मोदी नही नेहरू गए थे क’श्मीर पर UN की मध्यस्तता कराने

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कश्मीर पर पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के मध्यस्तता करने के बयान के बाद देश की सियासत में उबाल आ गया .संसद में जम कर हंगामा हुआ और विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी से बयान देने की मांग करने लगा . हालाँकि कांग्रेस सांसद शशि थरूर की राय इस मुद्दे पर अपनी पार्टी से अलग थी और वो इस मुद्दे पर पूरी तरह से पीएम मोदी के साथ खड़े नज़र आये .

डोनाल्ड ट्रम्प के बयान के बाद शशि थरूर ने ट्वीट किया – “मुझे वाकई नहीं लगता है कि ट्रम्प को थोड़ा भी अंदाजा है कि वह क्या बात कर रहे हैं? या तो उन्हें किसी ने मामले की जानकारी नहीं दी या वह समझे नहीं कि मोदी क्या कह रहे थे या फिर भारत का तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को लेकर क्या रुख है. विदेश मंत्रालय को इस मामले पर स्पष्टीकरण देना चाहिए कि भारत ने कभी भी ऐसी किसी मध्यस्थता को लेकर कोई बात नहीं की है.”

लेकिन शशि थरूर की पार्टी कांग्रेस उनकी बातों से इत्तेफाक नहीं रखती. कांग्रेस इस मुद्दे पर पीएम मोदी का संसद में बयान चाहती है. जिस मुद्दे पर ट्रम्प के बचकाने बयान को व्हाइट हाउस ने भी तवज्जो देने से इनकार कर दिया और अपने प्रेस रिलीज में में कश्मीर समस्या को शामिल ही नहीं किया, जिस मुद्दे पर अमेरिका के सांसद और वहां की मीडिया ही ट्रम्प कि बखिया उधेड़ रही है उस मुद्दे पर कांग्रेस समेत विपक्षी पार्टियाँ ट्रम्प की बातों पर विश्वास कर अपने प्रधानमंत्री पर अविश्वास कर रही है. कांग्रेस अप्रत्यक्ष रूप से मोदी पर ये आरोप लगा रही है कि उन्होंने कश्मीर के द्विपक्षीय मुद्दे को त्रिपक्षीय बनाने की कोशिश की लेकिन कांग्रेस को ये भूलना नहीं चाहिए कि जो हमारे कश्मीर का जो आधा हिस्सा पाकिस्तान के पास है उसका जिम्मेदार कौन है? कांग्रेस को ये भूलना नहीं चाहिए कि उनकी की पार्टी के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू कश्मीर को संयुक्त राष्ट्र में ले कर गए जिस कारण कश्मीर के बीचों बीच लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल खिंच गई . नेहरू 31 दिसंबर 1947 को भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मसले को लेकर संयुक्त राष्ट्र गए और भारत आधा कश्मीर गँवा बैठा . कांग्रेस देश की हर सफलता का श्रेय नेहरू को देती है लेकिन जब कश्मीर समस्या का श्रेय लेने की बारी आती है तो मुंह मोड़ लेती है .

क्या हुआ था हम आपको बताते हैं .

भारत की आजादी के वक़्त देश में 565 रियासतें थी . इन रियासतों के सामने विकल्प था कि वो या तो भारत और पाकिस्तान में से किसी एक में मिल जाएँ या फिर स्वतंत्र रहें . इन्ही रियासतों में से एक था कश्मीर रियासत . चूंकि देश का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ था और कश्मीर की आबादी मुस्लिम बहुल थी इसलिए पाकिस्तान चाहता था कि कश्मीर पाकिस्तान में मिल जाए . लेकिन कश्मीर के महाराजा हरी सिंह हिन्दू थे और उनकी मंशा थी कि कश्मीर स्वतंत्र रहे .

