज में डूब गया है पाकिस्तान

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एक वरिष्ठ अमेरिकी आर्मी जनरल Dunford ने ये दावा किया है कि पाकिस्तान के ऊपर अपने सबसे अच्छे दोस्त चीन का करीब दस अरब यानी दस बिलियन अमेरिकी डॉलर का कर्ज है. उनके मुताबिक ये चीन की एक हिंसक आर्थिक नीति का एक हिस्सा है. इस नीति के तहत चीन पहले देशों को कर्ज देता है और फिर उन देशों कि इच्छा विरुद्ध कई फायदे उठता है.

पाकिस्तान और चीन चाइना पाकिस्तान इकनोमिक कॉरिडोर यानी सीपेक को सामरिक दृष्टि से बहुत अहम मानते हैं. ये आर्थिक गलियारा चीन के काश्गर से पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को जोड़ता है.

ऐसा पहली बार नहीं हुआ है जब चीन आर्थिक मदद करने के बहाने दूसरे देश को अपने कर्जे तले दबा रहा है.

मालदीव्स के ऊपर भी चीन का कर्ज 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर जो कि उसकी अर्थव्यवस्था का 30% है.

इसी तरह अफ्रीका के जिबूती के ऊपर भी उसकी जीडीपी का 80% बकाया चीन का है. इसके बाद चीन ने जिबूती में अपना पहला ओवरसीज मिलिट्री बेस बना लिया है.

अमेरिकी मिलिट्री जनरल डंफोर्ड ने ये कहा कि चीन की इस चाल को अगर सही समय पर रोका नहीं गया तो ये अमेरिकी मिलिट्री के लिए एक बुरा सबब बन जायेगा.

Dunford ने चीन पर ये आरोप लगाया है कि इस नीति के चलते चीन ने हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में और खास कर साउथ चाइना सी में सैन्य गतिविधियों को बड़ा दिया है. और ये सभी देशों के लिए चिन्ता का विषय होना चाहिए.

2013 से 2018 के बीच चीन द्वारा साउथ चाइना सी में सैन्य गतिविधियाँ कई गुना बड़ गयी हैं. इन्हीं पांच सालों में चीन द्वारा काफी तेजी से रक्षात्मक और आक्रामक वेपन सिस्टम्स भी साउथ चाइना सी में तैनात कर दिए गए है.

2013 से 2015 के बीच ही चीन ने साउथ चाइना सी में 3200 एकड़ से ज्यादा का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर दिया था. ये इंफ्रास्ट्रक्चर चीन ने 9 Dash लाइन, जिसे चीन अपनी बाउंड्री के रूप में देखता है और जिसे द हेग स्थित परमानेंट कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन ने 2016 में अवैध करार दे दिया था, में स्थित है.

साथ ही Dunford ने चीन पर नेविगेशन कि स्वतंत्रता को ख़त्म करने का भी आरोप लगाया है.

आपको बता दें पिछले साल से चीन और अमेरिका के सम्बन्ध कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं. सबसे पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने चीन से ऐल्यूमिनियम और स्टील के आयात पर 200 अरब यानी 200 बिलियन डॉलर्स का टेर्रिफ लगा दिया था. इसके जवाब में चीन ने भी अमेरिका के 16 अरब के आयात पर 25% टेर्रिफ लगा दिया था.

और हाल ही में यूनाइटेड नेशंस में भी मसूद अजहर के मामले में अमेरिका के साथ साथ बाक़ी अन्य सदस्य भी चीन के टेक्निकल होल्ड के फैसले से काफी नाराज़ हुए. चीन के इस फैसले को डबल स्टैण्डर्ड के रूप में देखा जा रहा है. जहाँ आतंकवाद को जड़ से खतम करने कि बात चल रही है वही चीन आतंकवादियों को संरक्षण दे रहा है.

सीपेक का विरोध भारत हमेशा से ही करता आया है क्योंकि ये कॉरिडोर पाक अधिकृत कश्मीर से होकर निकलता है. इस मामले में अमेरिका भी भारत के साथ ही है. अमेरिका सीपेक को चीन कि एक चाल मानता है जिसका उपयोग चीन आगे चल कर हिन्द महासागर में सैन्य गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए कर सकता है.

आज कि परिस्थिति में चीन संयुक्त राष्ट्र में अलग थलग होता दिख रहा है, अमेरिका से उसके सम्बंध भी सुधारते नहीं दिख रहे हैं और चीन कि धीमी आर्थिक गति के चलते ये बहुत ज़रूरी है कि चीन भारत से अपने संबंधों को सुधार ले. अगर चीन ने ऐसा नहीं किया तो आगे चल कर चीन के लिए मुश्किलें और बड़ सकती हैं. ऐसे में चीन के लिए ये बहुत ज़रूरी होगा कि वह भारत के हितों का पूरा ख्याल रखे.