नेतन्याहू युग ख़त्म, क्या इनके हाथों में होगी इजराइल की किस्मत ?

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ख़बर आ रही है कि आने वाले चुनावों में गेंट्ज़ ने नेतन्याहू को पटखनी दे दी, अब वे अगले प्रधानमंत्री होंगे. बेनी गेंट्ज़ अपने दौर में नेशनल हीरो रहे हैं, इन दिनों वो इजराइल के सबसे लोकप्रिय नेता बनकर उभरे हैं. लेकिन क्या सच में ऐसा ही है ? या वास्तविकता इससे थोड़ी अलग है.

इजराइली संसद में पहुँचने के लिए प्रतिनिधियों को एक सौ बीस सीटों पर जीत दर्ज करनी पड़ती है. इन एक सौ बीस में से इकतीस नेतन्याहू के हिस्से आई हैं और तैंतीस गेंट्ज़ के हिस्से.
इस वक्त इजराइल में माहौल कुछ ऐसी बन गया है जैसे मानों भारत के आम चुनावों में यूपीए और एनडीए दोनों को बराबर सीटें आ जाएँ. यहाँ कांग्रेस व भाजपा का नहीं बल्कि यूपीए व एनडीए का उदाहरण दिया जा रहा है, यानी कि तमाम दाव पेच, जोड़ घटाव के बावजूद भी मामला बराबरी पर आ कर अटक जाए. और कोई भी स्पष्ट बहुमत सिद्ध न कर पाए. इस वक्त इजराइल की सियासत का भी कुछ ऐसा ही हाल है.

ऐसी स्थिति बनते ही शुरू हो जाता है सियासी तनाव. अगर आपको भारतीय राजनीति की थोड़ी बहुत समझ हो तो आप अंदाज़ा लगा सकतें हैं कि राजनीतिक गलियारों में इसी स्थिति पर कितनी खीचतान मच जाएगी, कुछ वैसा ही इस वक्त इजराइल में हो रहा है. लेकिन वहां की एक बात काबिल-ए-तारीफ है कि वहां की राष्ट्रपति इस तनावपूर्ण माहौल में भी एक दुसरे के कट्टर विरोधी नेतन्याहू और गेंट्ज़ को गठबंधन सरकार चलाने के लिए मना रहे हैं.

लेकिन गेंट्ज़ ने अपनी ही ज़िद पकड़ रखी है, कि नहीं, अगले प्रधानमंत्री तो हम ही बनेंगे, हम अपनी गद्दी किसी और के साथ नहीं बाँटेंगे, वहीँ दूसरी ओर नेतन्याहू गेंट्ज़ की इस जिद से सहमति नहीं रखते हैं. नेतन्याहू की इस असहमति में, उनका राजनीतिक तजुर्बा छुपा हुआ है. बेनी गेंट्ज़ को सत्ता बाटना मंजूर नहीं है वहीँ नेतान्याहू इस गंठजोड़ को मंजूरी देने को तैयार दिख रहे हैं. उनका मानना है की वो विरोधी होने के बावजूद एक साथ सरकार चलने की कोशिश कर सकते हैं. लेकिन गेंट्ज़ तो अपनी ही बात पर अड़े हुए हैं.

इस असमंजस की स्थिथि को “द राइज़ ऑफ़ बेनी गेंट्ज़” का नाम दिया जा रहा है. आपको बता दें की पिछले 1 साल में इजराइल में ये तीसरा चुनाव था जिसके नातेज़े ने प्रधानमंत्री की कुर्सी को फिर से मझधार में अटका दिया है, अगर नेतन्याहू की बात करें तो वो पिछले 10 सालों से इज़राइल के प्रधानमंत्री हैं जबकि बेनी गेंट्ज़ ने काफी लंबा समय तय किया है यहां तक पहुंचने के लिए, वो नेतान्याहू के प्रधानमंत्री बनने के समय से ही अपनी मेहनत के बलबूते पर एक जानामाना चेहरा बने हैं, उन्होंने सालों तक नेतान्याहू के साथ मिल कर काम किया है, लेबनान-इजराइल वॉर, Egypt-इजराइल वॉर या फिर गाजा conflict इन सब मे इजराइल की तरफ से गेंटज ने बड़ी भूमिका निभाई है, लेकिन अगर लोकप्रियता और तजुर्बे की बात की जाये तो उस मामले में नेतान्याहू ही इजराइल के सब से पसंदीदा नेता है. लोगों का मानना है की नेतान्याहू को सत्ता का मोह त्याग देना चाहिए और गेंटज को मौका देना चाहिए, लेकिन अगर दोनों ही प्रतिनिधियों को लिए लगभग एक समान नजीते आये हैं तो इसे में
उस नेता को ही सत्ता त्याग देने की नसीहत क्यों… जो की अपने विरोधी के साथ मिल कर भी सरकार चलाने को राज़ी है ताकि एक बार फिर से देश को चुनावों पर एक मोटी रकम न खर्च करनी पड़े जैसे की अब तक बहुमत की सरकार न बन पाने की वजह से होता आया है. कुल मिला इन दोनों के लिए इजराइल के प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचना काफी उतार चढ़ाव भरा रहेगा.