15 अगस्त 1947 को भारत आज़ाद हुआ, लेकिन हरी सिंह ने अब तक कश्मीर के बारे में कोई फैसला नहीं लिया था. फिर आई तारीख 22 अक्टूबर 1947 . 250 से 300 ट्रकों में भर कर पाकिस्तानी कबिलाइयों ने जम्मू- कश्मीर पर हमला कर दिया . वो श्रीनगर की और बढ़ने लगे . कोई रास्ता न देख महाराजा हरी सिंह ने 24 अक्टूबर को भारत से मदद मांगी . लेकिन भारत चाहता था कि मदद एक ही सूरत में होगी अगर हरी सिंह कश्मीर के भारत में विलय के घोषणापात्र पर दस्तखत कर दें . हरी सिंह के पास कोई रास्ता नहीं था . 26 अक्टूबर 1947 को उन्होंने कश्मीर के भारत में विलय के घोषणापात्र पर दस्तखत कर दिया . इस घोषणापात्र को इंस्ट्रूमेंट ऑफ़ एक्सेशन कहते हैं . कश्मीर अब भारत का हिस्सा बन चूका था . 26 अक्टूबर की रात, विलय के घोषणापात्र पर दस्तखत करने के बाद महाराजा हरी सिंह ने अपने अंगरक्षक कप्तान दीवान सिंह से  कहा – मैं सोने जा रहा हूं. कल सुबह अगर तुम्हें श्रीनगर में भारतीय सैनिक विमानों की आवाज़ सुनाई न दे, तो मुझे नींद में ही गोली मार देना.’

27 अक्टूबर को पहली किरण के साथ ही भारतीय फ़ौज विमानों के जरिये कश्मीर में दाखिल हुई . पाकिस्तान समर्थक कबीलाई निकले तो थे श्रीनगर पर कब्ज़ा करने के लिए लेकिन इसी बीच पाकिस्तान ने चालाकी से गिलगित पर कब्ज़ा कर लिया और वहां महाराज के प्रतिनिधि को कैद कर अपनी एक अंतरिम सरकार बना ली और पाकिस्तान का झंडा भी फहरा दिया गया . गिलगित जम्मू कश्मीर का हिस्सा था और महाराजा हरिसिंह कश्मीर का भारत में विलय के घोषणापात्र पर दस्तखत कर चुके थे इसलिए गिलगित में पाकिस्तान का कब्ज़ा अवैध कहलाया .

जिन्ना से बात करने माउंटबेटन पाकिस्तान गए . उन्होंने जिन्ना से बात की तो जिन्ना ने कहा – दोनों देश एक साथ पीछे हटें. जिन्ना की इस बात से साबित हो गया कि कश्मीर पर हमला करने वाले कबीलाईयों को पाकिस्तान का समर्थन मिला हुआ था . माउंटबेटन ने जिन्ना को जनमत संग्रह के लिए मनाने की कोशिश की लेकिन जिन्ना ने कहा कि जब तक भारतीय फ़ौज कश्मीर से निकलती नहीं तब तक जनमत संग्रह नहीं हो सकता . 2 नवम्बर को नेहरू ने एक भाषण दिया और कहा – कश्मीर के हालात सुधरने के बाद संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह कराया जाएगा  . पाकिस्तान से आने के बाद माउंटबेटन समझ चुके थे कि अब ये विवाद दोनों देश आपस में नहीं सुलझा पायेंगे इसलिए उन्होंने सलाह दी कि संयुक्त राष्ट्र संघ की मदद ली जाए .

गृहमंत्री पटेल UN जाने वाली बात से सहमत नहीं थे . लेकिन फिर नेहरू को लगा कि इसके अलावा अब कोई चारा नहीं है तो पटेल ने कुछ नहीं कहा . 31 दिसंबर 1947 को भारत और पाकिस्तान कश्मीर के मसले को लेकर संयुक्त राष्ट्र गए और 1 जनवरी 1948 को संयुक्त राष्ट्र ने दोनों देशों के बीच सीजफायर यानी युद्ध विराम की घोषणा कर दी . यानी दोनों देशों की सेनाएं जहाँ थी वहीँ रुक गई और उनके बीच खिंच गई लाइन ऑफ़ कण्ट्रोल और इस तरह कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के पास चला गया जिसे पाक अधिकृत कश्मीर कहते हैं . आज ट्रम्प के बेतुके बयान के लिए पीएम मोदी से सवाल पूछने वाली कांग्रेस को भी तो जवाब देना चाहिए कि देश ने अपना आधा कश्मीर क्यों गंवाया ?