ऑपरेशन डायमंड: तीन कोशिशों के बाद मिल पाया मिग- 21

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मिग- 21 ने 1956 में अपनी पहली उड़ान भरी थी. यह उड़ान पूरी तरह से सफल रही, और यही वज़ह थी कि रूस अब मिग- 19 को हटाकर उनकी जगह मिग- 21 को सेना में शामिल करना चाहता था. इसलिए मिकोयन गुरेविच ने साल 1959 में जोर- शोर से मिग-21 विमानों का निर्माण शुरू कर दिया.

साल 1960 आते- आते पूरी दुनिया इस विमान की दीवानी हो चली थी. मिग उस वक़्त के सबसे घातक और तेज़ विमानों में से एक था. मिडिल ईस्ट के बहुत से देश जैसे मिस्र, सीरिया और इराक इजरायल के खिलाफ इसका इस्तेमाल करने लगे थे.

इज़राइल के मिराज III और एफ-4 जैसे विमानों को मिग- 21 ने धूल चटा दी थी. और अब मिग- 21 इजरायल के लिए मुसीबत का दूसरा नाम बन गया. अमेरिका समेत पश्चिम के बहुत से देशों से दुश्मनी के चलते उन्हें रूस से मिग- 21 नहीं मिला.

ये सारे देश मिग- 21 का तोड़ निकालने के लिए छटपटा रहे थे. वो जानना चाहते थे कि आखिर वो कौनसी चीजें हैं, कौनसी तकनीक है जो मिग- 21 को इतना घातक बनाती हैं. और ऐसे ही एक देश इजराइल की छटपटाहट ने जन्म दिया एक फ़िल्मी सी लगने वाली कहानी को.

इजराइल की खूफिया एजेंसी MOSSAD की कमान मीर अमित को सौंपी गयी थी. वो कई साल इजराइल की फौज में बिताने के बाद MOSSAD के चीफ बने थे. उनके अपने अनुभव थे, और अपने ही तरीके.

उन्हें भी पता था कि इजराइल को मिग- 21 चाहिए. और वो इसके लिए परेशान भी थे. उनके एक दोस्त थे आइज़र वायज़मैन, जो कि उस वक़्त इजराइल एयरफोर्स के चीफ थे. एक दिन बातों के दौरान मीर अमित ने उनसे कहा,

“मुझे मिग- 21 चाहिए.”

आइज़र वायज़मैन उनकी ये बात सुनकर चौंक गए. लेकिन जब उन्हें ये महसूस हुआ तो उन्होंने इस बारे में प्लानिंग शुरू की. ऐसा बताया जाता है कि इससे पहले भी MOSSAD दो बार मिग- 21 को पाने की कोशिश कर चुका था, लेकिन उसकी ये दोनों कोशिशें नाकाम रहीं.

सबसे पहले MOSSAD ने जीन थॉमस को इस ऑपरेशन की कमान सौंपी. और उनसे कहा कि वो मिस्त्र में एक ऐसे पायलट की तलाश करे जो वहाँ से मिग-21 उड़ाकर इजराइल पहुंचा दे. और ऐसा करने के लिए इजराइल ने पायलट को 10 लाख डॉलर देने तक की बात की. लेकिन जीन थॉमस ऐसा नहीं कर सके और मिस्र के अधिकारियों के सामने उनके ऑपरेशन की पोल भी खुल गई.

जीन थॉमस को और उनके दो साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया. और साल 1962 में उन सभी को फांसी पर चढ़ा दिया गया. लेकिन इसके बाद भी MOSSAD ने हार नहीं मानी और ईराक से मिग- 21 लाने की कोशिश की. इराक के पायलटों से विमान लाने के लिए फिर पहले की तरह ही इराकी पायलटों से संपर्क किया गया.

उनको भी पहले की तरह ही पैसों का लालच दिया गया. कुछ पायलटों ने पहले तो हामी भरी, लेकिन बाद में किसी डर मुकर गए.

रूस किसी भी कीमत पर इजराइल को मिग- 21 नहीं देने वाला था. और इजराइल को किसी भी कीमत पर मिग- 21 पाना था. साल 1964 में एक यहूदी, युसूफ मोसाद के इजराइली अधिकारियों के संपर्क में आया. और उसने अधिकारियों को एक इराकी पायलट के बारे में बताया.

इस इराकी पायलट का नाम मुनीर रेड्फा था, और ये ईराक एयरफोर्स के रवैये से खुश नहीं  था. लम्बे वक़्त से उसका प्रमोशन नहीं किया जा रहा था. वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि उसकी पत्नी ईसाई थी. और उसे उसके परिवार से अलग भी कर दिया गया था. उसे ये लगने लगा था कि वो कभी स्क्वाड्रन लीडर नहीं बन सकेगा.

इन सभी वज़हों के चलते मुनीर इराक छोड़ देना चाहता था. और यूसुफ़ समझ गया था कि MOSSAD जो करवाना चाहती है, वो बस मुनीर ही कर सकता है.

MOSSAD की तरफ से एक महिला जासूस को लगाया गया, ताकि वो मुनीर से दोस्ती कर सके और फिर उसे अपनी ख़ूबसूरती के जाल में फंसाकर उसे यूरोप ले जा सके और इजराइल के जासूसों से मिलवा सके. उस महिला जासूस और उसकी ख़ूबसूरती ने अपना काम कर दिया.

