शराब की दुकानें खुल सकती है, चुनाव हो सकते हैं, शादियाँ हो सकती है तो परीक्षाएं क्यों नहीं हो सकती? सारा खतरा छात्रों को ही है?

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NEET और JEE की परीक्षाओं ने देश की सियासत में कोहराम मचा रखा है. विपक्ष कोरोना महामारी के दौरान इन परीक्षाओं को आयोजित करने को लेकर सरकार पर सवाल उठा रही है. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने इन परीक्षाओं को आयोजित करने की मंजूरी दे दी है. इन परीक्षाओं को स्थगित करवाने की मांग वाली तमाम याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी थी.

अपने देश में हर मुद्दे का सियासी बन जाना एक चलन है, लिहाजा परीक्षाएं भी सियासी मुद्दा बन गई. सवाल ये है कि जब कोरोना महामारी के दौर में शराब की दुकानें खुल सकती है और उन दुकानों के बाहर हज़ारों की लाइन लग सकती है. जब कोरोना महामारी के दौरान शादी ब्याह नहीं रुक रहें. जब कोरोना महामारी के दौरान चुनाव नहीं रुक रहे तो फिर क्या सारा खतरा बस परीक्षा देने में ही है? सवाल तो जायज ही है कि क्यों छात्रों का एक कीमती साल बर्बाद कर उनकी कैरियर में एक ब्लॉक डाला जाए? कहाँ तो सभी विपक्षी पार्टियों और राज्य सरकारों को केंद्र सरकार को सुझाव देने चाहिए थे कि किस तरह परीक्षाएं आयोजित की जाए कि छात्रों को कोई दिक्कत न हो और कहाँ राज्य सरकारें और विपक्षी पार्टियाँ इसे सरकार को घेरने का एक मुद्दा मान कर अपने कदम बढ़ा रही है.

जब देश में कोरोना ने पाँव पसारने शुरू किये तो देश में सबसे पहले स्कूल और कॉलेज बंद किये गए. लेकिन जब अनलॉककी प्रक्रिया शुरू हुई तो सबसे पहले क्या खुला? शराब की दुकानें खोली गई. क्योंकि इससे राज्य सरकारों का खजाना भर रहा था. इसके लिए किसी भी राजनीतिक पार्टियों ने आपत्ति नहीं जताई कि कोरोना है, मत खोलिए शराब दुकानें. और तो और जब शराब की दुकानें खोली तो बाकायदा प्रशासन ने नियम कायदे बनायें ताकि शराब खरीदने वालों को कोई दिक्कत ना हो. राज्यसभा के चुनाव हुए तब तो किसी भी पार्टी ने आपत्ति नहीं जताई. बिहार में चुनाव की तैयारियां शुरू हो गई तो किसी ने भी आपत्ति नहीं जताई. लेकिन जैसे ही बारी परीक्षाओं की आई तो सभी पार्टियों को छात्रों के रूप में एक बड़ा वोट बैंक नज़र आने लगा और अचानक सभी पार्टियाँ छात्रों की हितैषी बन गई.

कोरोना कम से कम एक साल तो कहीं जाने वाला है नहीं. लोगों ने धीरे धीरे मास्क और सैनेटाईजर के साथ जीना सीखना शुरू कर दिया है. फैक्ट्री और ऑफिस खुल चुके हैं ताकि अर्थव्यवस्था को नुकसान न हो. चुनाव आयोजित हो रह रहें ताकि राजनीति को नुकसान न हो. ट्रेन, बस और हवाई सेवा शुरू हो चुकी है. लोग बेधड़क एक जगह से दूसरी जगह तक सफ़र कर रहे हैं. लेकिन सारा खतरा बस छात्रों के लिए है. राज्य सरकारें और विपक्षी पार्टियाँ छात्रों का डर दूर करने की बजाये छात्रों में डर फैला रही है. ये पार्टियाँ समझने को तैयार नहीं कि इन परीक्षाओं में और देरी करने से आईआईटी के अकादमिक कैलेंडर और अभ्यर्थियों के लिए गंभीर परिणाम हो सकते हैं. लाखों विद्यार्थियों के लिए यह अकादमिक सत्र बेकार चला जाएगा.’

केंद सरकार ने अपनी तरफ से छात्रों की सहूलियत के लिए कई कदम उठायें हैं. जेईई परीक्षा के सेंटर्स 570 से बढ़ाकर 660 कर दिए हैं, वहीं नीट परीक्षा के सेंटर्स 2846 से बढ़ाकर 3843 कर दिए गए हैं. जेईई मेन परीक्षा के लिए तय 8 शिफ्टों को भी 12 कर दिया गया है. पहले एक शिफ्ट में 1.32 लाख विद्यार्थी परीक्षा देते थे लेकिन अब हर शिफ्ट में अब सिर्फ 85,000 प्रतिभागी परीक्षा दे पाएंगे. छात्रों को ज्यादा ट्रैवल न करना पड़े, इसके लिए कई छात्रों को उनका पसंदीदा सेंटर दिया गया है. परीक्षा हॉल में छात्रों को सोशल डिस्टेंसिंग के साथ बैठाने की व्यवस्था की गई है. तो क्या राकी सरकार छात्रों को परीक्षा केंद्र तक पहुँचाने की व्यवस्था भी नहीं कर सकती? बजाये इसके कि छात्रों की मदद के लिए विपक्षी दल और राज्य सरकारें केंद्र सरकार का सहयोग करें, वो छात्रों में डर का माहौल बनाने में लग गई है.