मुस्लिम महिलाओं के लिए मोदी सरकार का ऐतिहासिक फैसला

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https://youtu.be/o_onsdN_4KI

तीन तलाक से मिलेगा तलाक?

मुस्लिम महिलाओं के अच्छे दिन!

मोदी सरकार का ऐतिहासिक फैसला

मोदी सरकार के इस फैसले के लिए मुस्लिम महिलाएं उनको हमेशा करेंगी याद.

फिल्म निकाह याद होगी आपको?? और इस फिल्म का वो सीन भी जिसमें सलमा आघा को उनके शौहर दीपक पराशर तीन बार तलाक तलाक तलाक बोलते हैं.. हर व्यक्ति के ज़हन में आज भी ताज़ा होगा, कहने को काल्पनिक कहानी है पर आज भी दर्शकों को झकझोर कर रख देती है. जरा सोचकर देखिये कि कैसे यही तीन शब्द मुस्लिम महिलाओं की ज़िन्दगी को एक पल में तहस नहस करके रख देते हैं.

तलाक.. तलाक… तलाक… और अगले ही पल सब कुछ ख़त्म.. दो लोगों के बीच का प्यार.. विश्वास.. सम्मान.. सारे कसमें-वादे.. सारे नाते.


कितना अजीब है ना कि एक तरफ तो लड़कियां अन्तरिक्ष तक अपनी मौजूदगी दर्ज करा चुकी हैं.. और दूसरी तरफ धर्म के नाम पर ये रीतियाँ या यूँ कहें कुरीतियाँ हर पल उनके आत्मसम्मान को चोट देती रहती हैं.. हर पल उन्हें यह महसूस कराती हैं कि उनके धर्म में शब्दों के अस्तित्व के मायने भी उनके अस्तित्व से ज्यादा हैं.

क्यूंकि ये शब्द उनकी मर्ज़ी के नहीं.. उनपर जबरन थोपे गए फैसले के होते  हैं..

देखिये फिल्म सौदागर का यह दृश्य


कितनी अजीब बात है ना कि एक ही देश में रहने वाली कुछ औरतों को देवी का दर्जा मिला हुआ है और कुछ को इंसान होने का हक भी नहीं..

भारत में तीन तलाक के मुद्दे पर हमेशा विवाद और बहस बनी रही है.. जिसे हमारा देश और इसका संविधान हमेशा अनैतिक और असंवेधानिक मानता रहा है.. इसी मुद्दे पर मोदी सरकार ने 2017 में एक बिल बनाया जिसको नाम दिया गया ‘ The Muslim Women Bill, 2017 जिसका उद्देश्य था मुस्लिम औरतों के हक और मुस्लिम परिवारों की शादियों का संरक्षड़.. जिस पर आर्टिकल 44 यानि यूनिफार्म सिविल कोड जिसमें देश के सभी नागरिकों के लिए सामान अधिकार और क़ानून हैं फिर चाहे वो किसी भी जाति या धर्म से हो.. इसी को ध्यान में रखते हुए 22 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया और तीन तलाक को असंवेधानिक यानि गैर कानूनी करार दे दिया गया. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से जहां मुस्लिम महिलाएं बहुत खुश और संतुष्ट दिखाई दी.. वहीँ कुछ धार्मिक संगठन इसके खिलाफ थे.. और उन्होंने दिल्ली उच्च न्यायालय में तीन तलाक अध्यादेश को चुनौती देने वाली याचिका दायर कर दी.. जिसे 28 सितम्बर 2017 को उच्च न्यायालय में फिर से खारिज कर दिया गया. इतना ही नहीं इस अध्यादेश के मुताबिक़ तीन बार तलाक बोलकर पत्नी को तलाक देने पर तीन साल की जेल या जुर्माने कि सजा मिलेगी। 

तीन तलाक के ऊपर बनाये गए इस बिल को 27 दिसम्बर 2018 में जबरदस्त सपोर्ट के साथ लोक सभा में पास कर दिया गया है..  हालाँकि बिल पास होना इतना आसान नहीं था.. क्यूंकि मुस्लिम समुदाय में तीन तलाक को लेकर अपनी अलग दलीलें थी..

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि तीन तलाक मुस्लिम समाज की अहम प्रथा है.. लेकिन ये नियम आया कहाँ से.. क्यूंकि ना तो कुरान में इसके बारे में कुछ लिखा है और ना ही पैगम्बर मोहम्मद ने कभी भी इसका जिक्र किया..

हालाँकि कुरान में एक बार तलाक बोलने से तलाक होने का जिक्र है लेकिन इससे पहले पति पत्नी में सुलह कराने के भी कई उपाय बताये गये हैं..

 कुरान में सुरेह निसा-35 में कहा गया है कि;

अगर तुम्हें शौहर बीवी में फूट पड़ जाने का अंदेशा हो तो एक हकम (जज) मर्द के लोगों में से और एक औरत के लोगों में से मुक़र्रर कर दो, अगर शौहर बीवी दोनों सुलह चाहेंगे तो अल्लाह उनके बीच सुलह करा देगा, बेशक अल्लाह सब कुछ जानने वाला और सब की खबर रखने वाला है।

लेकिन इसके बाद भी अगर शौहर और बीवी दोनों अलग होना चाहते हैं तो शौहर बीवी के खास दिनों के आने का इंतज़ार करेगा। ख़ास दिनों के गुज़र जाने के बाद जब बीवी पाक़ हो जाए तो बिना हमबिस्तर हुए कम से कम दो जुम्मेदार लोगों को गवाह बना कर उनके सामने बीवी को एक तलाक़ दे, यानी शौहर हर बीवी से सिर्फ इतना कहे कि “मैं तुम्हे तलाक़ देता हूं”। तलाक़ देने के तीन महीने बाद तक बीवी ससुराल में रह सकती है। उसे कोई नहीं निकाल सकता है।

तो यह है तलाक़ को लेकर वो बातें जो हमने मुस्लिम धर्म के इतिहास में देखी लेकिन इसमें पति और पत्नी दोनों कि रजामंदी और उनको साथ रहने के वाजिब मौके दिए जाना भी शामिल है.फिर यह प्रथा जिसने सिर्फ शौहर को तीन बार तलाक़ तलाक़ तलाक़ कहकर अलग होने का हक दे दिया और बीवी को ताउम्र गुलामी… आई कहाँ से?? जाहिर है कोई औरतों का दुश्मन ही होगा.. जिसने तीन तलाक, हलाला और खतना जैसी प्रथा लाकर उनके अधिकारों को अपने पैरों तलों रौंद दिया..

और धिक्कार उस समाज पर भी जिसने इन प्रथाओ को धार्मिकता का हवाला दे अपनाकर इस सृष्टि का सृजन करने वाली औरत पर ही अत्याचार करने शुरू कर दिए और फिर कहा दिया कि हमारे देश के संविधान में सबको अपने अपने धर्म और उसके बनाये गए नियम और कानून का पालन करने का हक है.

लेकिन यही संविधान आपको सबके लिए समान अधिकार की बात भी तो कहता है.. फिर आप क्यूँ नहीं मानते ? सरकार से अपने हक लेना तो चाहते हैं पर अपने ही समाज की औरतों को उनका हक देना नहीं चाहते?  यदि आपके देश की सरकार आप ही के बनाये उन नियमों को बदलकर आप ही के विकास के लिए उन्हें हटाना चाहती है तो आप क्यूँ अपनी उसी रूढ़िवादी सोच और दकियानूसी नियमों में फसे रहना चाहते हैं जिनका आधार अन्याय और परिणाम सिर्फ और सिर्फ बर्बादी है.