एक आंख से क्रिकेट खेला लेकिन फिर भी बड़े बड़े गेंदबाजों को अच्छे से धोया।

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भारत ने दुनिया को कई बेहतरीन खिलाड़ी दिए है।  सुनील गावस्कर,सचिन तेंदुलकर,वीवीएस लक्ष्मण,वीरेंद्र सहवाग,एमएस धोनी एक से बढ़कर एक,इन्ही खिलाड़ियों के बीच भारतीय क्रिकेट ने दुनिया को एक ऐसा बल्लेबाज भी दिया जो एक आंख से दिव्यांग था लेकिन अपनी शारीरिक कमजोरी को उसने कभी अपनी बैटिंग पर हावी नही होने दिया और दुनिया के बड़े बड़े गेंदबाजों को निशाना बनाकर जमकर रन लूटे। अपने बल्ले से उनकी अच्छे से दावत पानी की। जमके कूटा।

जी हाँ, ऐसे ही क्रिकेटर थे नवाब पटौदी, 70 के दशक में दुनिया में एक से बढ़ के एक गेंदबाज था लेकिन नवाब साहब उन सबका डटकर मुकाबला करते दिखाई देते थे।

पटौदी साहब की आंख जाने की स्टोरी भी बड़ी दिलचस्प है।

दरअसल 1 जुलाई 1961 को मैदान पर खूब मेहनत करने के बाद जैसे ही वो घर के लिए निकले तो उनकी कार के सामने दूसरी कार आ गयी और दोनो कारो की इस टक्कर में नवाब पटौदी की आंख में कांच ला टुकड़ा घुस गया। काफी ईलाज भी हुआ लेकिन उस आंख में कुछ खास लाभ नही हुआ और उनकी आंख खराब हो गई। ये बात उस टाइम की है जब आज की तरह तकनीकें तब मौजूद नही थी।बाद में उन्होने कॉन्टेक्ट लेंस लगाना शुरू किया जिससे उन्हें हर चीज दो दिखाई देती थी। ये सब इसलिए होता था क्योकि आंख बुरी तरह से डैमेज थी।

लेकिन पटौदी साहब के क्रिकेट का जज्बा फिर भी कम नही हुआ। उन्होने इस बात को मानने से साफ मना कर दिया की उनका क्रिकेट करियर खत्म हो चुका है।  अपनी बायोग्राफी में उन्होंने लिखा कि आंख गवांने से ज्यादा दुख उन्हें उस साल ना खेलने का हुआ।
नवाब साहब ने अपनी चोट के छह महीने बाद भारत की ओर से इंग्लैंड के खिलाफ डेब्यू टेस्ट मैच खेला और मद्रास में खेले अपने तीसरे ही टेस्ट में जोरदार शतक ठोककर भारत को इंग्लैंड के खिलाफ पहली सीरीज जितवा दी।

दाहिने हाथ के बल्लेबाज नवाब पटौदी की बल्लेबाजी का ही कमाल था कि सबने उनकी प्रतिभा को सलाम किया। उन्हें भारतीय टीम की कमान सम्भालने का भी मौका मिला। जहां उन्होंने भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाने में कोई कोरो कसर बाक़ी नही छोड़ी। अपने पूरे क्रिकेट करियर के दौरान 46 टेस्ट मैच खेलने वाले पटौदी ने लगभग 35 की औसत से 2,793 रन बनाए। उनके नाम 6 शतक और एक दोहरा शतक भी दर्ज था। उनके बेहतरीन खेल की बदौलत 1964 में उन्हें अर्जुन अवार्ड और 1966 में पद्मश्री से नवाज़ा गया।

साल 2011 में लंग इंफेक्शन के चलते इस खिलाड़ी ने दुनिया को अलविदा कह दिया।
वाकई ऐसे क्रिकेटर विरले ही मिलते है।

भारतीय क्रिकेट को नई ऊंचाइयों पर पहुँचाने वाले ऐसे क्रिकेटर को दिल से सलाम करने का मन करता है।