NOTA दबाने से अच्छा किसी का गला दबा दें

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इस वक्त भारत में चुनावों की सरगर्मी ज़ोरों पर है ऐसे समय पे NOTA यानी none of the above का ज़ोरों-शोरों से प्रचार किया जा रहा है. लोग इस बात से बड़े उत्साहित हैं की अगर उन्हें कोई… भी candidate पसंद नहीं आता तो वो nota का बटन दबा सकते हैं. मगर क्या ऐसे करना सही है? ये सोचने से पहले हमें nota को पूर्ण रूप से समझ लेना होगा.

nota का जिक्र भारत में 2009 में होना शुरू हुआ था जब चुनाव आयोग ने उच्चतम न्यायालय में nota को EVM में जोड़ने की बात कही थी. हालांकि उस वक्त की केंद्र सरकार को चुनाव आयोग का ये फैसला कुछ ज़म नहीं रहा था  सरकार इस विकल्प को ईवीएम मशीन में नहीं जोड़ना चाहती थी।

आखिर में 2013 में supreme court ने इसके पक्ष में फैसला सुनाया. लेकिन जयादा तर देशो में अगर जनता nota को सबसे अधिक वोट देती है तो ऐसे मामले में, चुनाव आयोग के पास 3 विकल्प होते है चुनने के लिए.

पहला  कार्यालय को ख़ाली रखना

दूसरा .. नियुक्ति के ज़रिये उस पद को भरना

और तीसरा ,,, एक और चुनाव करवाना

लेकिन अफ़सोस की बात है की हमारे देश में ऐसा कोई system नहीं है इसलिए अगला सबसे ज्यादा वोट पाने वाला candidate जीत जाता है।

उदाहरण के रुप में मान लीजिये की किसी भी निर्वाचन क्षेत्र मे अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों के 3 उम्मीदवार खड़े किये गये है – लेकिन आपको उनमे से कोई भी candidate ज़िम्मेदार नज़र नहीं आता. अपके साथ-साथ ज्यादातर जनता उन्हे वोट नही देना चाहती और NOTA का इस्तेमाल करना चाहती है। मान लेते हैं कि इन तीनो उम्मीदवारों के नाम A,B और C हैं। इस निर्वाचन क्षेत्र मे कुल 10,000 मतदाता है और यह मानते हुये कि शत प्रतिशत मतदान हो रहा है,

उनमे 9000 वोटर्स NOTA का बटन दबाते हैं। बाकी के बचे हुये 1000 वोटर्स जो वोटिंग करते है, उसके नतीजे कुछ इस प्रकार से हैं: –

A और B दोनों को 333 vote मिलते है, और C को 334 वोट मिलते है 

कुल मिलकर 1000 वोट ही मिलते हैं मगर फिरभी उनमे से एक उमीदवार की जीत हो जाती है.

नतीजा ये निकलता है की candidate C की जीत हो जाती है. यह बात हैरानी वाली तो है लेकिन ये नियम हमारी सरकारों ने कुछ इसे  ही बनाये हैं, इसीलिए हम आपको यही हिदायत देते है की हो सके तो  सभी उमीदवारों में से सबसे योग्य candidate को चुन कर उसे वोट जरूर दें.

जो लोग सोचे समझे बिना ही NOTA-NOTA की रट लगाये ज़ा रहे है ज़रा ठन्डे दिमाग से सोचें.

पूर्व चुनाव आयुक्त एस.वाइ. कुरैशी ने पिछले साल के चुनावों को मद्दे नज़र रखते हुए कहा कि नोटा का चुनाव परिणामों पर कोई असर नहीं होगा।

भले ही nota फिलहाल असरदार विकल्प न हो लेकिन इसे जारी रखन भी ज़रूरी है क्यूंकि इससे कुछ हद तक फर्जी वोटों को रोकने में मदद मिलती है । साथ ही साथ हम ये भी उम्मीद करते हैं कि  चंद राजनीतिक दलों पर इसका कुछ प्रभाव पड़े और वो अगली बार एक बेहतर उमीदवार को खड़ा करे.