मोदी और ट्रम्प की यारी, पाकिस्तान पर पड़ गई भारी

फ़्रांस के खुबसूरत शहर बिआरित्ज से जैसे ही G-7 में पीएम मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की मुलाक़ात की तस्वीरें सामने आईं पाकिस्तान में तहलका मच गया . इस मुलाक़ात ने पाकिस्तान में कितनी खलबली मचाई इस बात को आप इस घटना से समझिये की इमरान खान अपने मुल्क को शाम 6 बजे संबोधित करने वाले थे. लेकिन आखिरी वक़्त में इमरान खान के संबोधन का समय आगे बढ़ाना पड़ा और ऐसा लगता है कि फिर से उन्हें अपना भाषण लिखवाना पडा . पता तो सबको था कि बिआरित्ज में मोदी और ट्रम्प की मुलाक़ात होने वाली है. शायद इमरान खान ने उम्मीदें लगाई थी की जब मोदी और ट्रम्प की मुलाक़ात होगी तो ट्रम्प कश्मीर को लेकर भारतीय प्रधानमंत्री को खरी खोटी सुनायेंगे और फिर से मध्यस्थता की बात करेंगे. लेकिन मोदी और ट्रम्प तो ठहाके लगा रहे थे, एक दुसरे के हाथ ऐसे पकडे हुए थे मानो दो जिगरी दोस्त कई सालों बाद मिले हों.

इस मुलाक़ात के दौरान जहाँ पीएम मोदी ने साफ़ कह दिया कि जो भी मसले हैं वो भारत और पाकिस्तान आपस में सुलझा लेंगे और किसी तीसरे देश को कष्ट उठाने की कोई जरूरत नहीं है. तो कुछ दिनों पूर्व तक मध्यस्थता की बात करने वाले और कश्मीर को धर्म से जुड़ा मसला बताने वाले ट्रम्प ने एक बार फिर अपने बयान से पलटते हुए कहा कि उन्हें भरोसा है भारत और पाक आपस में सब ठीक कर लेंगे.

बस इसके बाद पाकिस्तान के अरमानों पर मानों पहाड़ टूट पड़ा हो. सारी रणनीतियाँ धरी की धरी रह गई. पाकिस्तान कितना अकेला पड़ चुका है उसकी बानगी आपको इमरान खान के संबोधन में देखने को मिलेगी जब वो कहते हैं की आज भले ही मुस्लिम देश पाकिस्तान के साथ नहीं खड़े लेकिन भविष्य में वो पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे. उनक इशारा UAE और बहरीन में नरेंद्र मोदी को मिल रहे तवज्जो और सम्मान की तरफ था.

अब वापस आते हैं ट्रम्प पर. आखिर अमेरिका कश्मीर पर बार बार बयान क्यों बदल रहा है? या यूँ कहें कि ट्रम्प बार बार बयान क्यों बदल रहे हैं कश्मीर पर ?

अमेरिका लम्बे अरसे से अफगानिस्तान में फंसा हुआ है और वहां से निकलने की जद्दोजहद कर रहा है. उसकी तालिबान के साथ शांति वार्ता भी जारी है. इसमें उसकी मदद कर रहा है पाकिस्तान. पाकिस्तान अपनी इसी स्थिति का फायदा उठाना चाहता है और इसी के एवज में वो अमेरिका को कश्मीर मामले में मध्यस्थता करने को बार बार कहता रहता है.

व्हाईट हाउस जानता है कि अफगानिस्तान से निकलने के अलावा पाकिस्तान से उसे अन्य किसी भी क्षेत्र में कोई भी मदद नहीं मिलने वाली. जबकि भारत वो देश है जो दुनिया की सबसे तेजी से बढती अर्थव्यवस्था है. साथ ही दुनिया भर के देशों के लिए सबसे बड़ा बाज़ार. अमेरिका और चीन के बीच ट्रेड वार जारी है. ऐसे में भारत से रिश्ते बिगाड़ने का जोखिम अमेरिका नहीं उठा सकता और अफगानिस्तान से निकलने तक पाकिस्तान को खुश रखना उसकी मज़बूरी है. इसलिए पाकिस्तान को खुश करने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प कश्मीर पर बयान जारी कर मध्यस्थता की बात कर देते हैं और जब मोदी के सामने आते हैं तो उनके सुर ऐसे बदले हुए होते हैं मानों कुछ कहा ही नहीं हो.

जब कश्मीर पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की बैठक बंद कमरे के भीतर हुई थी तब अमेरिका ने साफ़ साफ़ कहा कि कश्मीर भारत का आन्तरिक मामला है. इस मसले पर पाकिस्तान की तरफदारी करने वाला चीन अकेले पड़ गया. आधिकारिक तौर पर देखें तो अमेरिका पुरे मसले पर कहीं भी पाकिस्तान के साथ नहीं खड़ा है, सिवाय इसके कि वो समय समय पर कश्मीर पर एक दो बयान जारी कर देता है और पाकिस्तान उतने भर से ही खुश हो जाता है.

अमेरिका को लेकर आशंकित भारत से ज्यादा पाकिस्तान है. पाकिस्तान के न्यूज चैनलों पर चलने वाले डिबेट पर वहां के राजनीतिक विश्लेषक आशंका जाहिर करते हैं कि “तब क्या होगा जब अमेरिका, अफगानिस्तान से निकल जाएगा? फिर उसे पाकिस्तान की जरूरत क्यों होगी और फिर वो भारत जैसे मुल्क को छोड़ कर पाकिस्तान के साथ क्यों खड़ा होगा.” बस यही ये बताने के लिए काफी है कि अमेरिका बार बार कश्मीर पर बयान क्यों बदलता रहता है.

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