मुज़फ्फरनगर दंगे की ये दास्ताँ शर्तिया आपको रुला देगी

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आज सुबह सुबह जब मेरी आँख खुली तो मेरे हाथ मुज़फ्फ़रनगर दंगे को अपने में  समेटे एक अखबार हाथ लगा. जिससे एक बार  फिर से मेरी आँखों के सामने उस घटना का मंजर दौड़ गया जिसको भुलाना वाकई बहुत मुश्किल है. 
उस दंगे को आखिर मै कैसे भूल सकता हूँ जिसने ना जाने कितने परिवारों को अनाथ बना दिया, और ना जाने कितने लोग बेघर हो गए..

साल था २०१३ और तारीख थी २७ अगस्त

स्थान था-मुज़फ्फ़रनगर से महज २३ किलोमीटर दूर पड़ने वाला कवाल गाँव.


शाम होने को आई थी.एक बच्ची दौड़ती हुई अपने घर आई और अपने साथ छेड़छाड़ होने की बात घर वालो को बताई, जिसे सुनकर रिश्ते में मामा भांजे लगने वाले सचिन गौरव नाम के दो नौजवान अपने  घर से निकलकर शाहनवाज नाम के मनचले के घर पहुचे और अपनी अप्पति दर्ज कराई. . खाना  बीच में छोड़कर मनचले को समझाने निकले उन दोनों नौजवानों को नही पता था की आज का दिन उनकी जिन्दगी का आखिरी दिन है..बात इतनी बढ़ी की हाथापाई से शुरू हुई बात  हत्या तक पहुच गई, असल में गलती सिर्फ उन दोनों की ही नही थी आखिर अपनी बहन के साथ छेड़छाड़ कौन बर्दास्त करेगा शायद आप या मै भी नही.  शहनवाज को मौत की नींद सुलाने के बाद जैसे ही गौरव सचिन अगले चौराहे पर पहुचे तभी विशेष समुदाय की भीड ने उन्हें घेर लिया और बुरी तरीके से पीटने के बाद मौत के घात उतार दिया. हत्या की विभीत्सता का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते है की उन्हें मारने के लिए सिल बट्टे का भी प्रयोग किया गया.


२७ अगस्त  का वो मनहूस दिन तीन तीन जिंदगियो को खत्म कर गया.बाद में पुलिस पहुची और हत्या के ८ आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया लेकिन गिरफ्तार हुए लोगो को अचानक ही रात में  छोड़ दिया गया जिससे पूरे जिले में आक्रोश फ़ैल गया.. ७ सितम्बर को नगला  मंदौड़ के एक मैदान में हिन्दुओ ने महापंचायत बुलाई गई लेकिन महापंचायत में जाने वाले लोगो पर रस्स्ते में ही पथराव होने लगा,घायलो ने किसी तरह महापंचायत में पहुचकर आपबीती सुनाई तो वहां माहौल  और गर्म सा हो गया।माहौल देखकर तय हुआ की अब पुलिस प्रशासन के खिलाफ आवाज उठाई जायेगी. लेकिन उसी शाम फिर कुछ ऐसा हो गया जिसने पूरे जिले को दंगे की आग में झोक दिया. मंदौड़ के जिस मैदान में ये महापंचायत हुई उसके  ठीक  बगल में ही एक नहर पडती है जो आसपास के गाँवो को नंगला मंदौड़ से जोडती है, पंचायत में आये लोग जब अपने ट्रेक्टरो से नहर किनारे बनी उसी सडक से  वापिस लौट रहे थे तभी पहले से ही घात लगाये बैठे दंगाइयो ने उनपर हमला बोल दिया, कितने ही ट्रेक्टरो में आग लगाकर उन्हें नहर में फेंक दिया गया.कितने ही लोगो को बीच सडक पर काट दिया गया..बाद में क्रिया की भी प्रतिक्रिया हुई और धीरे धीरे दंगा पूरे मुज़फ्फरनगर.में फ़ैल गया. स्थिति  शयद सम्भल भी जाती लेकिन अचानक से ही मुज़फ्फ़रनगर के डिएम और एसएसपी का तबादला  कर दिया गया. जिससे स्थिति सुधरने की जगह और बिगड़ गई किचन में तवे पर रोटियां छोड़कर महिलाएं अपने मासूम बच्‍चों को सीने से लगाये इधर-उधर भाग रहीं थी, सड़कों का रंग-नहरों में बहने वाला बेरंग पानी लाल हो चुका था और मौत की चींखे मुजफ्फरनगर को अपने आगोश में ले चुकी थी मगर राजधानी लखनऊ में बैठे आला अधिकारियों को कोई फर्क तक नहीं पड़ा। लखनऊ में फोन की घंटियां बजने लगी और जवाब मिला कि ”जो हो रहा है होने दो”। 

