न घर की रही न घाट की रही शिवसेना

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महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों हर घंटे इतने मोड़ आ रहे हैं जितने किसी टीवी सीरियल में भी नहीं आते. सत्ता की मलाई खाने की कोशिश कर रही शिवसेना के आगे से कभी NCP तो कभी कांग्रेस थाली खिंच ले जा रही हैं और शिवसेना बस टुकुर टुकुर देख रही है. सेना नेता संजय राउत भाजपा को धमकी देते फिर रहे थे कि उनके पास 175 विधायकों का समर्थन है लेकिन सच तो ये है कि उनके पास क्या है और क्या नहीं खुद उन्हें भी नहीं पता. किसी को भी सरकार बनाने में असमर्थ देख राज्य में राष्ट्रपति शासन लग गया लेकिन मीटिंग का दौर अब भी जारी है.

भाजपा ने सरकार बनाने से इनकार किया तो राज्यपाल ने दूसरी सबसे बड़ी पार्टी शिवसेना को बुलाया लेकिन  एनसीपी चीफ शरद पवार के साथ बैठक और सोनिया को फोन लगाने के बाद भी उद्धव सोमवार को तय समय पर राज्यपाल को दोनों दलों के समर्थन की चिट्ठी नहीं सौंप पाए. सोमवार को देर शाम जब आदित्य ठाकरे अन्य शिवसेना नेताओं के साथ राज्यपाल से मिलकर गवर्नर हाउस से बाहर निकले तो उनके चेहरे लटके हुए थे. राज्यपाल ने उन्हें और समय देने से मना कर दिया और तीसरी बड़ी पार्टी एनसीपी को सरकार बनाने का न्योता दिया और उसे मंगलवार कि रात 8:30 बजे तक का समय दिया है विधायकों का समर्थन पत्र  सौंपने के लिए.

अभी तक एनसीपी सारे खेल को बड़े आराम से देख रही थी लेकिन जैसे ही उसे राज्यपाल का बुलावा आया शरद पवार ने अपने पत्ते चलने शुरू कर दिए. इनसब के बीच भाजपा से 30 साल पुरानी दोस्ती तोड़ कर शिवसेना बुरी तरह फंस गई. क्योंकि मीडिया में चल रही ख़बरों के मुताबिक़ शिवसेना से मात्र 2 सीट कम पाने वाली एनसीपी भी अब ढाई साल के लिए अपना CM चाहती है. जबकि 5 सालों के लिए शिवसेना आदित्य ठाकरे को मुख्यमंत्री बनाना चाहती है. एनसीपी का ये भी कहना है कि मुख्यमंत्री आदित्य नहीं बल्कि शिवसेना का कोई वरिष्ठ बने.

अब शिवसेना के सामने मुश्किल ये है कि ना तो वो एनसीपी की शर्त मान कर अपने 5 साल का CM वाला सपना छोड़ सकती है और ना ही भाजपा के पास वापस जा सकती है. अब वो बस शिवसेना के अगले कदम का इंतज़ार कर रही है. एनसीपी का कहना है कि जो भी फैसला होगा वो कांग्रेस के साथ मिलकर होगा क्योंकि दोनों पार्टियों ने मिलकर चुनाव लड़ा है जबकि कांग्रेस अपनी सेक्युलर छवि की तिलांजलि दे कर भगवा पार्टी शिवसेना के साथ जाने में जल्दी नहीं करना चाहती.

कांग्रेस अपने नफा नुक्सान पर एक नहीं कई दफे विचार कर रही है. सरकार गठन में देरी पर एनसीपी चीफ शरद पवार ने कहा कि मैं कांग्रेस से बात करूंगा. हालांकि, कांग्रेस और एनसीपी के बैठक के सवाल पर शरद पवार ने कहा कि कैसी बैठक? मुझे नहीं पता. दरअसल बात ये है कि ना तो कांग्रेस और ना ही एनसीपी को शिवसेना पर भरोसा है. कांग्रेस और एनसीपी दोनों चाहती है कि सत्ता का जो भी बंटवारा हो वो ठोस हो. कहीं ऐसा न हो कि खुद ढाई साल तक अपना CM बनवा कर शिवसेना वावास भाजपा की तरफ चली जाए क्योंकि उसकी विचारधारा और एजेंडा भाजपा से ही मिलती है.

उनके सामने 2014 का उदाहरण भी है जब भाजपा से अलग होने के बाद फिर शिवसेना उसके साथ मिल गई थी. कहाँ तो शिवसेना भाजपा के साथ तो 50 -50 चाहती थी और अब उसे 50 तो छोडो, 25 भी मिलता दिखाई नहीं दे रहा क्योंकि राज्य में राष्ट्रपति शासन लग चूका है.