सरकार के UAPA बिल से विपक्ष को लगी मिर्ची !

2209

पिछले कुछ दिनों से भारत की कानूनी व्यवस्ताओं में आने वाले बदलावों को लेकार चर्चाएँ बढ़ गई है. दरसल NDA देश की सुरक्षा से जुड़े कानून में कुछ नए अंश जोड़ रही है. पिछले हफ्ते, इस unlawful activities prevention amendment act (UAPA) को वोटिंग के बाद लोकसभा में पास कर दिया गया. इस बिल के पक्ष में 287 जबकि विपक्ष में महज 8 वोट पड़े. बिल को पास करते वक्त अमित शाह ने कहा था की हमें आतंक के खिलाफ कड़े कानून की जरूरत है. ये बिल देश की सुरक्षा के लिहाज़ से बेहद महत्वपूर्ण है. अब इसे राज्यसभा में भी पास कर दिया गया है.

ये बिल देश में आतंकवाद पर लगाम कसने के तरफ सबसे बड़ा कदम लग रहा है. UAPA बिल के तहत केंद्र सरकार शक के दायरे में आने वाले संगठनो को आतंकी संगठन घोषित कर सकती है. ऐसा तब हो सकता है जब आतंक से जुड़े किसी भी मामले में उनका envolvment या किसी तरह का कोई कमिटमेंट पाया जाता है. दूसरा की वो आतंकवादवादी हमले की तैयारी करते पकड़ा जाए, वो आतंकवाद को बढ़ावा देना का प्रयास करे. या फिर किसी आतंकी गतिविधियों में शामिल रहे होने के सबूत मिले.

इसके अलावा ये bill अब सरकार को यह अधिकार भी देता है कि इसके आधार पर किसी को भी व्यक्तिगत तौर पर आतंकवादी घोषित किया जा सके. राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की ताकत को और भी बढ़ा दिया गया है. अब तक के नियम के मुताबिक एक जांच अधिकारी को आतंकवाद से जुड़े किसी भी मामले में assets सीज करने के लिए पुलिस की इजाज़त नहीं लेनी पड़ेगी थी, लेकिन अब यह bill इस बात की अनुमति देता है कि अगर आतंकवाद से जुड़े किसी मामले की जांच nia का कोई ऑफिसर करता है तो उसे इसके लिए सिर्फ एनआईए के high rank officers को ही जवाबदेही देनी होगी.

इस संशोधनों के बाद अब एनआईए को ऐसी संपत्तियों को कब्जे में लेने और उनकी मुख रूप से जाँच करने का अधिकार मिल जाएगा, जिनका आतंकी गतिविधियों में इस्तेमाल किया गया हो. अब इसके लिए एनआईए को राज्य के पुलिस महानिदेशक से अनुमति लेने की जरुरत नहीं होगी. आप को बता दें की अब तक के नियम के हिसाब से ऐसे किसी भी मामले की जांच डिप्टी सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (डीएसपी) या असिस्टेंट कमिश्नर ऑफ पुलिस (एसीपी) रैंक के अधिकारी ही किया करते थे. लेकिन अब नियमों में किये गए बादलों के बाद ये अधिकार एनआईए के अफसरों को सौप दिए गए हैं.

कांग्रेस आज एनआईए को दिए जा रहे अधिकार और UAPA में लाये गये संशोधनों का विरोध कर रही है तो यह कोई नयी बात नहीं है क्योंकि आतंकवाद के प्रति उसकी नरम रवैया बरसों पुरानी है और इसकी सज़ा देश पहले ही भुगत चुका है. अगर आपको साल 2004 को याद हो तो केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में UPA गठबंधन की सरकार बनते ही जो काम सबसे पहले किये गये थे उनमें आतंकवाद निरोधक कानून पोटा यानि prevention of terrorism act को हटाना के था. अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद के दोनों सदनों की बैठक बुलाकर इस कानून को पास कराया था और इस कानून को खत्म करने का चुनावी वादा कांग्रेस ने किया था इसलिए मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही उस कानून को खत्म कर दिया गया. खामियाजे के तौर पर आतंकवादियों के हौसले बुलंद होते गए. जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु जैसे राज्यों के अलावा राजधानी दिल्ली तक बम धमाकों की गूंज से दहल गयी थी?

नरेंद्र मोदी सरकार आतंकवाद को जड़ से उखाड़ने की दिशा में अपने पहले ही कार्यकाल से ही काफ़ी एक्टिव दिखी है और यही वजह रही कि 2014 से पहले जहाँ देश में आतंकवादी घटनाओं की सीमाएं पार हो गयीं था, वहीं मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सरकार की आतंकवाद के प्रति सख्त नीति का असर दिखा. जम्मू-कश्मीर को अपवाद मानें तो मोदी सरकार के शासन में देश आतंकवाद की घटनाओं से लगभग मुक्त रहा और सीमा पार आतंकवाद को भी लगातार मुँहतोड़ जवाब दिया गया.