आप क्रोनोलॉजी समझिये : पहले 500 शांतिप्रिय लोग शहर को आ’ग लगाएंगे फिर 20 शांतिप्रिय लोग ह्यूमन चेन बनाने की नौटंकी करेंगे

415

मंगलवार 11अगस्त की रात जिस वक़्त पूरा देश श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की तैयारियों में व्यस्त था उस वक़्त देश का IT कैपिटल बेंगलुरु ज’ल रहा था. इसकी वजह थी एक फेसबुक पोस्ट. कांग्रेस के दलित विधायक के भतीजे ने पैगम्बर मोहम्मद पर कुछ पोस्ट किया और उसके बाद शांतिप्रिय कौम के लोग सड़कों पर उतर आयें और बेंगलुरु को धुआं धुआं कर डाला. बेचारे दलित विधायक जी का घर भी ज’ला डाला गया. किसी तरह से विधायक जी की जान बची. जिस वक़्त ये सब हो रहा था उस वक़्त फ्रीडम ऑफ़ स्पीच गैंग गहरी नींद में सो रही थी. वरना इस दं’गे फ’साद की निंदा जरूर करते. शांतिप्रिय कौम की असहिष्णुता देख कर शायद अपने पास बचा हुआ कोई अवार्ड ही लौटा देते. या फिर कोई शायर शायरी ही कर देता –
सभी की मेहनत शामिल है बेंगलुरु को बनाने में
मत ज’लाओ इसे, तुम्हारे बाप का बेंगलुरु थोड़े ही है
 

एक झटके में भीम और मीम की ख्याली एकता की धज्जियाँ उड़ गई. लेकिन कांग्रेस के मुंह से आलोचना का एक शब्द नहीं फूटा. ये पार्टी तो इतनी बेशर्म है कि उससे अपने दलित विधायक के समर्थन में भी नहीं बोला गया. युवराज राहुल गाँधी अपने ट्विटर का पासवर्ड भूल गए. राजकुमारी प्रियंका गाँधी तो अब तक नक़्शे में बेंगलुरु को खोज रही हैं. दादी का चश्मा लगा कर ढूंढें तो शायद जल्दी मिल जाए. अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब असम में एक प्रोफ़ेसर ने भगवान राम पर कुछ वाहियात पोस्ट लिखी थी. ABVP के एक सदस्य ने FIR करा दी थी वो लोकतंत्र और फ्रीडम ऑफ़ स्पीच खतरे में आ गया था.

लेकिन असल कहानी तो अभी बाकी थी. सुबह लोगों की नींद खुली तो ज’लते बेंगलुरु की तस्वीरों और वीडियो के साथ साथ एक और वीडियो वायरल हो रहा था. एक मंदिर के बाहर शांतिप्रिय समुदाय के कुछ लोग ह्यूमन चेन बना कर खड़े हैं ताकि मंदिर की सुरक्षा की जा सके. इस वीडियो को “ये है असली भारत की तस्वीर” .. “ये है गंगा-जमुनी तहजीब” बता कर खूब शेयर किया जा रहा है. काश ये ह्यूमन चेन का आविष्कार मुगलों के ज़माने में हो गया होता तो अयोध्या, काशी और मथुरा को लेकर कोई कलेश ही नहीं होता.

वायरल वीडियो में बड़ी आसानी से ये बता दिया गया कि मुसलमानों ने मंदिर को बचाया. लेकिन बचाया किससे ये छुपा लिया गया. जलाने वाला “समुदाय विशेष” हो जाता है लेकिन बचाने वाला मुसलमान हो जाता है. आप क्रोनोलॉजी समझिए…

पहले 500 शांतिप्रिय लोग शहर को आ’ग लगाएंगे…
फिर उन्ही 500 में से 20 शांतिप्रिय लोग ह्यूमन चेन बना कर मंदिर के बाहर खड़े हो जाएंगे …
फिर उन 20 लोगों की तारीफ में 75 बीघा में धनिया बोया जाएगा…
फिर सारा फोकस दंगो से हटाकर गंगा-जमुनी तहजीब पर कर दिया जाएगा…
लिब्रान्डू शहर जलाने की आलोचना करने से बच जाएंगे…
हर तरफ बस गंगा-जमुनी तहजीब की फसल लहलहायेगी…

फिर प्राइम टाइम में रवीश कुमार उस फसल को काटेंगे और उस फसल को ये कह कर बेचेंगे कि ये तो बेहद शांतिप्रिय कौम है. क्या इस देश में शांतिप्रिय अल्पसंख्यकों को अपनी भावना आहत करने का भी हक़ नहीं. क्या अँधेरे में डूबे बेंगलुरु शहर को शांतिप्रिय समुदाय थोडा आ’ग लगा कर रौशन भी नहीं कर सकता? बताइए जवाब दीजिये ? बड़ी विडम्बना है.