कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आज़ाद के रवैये से इशारा, कांग्रेस में अब भी सुलग रही है बगावत की चिंगारी

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कांग्रेस वर्किंग कमिटी की मीटिंग में सोनिया गाँधी को कुछ और महीनों के लिए पार्टी की कमान सौंपने के बाद भले ही ये लगे कि पार्टी में अब सबकुछ ठीक है. लेकिन ऐसा है नहीं. विवादों और बगावत की राख के नीचे चिंगारी अब भी दहक रही है. राहुल गाँधी द्वारा CWC की मीटिंग में चिट्ठी लिखने वाले नेताओं पर BJP से सांठगांठ से सांठगांठ के आरोपों ने पुराने, वरिष्ठ और गाँधी परिवार के वफादारों में शुमार होने वाले कपिल सिब्बल और गुलाम नबी आज़ाद के दिल को ठेस पहुंचाई है और ये दोनों ही नेता इस बात को भूल नहीं पा रहे. जिनकी आधी ज़िन्दगी जिस परिवार की खिदमद में गुजर गई उन्ही पर युवराज ने ऐसे आरोप लगा दिए.

CWC की मीटिंग के दौरान किये जाने वाले ट्वीट को भले ही कपिल सिब्बल ने उस वक़्त डिलीट कर दिया हो. लेकिन उनके दिल की कसक को उनके रोज के ट्वीट में महसूस किया जा सकता है. 24 अगस्त को मचे घमासान के बाद 25 अगस्त को सिब्बल ने ट्वीट करते हुए कहा था कि “यह एक पद के बारे में नहीं है. यह मेरे देश के बारे में है, जो सबसे ज्यादा मायने रखता है.” सिब्बल के इस ट्वीट को देख सब समझ गए कि राहुल के आरोपों से उनके दिल में जो खटास पैदा हुई है वो दूर नहीं हुई है अब तक. 26 अगस्त को सिब्बल ने एक और ट्वीट करते हुए लिखा, ‘जब सिद्धांतों के लिए लड़ रहे हैं, जिन्दगी में, राजनीती में, न्याय में, सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर, विपक्ष अक्सर स्वैच्छिक होता है, समर्थन अक्सर प्रबंधित होता है.’

सिब्बल के साथ ही गुलाम नबी आज़ाद भी उन नेताओं एम् शामिल हैं जिन्होंने नेतृत्व परिवर्तन के लिए चिट्ठी लिखी थी. आजाद की छवि गांधी परिवार के प्रति वफादार की रही है जिनकी नियत पर शक नहीं किया जा सकता. लेकिन जैसे ही ये सामने आया कि नेतृत्व परिवर्तन के लिए चिट्ठी लिखने का सारा प्लान बनाने में आज़ाद की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका थी. हर कोई हैरत में पड़ गया. लेकिन बहुत कम लोग इस बात को महसूस कर पा रहे हैं कि आज़ाद वर्तमान राजनितिक परिदृश्य में खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे थे. गुलाम नबी आज़ाद कश्मीर से आने वाली कांग्रेस की सबसे मजबूत आवाज हुआ करते थे. लेकिन आर्टिकल 370 हटने के बाद कश्मीर में न तो कांग्रेस के लिए कुछ रहा और न आजाद के लिए. शुरुआत में कांग्रेस ने आर्टिकल 370 हटाने का पुरजोर विरोध किया. लेकिन फिर जब ये महसूस हुआ कि इस मामले में पूरे देश की भावना भाजपा के साथ है तो उन्होंने विरोध के कदम वापस खींचने शुरू कर दिए. ऐसी परिस्थिति में आज़ाद के लिए कुछ रह ही नहीं गया.

इसके अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम, पूर्व वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा, पूर्व सूचना एवं प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल जैसे दिग्गज नेताओं के साथ-साथ अभिषेक मनु सिंघवी और कपिल सिब्बल भी राज्यसभा के सदस्य हैं. मल्लिकार्जुन खड़के को भी राज्यसभा भेज दिया गया.ऐसे में आज़ाद को अपनी भूमिका सिमटती हुई दिखाई दी. क्योंकि लम्बे अरसे से गुलाम नबी आज़ाद राज्यसभा में कांग्रेस का पक्ष मजबूती से रखते रहे हैं. अगले साल उनका राज्यसभा का कार्यकाल ख़त्म हो रहा है. ऐसे में नेतृत्व परिवर्तन के लिए चिट्ठी लिखने के कारण बागी होने का आरोप झेल रहे आज़ाद भले ही ऊपर से शांत दिखाई दे रहे हैं लेकिन अन्दर ही अन्दर वो घुट रहे हैं कपिल सिब्बल की तरह. क्योंकि राहुल गाँधी और बाकी कांग्रेसी ये समझने को तैयार ही नहीं कि अगर नेतृत्व परिवर्तन नहीं हुआ तो एक मजबूत अध्यक्ष के बिना पार्टी ख़त्म हो जायेगी.