प्रधानमंत्री मोदी ने अपने रोड शो के दौरान मुस्लिमों पर बरसाए फूल

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वाराणसी को जब कहीं लिखा जाता है तो ‘महादेव की नगरी’ लिखा जाता है. पतित पावनी माँ गंगा के किनारे बसे इस शहर का एक और नाम है काशी. वज़ह ये कि देवों के देव महादेव यहाँ काशी विश्वनाथ बन बैठे हुए हैं.

हिन्दुओं के देव महादेव का कहा जाने वाला ये शहर असलियत में सिर्फ महादेव का ना होकर सभी का है. ये हमेशा से अपने भीतर गंगा जमुनी तहजीब को समेटे हुए आगे बढ़ा है. मैं जब वाराणसी में गंगा- जमुनी तहजीब की बात करता हूँ तो मुझे हमेशा यहाँ का एक ही सीन याद आता है जो मेरे दिमाग में बसा हुआ है.

एक घाट है यहाँ ‘शिवाला’, ज़ाहिर है कि घाट का नाम महादेव के नाम पर ही रखा गया है. एक साल मुहर्रम पर यहाँ से गुज़रते वक़्त मैंने इस घाट पर कुछ मुस्लिमों को गंगा में ताजिया बहाते हुए देखा. पीछे पीले रंग की पट्टी पर काले रंग से लिखी हुई ‘शिवाला’ घाट की पहचान, सामने बहती माँ गंगा, और गंगा में ताजिया बहाते मुस्लिम लोग, ये सब देखना मन को एक अलग ही सुकून दे गया था.

एक ऐसा ही सुकून देने वाला नज़ारा वाराणसी में मुझे फिर से दिखाई दिया 25 अप्रैल को.

वाराणसी उस दिन पूरी की पूरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ही हुई जा रही थी. हर तरफ उनके लिए ही नारे लग रहे थे. यहाँ के लोग आपस में बात कर रहे थे,

“अबकी बार का रोड शो में 2014 वाला से भी ज़्यादे बरियार है, 2014 वाला से ज्यादा भीर है.”

वाराणसी का हर तबका तो इस रोड शो में शामिल मालूम पड़ता ही था, साथ ही विदेश से आए कुछ टूरिस्ट भी मोदी का मास्क लगाए मोदी-मोदी कर रहे थे.

यहाँ  हर कोई प्रधानमंत्री मोदी को पास से देखना चाहता था. यही वज़ह रही कि दिन के दूसरे पहर वाराणसी मानो ठहर सी गई. कुछ लोग तो अपनी दुकानें तक बंद कर पान खाते हुए रोड शो देखने चल दिए.

शिवाला की सड़क पर इतनी भीड़ थी जितनी कि कभी नहीं हुई. एक काफिले को देखने के लिए सड़क पर लोगों का हुजूम लगा हुआ था. हो भी क्यों ना, ये काफिला था देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का.

शिवाला की इस सड़क के किनारे बसा इलाका मुस्लिम बाहुल्य वाला इलाका कहा जाता है. और जिस नेता का काफिला उस इलाके की सड़क पर बढ़ रहा था उसे मीडिया और विपक्षी मिलकर मुस्लिमों का दुश्मन बताते रहते हैं, बनाते रहते हैं.

फिर भी मुझे इस सड़क पर मुस्लिमों का जमावड़ा नज़र आया. इन सभी के सिरों पर टोपी नज़र आई और हाथों में नज़र आईं गुलाब की पंखुरियों से भरी हुई टोकरियाँ. ये सब मिलकर यहाँ प्रधानमंत्री की रैली का इंतज़ार कर रहे थे.

घंटों से प्रधानमंत्री की रैली का इंतज़ार कर रहे ये मुस्लिम देश के मीडिया को जीभ निकालकर चिढ़ाते हुए से मालूम हुए. उनके चेहरों के भाव बता रहे थे कि उन्होंने मीडिया की बात मानी ही नहीं, वो भड़काने वालों के भड़काने से भड़के ही नहीं. उनके लहजे में मुझे प्रधानमंत्री के लिए नफरत की जगह इंतज़ार दिखाई दिया.

तेज़ धूप में प्रधानमंत्री का इंतज़ार कर रही इन आँखों में मुझे उस वक़्त अजीब सी ख़ुशी दिखी जब इन्हें दूर से आता हुआ काफिला नज़र आया. इस काफिले में सबसे आगे नारा लगाते हुए चलते नज़र आए भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के समूह. उनके पीछे-पीछे बढ़ता आ रहा था मोटर साइकिलों का विशाल जत्था.

मोटरसाइकिलों के इस विशाल जत्थे के पीछे मौजूद थीं सुरक्षा दस्ते की सायरन बजाती हुई गाड़ियां. और सुरक्षा दस्ते की इन गाड़ियों के पीछे एक ट्रक पर सवार दिखाई दिए जेपी नड्डा, शाज़िया इल्मी और शाहनवाज़ हुसैन.

इस ट्रक से बस कुछ ही पीछे नज़र आई वो गाड़ी जिसपर सवार थे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. हाथ जोड़कर खड़े नरेंद्र मोदी अपना इंतज़ार कर रही सारी जनता का मुस्कुराते हुए अभिवादन कर रहे थे. काफिले पर फूल बरस रहे थे और हर तरफ बस ‘मोदी-मोदी’ की ही गूँज सुनाई दे रही थी.

गाड़ी धीरे-धीरे काफिले के साथ आगे बढ़ रही थी. इसी दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नज़र टोपी लगाकर खड़े मुस्लिमों पर पड़ी. नरेंद्र मोदी ने ढेर से फूलों को अपनी अंजुली में भरा और उन्हें उन मिस्लिमों पर बरसा दिया.

उन सभी के चेहरे पर हंसी तैर गई. माहौल में गूँज रहे नारे एकाएक और तेज़ हो गए. इस पूरे नज़ारे को देखकर ऐसा मालूम हुआ जैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मीडिया रिपोर्ट्स और विपक्ष के बयानों को ठेंगा दिखा रहे मुस्लिमों की पीठ ठोंकते हुए कहा हो,

“शाबाश मेरे भाइयों!”

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