मुनीर ने MOSSAD के एजेंट्स से मुलाक़ात की. उन्होंने उसे इजराइल एयरफोर्स के कमांडर से मिलवाया, और यहाँ से शुरू हुई मिग-21 पर कब्ज़ा करने की रणनीति. बहुत सी खूफिया मीटिंग्स के बाद पूरा प्लान तैयार हुआ, और एक डील फिक्स हुई.

मिग- 21 के बदले में मुनीर ने इजराइल से वो सभी चीजें माँगी जिनकी उसे ज़रूरत थी. इसमें शामिल थे 10 लाख डॉलर, इजराइल में ज़िंदगी भर का रोजगार, और उसके परिवार की सुरक्षा.

इजराइल की तरफ से हामी भर दी गई, और मुनीर ने जिम्मा उठा लिया इराक के मिग- 21 को इजराइल तक पहुंचाने का. इस पूरे ऑपरेशन को नाम दिया गया ऑपरेशन डायमंड. और प्लानिंग के हिसाब से काम को शरू किया गया.

साल था 1966 और तारीख थी 16 अगस्त. हर दिन की तरह ही ये भी एक आम सा दिन था, लेकिन मुनीर ने आज मिग- 21 लेकर इराक से उड़ान भरी तो फिर ईराक में उतरा ही नहीं. वो जॉर्डन के पास पहुंचा तो इराक एयरफोर्स की तरफ से उसे चेतावनी दी गई. उससे कहा गया कि वो इससे आगे ना बढ़े, और वापस लौट आये. लेकिन अब लौटने के लिए बहुत देर हो चुकी थी. और सच ये था कि मुनीर को रुकना भी नहीं था. उसने मिग- 21 को इजराइल की सीमा में पहुंचा दिया था.

इजराइल की सीमा में पहुँचते ही, यहाँ पहले से तैनात 2 दूसरे फाइटर प्लेन्स सुरक्षा के लिए उसके पीछे लग गए. मुनीर ने उन्हें अपनी पहचान के लिए सिग्नल दिया. और सिग्नल देखकर उन्होंने उसे कवर कर लिया. इसके कुछ ही वक़्त बाद इराक का मिग- 21 दक्षिणी इजराइल के एयरबेस पर उतर गया.

इसके साथ ही दूसरी तरफ, MOSSAD के कुछ और एजेंट्स छुट्टियां मनाने के बहाने से मुनीर के परिवार को इराक से लेकर इजराइल आ गए. बहुत जगह ऐसा भी पढ़ने को मिलता है कि मुनीर जब मिग-21 लेकर इजराइल के एयरबेस पर पहंचे, तब उसमें बस कुछ आखिरी बूंद ही ईंधन बचा था.

इराक को जब ये पूरा खेल समझ में आया तब उसने रूस को मिग- 21 के चोरी होने की जानकारी दी. इराकी और रशियन अथॉरिटीज ने इजराइल से मिग- 21 वापस करने को कहा लेकिन ज़ाहिर है, अगर वापस ही करना होता तो इजराइल इतना बड़ा कदम ही नहीं उठाता.

करीब 3 सालों की मेहनत के बाद ऑपरेशन डायमंड सफल हो चुका था. और अब इजराइल के पास मिग- 21 पहुँच चुका था. ये ऑपरेशन बहुत कठिन और चालाकी भरा रहा, इसलिए इस मिग- 21 को इजराइल की तरफ से एक नया नाम दिया गया 007. जो कि जेम्स बांड की फिल्म से लिया गया था.

इजराइल ने इस मिग- 21 की जाँच शुरू कर दी. वहाँ के तकनीकी जानकारों को इसकी बारीकियों को स्टडी करने का काम सौंप दिया गया. उन्होंने ये कम्पेरिजन किया कि मिग- 21 उनके पास मौजूद फाइटर प्लेन्स से किस तरह से अलग हैं.

सभी जांचों के हो जाने के बाद शैपिरा ने इस विमान को इजराइली वायु सेना में शामिल विमानों से भी मापा. शैपिरा ये जानना चाहते थे कि आखिर मिग-21 विमान किन बातों में यहां की वायुसेना में शामिल विमानों से अलग है.

यही नहीं इजराइल के पायलटों को इस विमान को चलाने की ट्रेनिंग भी दी गई, ताकि भविष्य में अगर कभी इस विमान को चलाने की बात सामने आए तो वायु सेना के पायलट पूरी तरह से तैयार रहें.

और फिर 1967 की लड़ाई में इजराइल को मिग- 21 का फायदा भी मिला. इजराइल ने जब गोलन की पहाड़ियों पर सीरिया से जंग लड़ी, तब इस मिग- 21 ने अपनी ताकत दिखाई. इस लड़ाई में इजराइल ने इसी एक मिग- 21 की मदद से सीरिया के कई मिग- 21 मार गिराए.साल 1967 से 1973 तक इजराइल और अरब के बीच चली लड़ाई में भी मिग- 21 ने इजराइल को जीत दिलाई.

इजराइल ने जनवरी 1968 में यही मिग- 21 यूनाइटेड स्टेट को उधार दिया, और अमेरिका ने बदले में इजराइल को दिया एफ़- 4 फैंटम. इससे पहले यूनाइटेड स्टेट ने यही विमान इजराइल को देने से मना कर दिया था.

मिग-21 आज तक दुनिया के बहुत से देशों की सेना में शामिल है. भारत ने खुद मिग- 21 की मदद से पाकिस्तान को धूल चटाई है. अभी हाल ही में विंग कमांडर अभिनन्दन ने भी मिग से जो कारनामा किया है वो तो आपको पता ही होगा. इस सब से समझ में आता है कि आखिर इजराइल मिग- 21 को पाने के लिए इस हद तक क्यों गया.

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