जितिन प्रसाद के रूप में बीजेपी के हाथ लगा हुकुम का इक्का, जानिये कैसे यूपी विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने मारा बड़ा दांव

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जितिन प्रसाद के भाजपा में जाने से कांग्रेस ऐसा दिखा रही है मानों उसने कुछ नहीं खोया है. उत्तर प्रदेश में मर चुकी कांग्रेस के पास गिने चुने चेहरे रह गए थे. राहुल गांधी अमेठी गँवा कर वायनाड चले गए. सोनिया गाँधी भले ही रायबरेली से सांसद हैं लेकिन पहले की तरह सक्रिय नहीं रहीं. प्रियंका गांधी तो अभी तक उत्तर प्रदेश की चक्रव्यूह सरीखी जातीय समीकरणों को सीख ही रही हैं. ऐसे में जितिन प्रसाद उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का एक ब्राह्मण चेहरा थे. लेकिन पार्टी ने उनकी कदर ही नहीं की. अब जबकि जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो चुके हैं तो 2022 विधानसभा चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश में भाजपा को तुरुप का एक ऐसा इक्का मिला है जिसके जरिये वो राज्य में ब्राह्मणों की नाराजगी तो दूर कर सकती है और ठाकुर-ब्राह्मण का नया गठजोड़ बना सकती है.

यूपी में कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं था लेकिन शायद ये एक ऐसी पार्टी है जिसके पास खोने के लिए कुछ न होने के बावजूद भी खोती जा रही है. वैसे तो जितिन प्रसाद की गिनती कभी ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की तरह जनाधार वाले नेताओं में नहीं हुई. जितिन प्रसाद तो 2014 और 2019 में अपनी जीत भी सुनिश्चित नहीं कर सके थे. ऐसे में उन्हें खो कर कांग्रेस को शायद ही कोई नुकसान हो लेकिन भाजपा इसका फायदा जरूर उठा सकती है. क्योंकि भाजपा ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें यूपी चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी सौंप सकती है.

उत्तर प्रदेश में ब्राह्मणों वोटरों की संख्या करीब 12 फीसदी है. कई जिले ऐसे हैं जहाँ ब्राह्मण वोटर 20 फीसदी हैं. ब्राह्मण वोटबैंक यूपी की सियासत में क्या मायने रखता है इसे आप ऐसे अमझिये कि समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने ब्राह्मण वोटरों को लुभाने के लिए भगवान परशुराम की प्रतिमाएं स्थापित करने का ऐलान कर ब्राह्मण कार्ड खेला है. 2007 के विधानसभा चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण-दलित-मुस्लिम गठजोड़ बना कर सोशल इंजीनियरिंग की थी. उन्होंने 86 ब्राह्मणों को टिकट दिया था. उस विधानसभा चुनाव में बसपा ने 207 सीटों के साथ बहुमत हासिल किया था.

गैंगस्टर विकास दुबे और मुख्तार अंसारी के करीबी शूटर राकेश पांडे के एनकाउंटर से कहा जा रहा है कि ब्राह्मणों में नाराजगी बढ़ी है. कांग्रेस ने योगी के कार्यकाल में ब्राह्मणों पर हुईं हिंसा के आंकड़े जारी कर सरकार को घेरा था. लेकिन अब कांग्रेस के हाथों से उनका ही ब्राह्मण नेता छिटक गया. जितिन प्रसाद ने ब्राह्मण चेतना परिषद नाम से संगठन बनाया था. जितिन ने वीडियो काॅन्फ्रेंसिंग के जरिए जिले वार ब्राह्मण समाज के लोगों से संवाद किया और ब्राह्मण परिवारों से मुलाकात भी की थी. लेकिन कांग्रेस ने इसे जितिन का निजी कार्यक्रम बताते हुए इससे दूरी बना ली थी. अब जबकि जितिन प्रसाद भाजपा में आ चुके हैं तो इस संगठन के जरिये वो भाजपा के लिए काफी फायदेमंद साबित्र हो सकते हैं.