भारत से तनाव के मद्देनज़र चीन और नेपाल ने भारत को घेरने के लिए चुपचाप उठा लिया ये कदम

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इन दिनों भारत का अपने दो पड़ोसियों के साथ तनाव चल रहा है. वो दो पड़ोसी हैं चीन और नेपाल. इस मौके का फायदा उठा कर चीन ने नेपाल को अपने पाले में कर लिया है. अपनी हर छोटी बड़ी जरूरतों के लिए भारत पर निर्भर रहने वाले नेपाल पर चीन की नज़र तो बहुत पहले से थी. लेकिन जब नेपाल में केपी शर्मा ओली के नेतृत्व में वामपंथी सरकार बनी तो वैचारिक रूप से भी नेपाल चीन के करीब जाने को छटपटाने लगा. भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के मद्देनज़र चीन और नेपाल ने आपस में व्यापारिक साझेदारी बढाने पर सहमती बना ली और एक बड़ा कदम उठा लिया.

अब चीन ने तिब्बत रूट के जरिये नेपाल तक सामान और रसद पहुँचाना शुरू कर दिया है. पिछले सप्ताह मेडिकल और निर्माण सामग्री ले कर पहला कार्गो चीन के शियान प्रान्त से तिब्बत के शिगास्ते पहुंचा. वहां से ट्रकों के जरिये ये ये औरती नेपाल तक पहुंचाई जा रही है. अभी तक अंतरराष्ट्रीय डिलीवरी के लिए नेपाल कोलकाता बंदरगाह का प्रयोग करता था. लेकिन अब उसने चीन के साथ समझौता किया है. इस समझौते के अंतर्गत अब नेपाल पूर्वी चीन के बंदरगाहों तियानजिन, लियानयूनगैंग, झांझियंग का इस्तेमाल अपना माल मंगवाने के लिए करेगा. पूर्वी चीन के बंदरगाहों से ये सामान तिब्बत पहुंचेगा और तिब्बत के रास्ते नेपाल में प्रवेश करेगा. चीन नेपाल से अपनी कनेक्टिविटी बढाने के लिए तिब्बत और नेपाल के बीच रेलवे लाइन बिछाने की योजना पर भी काम कर रहा है.

कोलकाता बंदरगाह से काठमांडू तक अंतरराष्ट्रीय कार्गो की डिलीवरी में करीब 35 दिनों का वक़्त लगता है. भारत और नेपाल के बीच सीधी कनेक्टिवि है इसके बावजूद 35 दिन लग जाते हैं. नेपाल को लगता है कि वो चीन के रास्ते जल्दी ही अपनी डिलीवरी मंगवा सकेगा. लेकिन ये रास्ता बहुत ही ज्यादा लम्बा और पेचीदा है. चीन के बंदरगाह से तिब्बत के शिगास्ते तक ट्रेन को पहुँचने में 10 दिनों का वक़्त लगता है. शिगास्ते में सामानों को ट्रक में लोड किया जाता है और वहां से नेपाल बॉर्डर तक आने में दो दिन का वक़्त लगता है. 2015 में आये भूकंप के बाद नेपाल के सड़कों की स्थिति बहुत ख़राब है. इसलिए नेपाल बॉर्डर पर सामानों को छोटी छोटी लौरियों में लोड कर के काठमांडू तक पहुँचाया जाता है. इसके अलावा चीन के रास्ते सामन मंगवाना नेपाल के लिए एक खर्चीला विकल्प है. लेकिन उसे चीन के करीब जाने की इतनी जल्दी मची है कि इसके लिए वो अपने आर्थिक हितों की तिलांजलि देने से भी नहीं हिचक रहा. हालाँकि नेपाल के व्यापारियों ने अपील की है कि सरकार को खर्चे का आंकलन करने के बाद ही कोई फैसला लेना चाहिए. क्योंकि भारत के रास्ते माल मगवाना ज्यादा आसान और सुविधाजनक है.