आजतक न्यूज़ चैनल  ने तो बाकयदा अपने स्टिंग ओपरेशन करके कई  पुलिस अधिकारियों  से ये उगलवा लिया था की इस दंगे में आजम खान की भूमिका अहम है. स्टिंग में कई पुलिसकर्मी इस बात को कहते सुने गये की आजम खान ने ही  गिरफ्तार युवको को रिहा करने के लिए बोला और सुरक्षा व्यवस्था में ढील भी उन्ही के इशारे पर छोड़ी गई.

कांग्रेसी नेता सैदुजुमा और बसपा नेता कादिर राना जैसे लोगो ने शान्ति स्थापित  करने के नाम पर सभा आयोजित की और उसमे भड़काऊ बाते  कहके माहोल को सियासी दंगे की आग में झोंक दिया. . बाद में  जिले भर में धारा १४४ भी लागू हो गई लेकिन इसके बावजूद इलाके में शान्ति कायम नही हो स्की और आखिक्रार इलाके में कर्फ्यू भी लगा दिया गया, विदेशो तक इस दंगे की तपिश जाने  के बाद आखिरकार अखिलेश सरकार की नींद टूटी और दंगो की जाँच के लिए विष्णु सहाय आयोग बना दिया गया. कई दिनों तक लगे कर्फ्यू और सम्पत्तियों को हुए नुकसान की बदोलत मुज़फ्फरनगर विकास के मामले में कई साल पीछे चला गया. ६० से ज्यादा मौते हुई, सैकड़ो लोग घायल हुए, हजारो परिवार बेघर होकर केम्पों में रहने को मजबूर हो गये.. अपनी गलती पर पर्दा डालने के लिए  सरकार ने मृतको के परिवार वालो को  १५ लाख रूपये और सरकारी नौकरी देने की बात तो कह दी लेकिन ना जाने कितने ऐसे परिवार है जिन्हें मुवावजा भी नसीब नही हों सका.


देश में अपनी धू धू हो जाने के बाद अखिलेश सरकार ने  चिढ में आकर सैकड़ो बेगुनाहों पर जिनमे संजीव बालियान, विक्रम सैनी जैसे बीजेपी नेता भी शामिल थे  पर झूठा मुकदमा करवा दिया  खैर बाद में सच्चाई सामने आई और वो लोग  निर्दोष साबित हुए. आजम खान जैसे नेता जिनको इस दंगे के गुनहगार के तौर पर देखा जाता है उनपर कोई कार्यवाई नही की गयी शायद उन्हें सत्ता में रहने का लाभ मिल गया हो ।

जिस मुज़फ्फरनगर को हिन्दू मुस्लिम  के प्यार की वजह से मोहब्बत  नगर नाम दिया गया  था उसी मुज़फ्फ़रनगर में अब लोग एक दुसरे को नफरत की निगाह से देख रहे थे, सेना के साथ देश की कई सामजिक संस्थाए सोहार्द स्थापितं करने के लिए सडको पर उतरी जिससे धीरे धीरे करके  माहौल तो ठंडा हो गया लेकिन घटना को सालो बीत जाने के बाद भी  उस दंगे के घाव आज भी लोगो के दिलो में ताजा है. जो बात पहले थी अब शायद वो बात कभी आ भी नही पाएगी,ऐसा होना लाजमी भी है क्योकि दंगे के वक्त जिसने आपको चोट पहुँचाने की कोशिश की हो उसे अपने दिल में जगह देने के बारे में सोचने भर मे भी कितना अजीब सा लगता है ना, खैर समय साल दर साल आगे बढ़ रहा  है हम तो उम्मीद करेंगे की दोनों धर्मो के लोग फिर से एक जुट हो जाए और मिलजुलकर  देश की तरक्की में अपना योगदान दे