गाँधी परिवार को निचोड़ कर कांग्रेस सारा रस निकाल चुकी है, अब इस परिवार को साइड में रखने का वक़्त आ गया है

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आपने कभी सड़क किनारे गन्ने का जूस निकलाने वाले को देखा है? वो तब तक गन्ने को रेशे को मशीन में डालते रहता है जब तक उसमे एक कतरा रस भी बाकी रहता है. फिर एक वक़्त ऐसा आता हगे जब वो गन्ने के रेशे को कचरे की तरह साइड में रख देता है. क्योंकि अब वो किसी काम का नहीं रहता. उसमे से सारा रस निचोड़ा जा चुका होता है. कुछ ऐसा ही हाल है कांग्रेस पार्टी का. पार्टी ने गांधी परिवार रूपी गन्ने को इतना निचोड़ लिया है कि अब उसमे एक बूँद रस भी नहीं बचा. लेकिन बजाये उसे साइड में रख कर नया गन्ना मशीन में डालने के, पार्टी उसी भूसे के ढेर जैसे रेशे को मशीन में डाल कर मशीन को चलाये जा रही है.

किसी भी राजनीतिक पार्टी के लिए नेताओं और कार्यकर्ताओं की फ़ौज सबसे बड़ी संपत्ति होती है. लेकिन कांग्रेस में नेता और कार्यकर्त्ता पार्टी के लिए संपत्ति नहीं बल्कि गाँधी परिवार के लिए गुलाम हैं. एक परिवार की गुलामी की आदत में इस तरह से जकड़े हुए हैं कि उन्हें पार्टी के भविष्य की चिंता भी नहीं. सोनिया गाँधी से अध्यक्ष पद की कुर्सी ले कर राहुल गाँधी को दे दिया. फिर राहुल गाँधी से लेकर सोनियता गाँधी को दे दिया और अब फिर सोनिया गाँधी से लेकर राहुल गाँधी को देने की सोच रहे. आप ट्विटर पर जा कर देख लीजिये. राहुल गाँधी को फिर से पार्टी का अध्यक्ष बनाए जाने के लिए एक कैम्पेन चल रहा है. उन्हें कोई मतलब नहीं कि राहुल गाँधी राजनीति को लेकर गंभीर नहीं. उन्हें कोई मतलब नहीं राहुल गाँधी भारतीय राजनीति में मसखरे की हैसियत लेते जा रहे. उन्हें कोई मतलब नहीं देश की जनता राहुल गाँधी को प्रधानमंत्री के पद के योग्य नहीं मानती. उन्हें बस मतलब है कि वो गाँधी परिवार और कांग्रेस पार्टी के युवराज हैं और पीएम पद पर तो उनका ही अधिकार है. चाहे कोई योग्यता हो या न हो.

2014 में भी कांग्रेस की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार राहुल गाँधी थे, 2019 में भी थे और 2024 में भी रहेंगे. आप इंतज़ार करते रहिये, ये कांग्रेस वाले 2029 में भी राहुल गाँधी को ही पीएम पद का उम्मीदवार घोषित करेंगे. एक बार की नाकामी के बाद तो भाजपा ने अपने संस्थापक सदस्य रहे लाल कृष्ण आडवानी का विकल्प भी ढूंढ लिया था. लेकिन कांग्रेस के लिए नाकाम का विकल्प फिर से वही नाकाम है. पार्टी के लिए सारा आकाश बस गाँधी परिवार है. ऐसा नहीं है कि पार्टी में योग्य और युवा नेताओं की कमी है. युवा नेताओं को पार्टी में राहुल गाँधी के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है. राजस्थान में सचिन पायलट, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया, जो कांग्रेस छोड़ कर भाजपा में चले गए, उत्तर प्रदेश में जितिन प्रसाद और महाराष्ट्र में मिलिंद देवड़ा जैसे युवा तुर्क गाँधी परिवार के महत्वकांक्षा के तले जाया हो गए. इन सभी नेताओं में राहुल गाँधी से ज्यादा काबिलियत है जनता की नज़रों में. लेकिन गाँधी परिवार के लिए ये नेता काबिल नहीं बल्कि राहुल के पीएम बनने की राह में रोड़ा हैं. पार्टी अनुभवी वरिष्ठ नेता आगे बढ़ कर जिम्मेदारी उठाने की बजाये खुद को गाँधी परिवार के प्रति निष्ठावान साबित करने की कोशिश में लगे रहते हैं.

दरअसल गाँधी परिवार कभी अपने खिलाफ विरोध की आवाज सुनने का आदि नहीं रहा. गाँधी परिवार में बच्चे पैदा नहीं होते बल्कि प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष पैदा होते है. पार्टी के बुजुर्ग गाँधी परिवार के अलावा किसी और को अध्यक्ष पद पर स्वीकार कर नहीं सकते, पीएम पद पर गाँधी परिवार के अलावा किसी और को कैसे बर्दास्त करेंगे. उन्हें पता है कि गाँधी परिवार की चाटुकारिता में उनका भविष्य सुरक्षित है.