कुंभ में लगा है साधु-संतों का मेला, जानिए क्या है नागाओं का रहस्य…

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वह अर्धकुंभ, महाकुंभ में निर्वस्त्र रहकर हुंकार भरते हैं, शरीर पर भभूत लपेटते हैं, नाचते गाते हैं, डमरू ढपली बजाते हैं लेकिन कुंभ खत्म होते ही गायब हो जाते हैं.आखिर क्या है नागाओं की रहस्यमयी दुनिया का सच? कहां से आते हैं और कहां गायब हो जाते हैं ये साधु, आइए जानते हैं. कहा जाता है कि प्राचीन काल में ऋषि दत्‍तात्रेय ने नागा संप्रदाय की स्‍थापना की.आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए नागा संप्रदाय को संगठित किया. ये भगवान शिव के उपासक होते हैं.

नागा संन्यासी किसी एक गुफा में कुछ साल रहते है और फिर किसी दूसरी गुफा में चले जाते हैं. इस कारण इनकी सटीक स्थिति का पता लगा पाना मुश्किल होता है. इन में से बहुत से संन्यासी वस्त्र धारण कर और कुछ निर्वस्त्र भी गुप्त स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं.नागा संन्यासी किसी एक गुफा में कुछ साल रहते है और फिर किसी दूसरी गुफा में चले जाते हैं.केवल कुंभ में ही ये दिखते हैं. उसके पहले और बाद में आम आबादी के बीच ये कहीं नहीं दिखते. आम आबादी से दूर ये अपने ‘अखाड़ों’ में रहते हैं.

इस कारण इनकी सटीक स्थिति का पता लगा पाना मुश्किल होता है. इन में से बहुत से संन्यासी वस्त्र धारण कर और कुछ निर्वस्त्र भी गुप्त स्थान पर रहकर तपस्या करते हैं.नागा साधु जंगल के रास्तों से ही यात्रा करते हैं. आमतौर पर ये लोग देर रात में चलना शुरू करते हैं. शंकराचार्य ने सनातन धर्म की स्‍थापना के लिए देश के चार कोनों में चार पीठों का निर्माण किया. उन्‍होंने मठों-मंदिरों की संपत्ति की रक्षा करने के लिए और धर्मावलंबियों को आतताईयों से बचाने के लिए सनातन धर्म के विभिन्न संप्रदायों की सशस्त्र शाखाओं के रूप में ‘अखाड़ों’ की शुरुआत की.यात्रा के दौरान ये लोग किसी गांव या शहर में नहीं जाते, बल्कि जंगल और वीरान रास्तों में डेरा डालते हैं. रात में यात्रा और दिन में जंगल में विश्राम करने के कारण सिंहस्थ में आते या जाते हुए ये किसी को नजर नहीं आते.कुछ नागा साधु झुण्ड में निकलते है तो कुछ अकेले ही यात्रा करते हैं.

नागा यात्रा में कंदमूल फल, फूल और पत्तियों का सेवन करते हैं. देश में आजादी के बाद इन अखाड़ों ने अपने सैन्‍य चरित्र को त्‍याग दिया. इन अखाड़ों के प्रमुख ने जोर दिया कि उनके अनुयायी भारतीय संस्कृति और दर्शन के सनातनी मूल्यों का अध्ययन और अनुपालन करते हुए संयमित जीवन व्यतीत करें. इस समय निरंजनी अखाड़ा, जूनादत्‍त या जूना अखाड़ा, महानिर्वाण अखाड़ा, निर्मोही अखाड़ा समेत 13 प्रमुख अखाड़े हैं.नागा साधु सोने के लिए पलंग, खाट या अन्य किसी साधन का उपयोग नहीं कर सकते. यहां तक कि नागा साधुओं को कृत्रिम पलंग या बिस्तर पर सोने की भी मनाही होती है. नागा साधु केवल जमीन पर ही सोते हैं. यह बहुत ही कठोर नियम है, जिसका पालन हर नागा साधु को करना पड़ता है.

आमतौर पर यह नागा सन्यासी अपनी पहचान छुपा कर रखते हैं.नागा साधुओं को रात और दिन मिलाकर केवल एक ही समय भोजन करना होता है. वो भोजन भी भिक्षा मांग कर लिया गया होता है. एक नागा साधु को अधिक से अधिक सात घरों से भिक्षा लेने का अधिकार है. अगर सातों घरों से कोई भिक्षा ना मिले, तो उसे भूखा रहना पड़ता है. जो खाना मिले, उसमें पसंद-नापसंद को नजर अंदाज करके प्रेमपूर्वक ग्रहण करना होता है.उससे पहले उसे लंबे समय तक ब्रह्मचारी के रूप में रहना होता है,फिर उसे महापुरुष तथा फिर अवधूत बनाया जाता है. अंतिम प्रक्रिया महाकुंभ के दौरान होती है जिसमें उसका स्वयं का पिंडदान तथा दण्डी संस्कार आदि शामिल होता है.