2020 फ्लैशबैक : कोरोना काल में भाजपा ने आपदा को अवसर में बदला, जबकि कांग्रेस ने अवसर को आपदा में बदल लिया

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साल 2020 एक ऐसा साल रहा जिसे पूरी दुनिया कभी याद नहीं करना चाहेगी. 6 महीनों तक पूरी दुनिया लॉकडाउन में रही, ताकतवर देश घुटने पर आ गए और अर्थव्यवस्थाएं चरमरा गई. इस आपदा के वक़्त भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नारा दिया आपदा में अवसर. पीएम मोदी के इस नारे को भाजपा ने आत्मसाथ किया और कोरोना काल में आपदा को अवसर में बदल कर सफलता की ऐसी कहानी लिखी कि वो इस साल को कभी नहीं भूल पाएगी. इस भाल भाजपा ने पूरब से लेकर पश्चिम और उत्तर से लेकर दक्षिण तक जीत का परचम लहराया. जबकि उसकी प्रतिद्वंदी और देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए ये साल भी आपदा वाला साबित हुआ या यूँ कहें कि कांग्रेस ने खुद ही अवसर को आपदा में तब्दील कर लिया.

साल के शुरुआत में भी भाजपा को नया अध्यक्ष मिला जेपी नड्डा के रूप में. जिस वक़्त नड्डा अध्यक्ष बने उस वक़्त देश में CAA विरोधी प्रदर्शन चल रहे थे. अध्यक्ष बनते ही नड्डा के सामने पहली चुनौती आई दिल्ली विधानसभा चुनाव के रूप में. भाजपा ये चुनाव बुरी तरह हार गई. उसके बाद दिल्ली दंगों ने सरकार के लिए परेशानी खड़ी की लेकिन जल्द ही इस पूरे दंगा काण्ड का पर्दाफाश हो गया. उसके बाद देश में कोरोना की वजह से लॉकडाउन लगा. लॉकडाउन के बाद भारत सरकार की तरफ से राहत पॅकेज का ऐलान किया गया. कई जनकल्याणकारी योजनायें चलाई गई. इन योजनाओं का फायदा भाजपा को आगे जा कर मिलने वाला था और मिला भी.

PM Modi

कोरोना संकट के छंटते ही भाजपा के सामने पहली चुनौती आई बिहार विधानसभा चुनाव के रूप में. लॉकडाउन के ऐलान के बाद जिस तरह से मजदूरों के पलायन की तस्वीरें सामने आई उससे लगा कि इस बार बिहार में भाजपा और जेडीयू गठबंधन का सफाया हो जाएगा. नीतीश के खिलाफ 15 सालों की एंटी इनकम्बेंसी भी थी. बतौर भाजपा अध्यक्ष नड्डा के सामने चुनौती भी थी. लेकिन बिहार में तमाम एग्जिट पोल को धत्ता बताते हुए NDA ने जीत दर्ज की. लेकिन भाजपा के लिए इस जीत से बड़ी ख़ुशी आई. बिहार की राजनीति बदल गई. भाजपा राज्य में बड़ा भाई बन गई और जेडीयू तीसरे दर्जे की पार्टी. 110 सीटों पर लड़कर भाजपा ने 74 सीटें हासिल की और नड्डा ने अपनी परीक्षा पास कर ली. इस चुनाव ने इस बात पर भी मुहर लगा दी कि पीएम मोदी की लोकप्रियता लॉकडाउन जैसे फैसलों के बावजूद कायम है. लोगों ने ये तो माना कि लॉकडाउन से उन्हें दिक्कतें आई लेकिन साथ ही लोगों ने ये भी माना कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें अनाज और पैसे मोदी ने ही दिए. पैसे सीधे अकाउंट में आये. कोई बिचौलिया नहीं था पैसे खाने वाला.

उसके बाद कई राज्यों में उपचुनाव भी हुए, पंचायत और निकाय चुनाव भी हुए. भाजपा ने सब जगह अपने जीत का परचम लहराया. मध्य प्रदेश उपचुनाव में तो भाजपा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए कांग्रेस के सत्ता में आने की उम्मीदों को अगले 3 सालों के लिए दफ़न कर दिया. भाजपा के लिए असल खुशखबरी ले कर आया हैदराबाद निकाय चुनाव और जम्मू-कश्मीर में DDC चुनाव. हैदराबाद निकाय चुनाव में शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा दुसरे नंबर पर पहुँच गई. उसने सत्ताधारी TRS के वोटबैंक में जबरदस्त सेंध लगा कर दक्षिण के एक और राज्य का दरवाजा अपने लिए खोल लिया. और साथ ही भारतीय राजनीति के इतिहास भाजपा ने एक नया चैप्टर लिख दिया कि विधानसभा का रास्ता लोकल चुनावों से हो कर जाता है. जिस तरह भाजपा ने हैदराबाद निकाय चुनाव में अपनी ताकत झोंकी वो एक नजीर बन गया.

भाजपा के लिए अभी एक और खुशखबरी बाकी थी. आर्टिकल 370 हटाये जाने के डेढ़ साल बाद जम्मू-कश्मीर में DDC के चुनाव हुए और इन चुनावों में भी भाजपा ने परचम लहराया. जम्मू तो भाजपा का गढ़ पहले से ही था. इस बार पार्टी ने कश्मीर घाटी में भी कमल खिला दिया. घाटी में भाजपा ने सिर्फ 3 सीटें ही जीती लेकिन इसका महत्त्व उतना ही था जितना 20 सीटें जीतने का होता. साल ख़त्म होते होते भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश और कर्नाटक पंचायत चुनाव में सफलता हासिल की तो नए साल में नयी कहानी लिखने के इरादे से बंगाल में अपनी ताकत झोंक दी. क्योंकि नए साल में बंगाल में विधानसभा चुनाव है.

बात करें कांग्रेस की तो उसके लिए गुजरा साल आपदा साबित हुआ. विधानसभा चुनाव से लेकर पंचायत चुनाव तक में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा. मध्य प्रदेश में 15 सालों बात आई सत्ता फिर हाथ से निकल गई. राजस्थान में खुदा खुदा करते हुए सरकार बची. रही सही कसर पार्टी में नेत्रित्व परिवर्तन के लिए पड़ी फूट ने पुरी कर दी. कांग्रेस के साथ जो हुआ उसकी जिम्मेदार भी वो खुद ही थी. उसके सामने अवसर था लेकिन उसने अवसर को आपदा में बदल दिया.