जंगल काट कर बने फिल्म सिटी से दिक्कत नहीं लेकिन मेट्रो डिपो से हो रहा पर्यारण का नुक्सान

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अमिताभ बच्चन के घर के बाहर लोगों की भीड़ लगी है. उनके हाथों में कुछ तख्तियां है. यूँ तो हमेशा अमिताभ के घर के बाहर उनके चाहने वालों की भीड़ लगी रहती है लेकिन ये भीड़ उनके खिलाफ प्रदर्शन करने वालों की है. इस विरोध का कारण है कि अमिताभ बच्चन ने मुंबई मेट्रो की तारीफ़ की और उसके पक्ष में कुछ कहा.

अमिताभ बच्चन ने ट्वीट किया, “मेरे एक मित्र को आपात डॉक्टरी मदद की आवश्यकता थी, उसने अपनी कार के बजाए मेट्रो से जाने का फैसला किया. वह बहुत प्रभावित होकर लौटा. उसने कहा कि यह बहुत तेज और सुविधानजनक है. प्रदूषण के लिए समाधान ये है कि और पेड़ लगाएं. मैंने अपने बगीचे में पेड़ लगाए थे. क्या आपने लगाए?”

क्या है पूरा मामला

इसी ट्वीट के कारण अमिताभ का विरोध हो रहा है. इस ट्वीट से वो लोग भड़क गए जिन्हें लग रहा है कि मेट्रो के निर्माण से पर्यावरण का नुकसान हो रहा है. सोशल मीडिया पर भी मुंबई मेट्रो और आरे फ़ॉरेस्ट खूब ट्रेंड कर रहे हैं. अब आप सोचेंगे कि इस ट्वीट में ऐसा क्या है तो आप हम आपको पूरा माजरा बताते हैं.

माजरा ये कि मुंबई मेट्रो का काम चल रहा है. गोरेगांव में मेट्रो कार डिपो बनाना है और उसके लिए जगह चुनी गई आरे कॉलोनी का इलाका. यहाँ करीब 25 हेक्टेयर जमीन पर मेट्रो डिपो बनाना है और इसके लिए करीब 2700 पेड़ों को काटना पड़ेगा. मेट्रो कारपोरेशन और सरकार ने कहा है कि जितने भी पेड़ काटे जायेंगे उससे तीन गुना पेड़ सरकार लगाएगी लेकिन विरोध करने वालों को तीन गुना पेड़ नहीं चाहिए बल्कि वही 2700 पेड़ चाहिए.

विरोध करने वालों का कहना है कि मेट्रो कार शेड लोकेशन को आरे के जंगल इलाके से बदल कर कंजुरमार्ग ले जाया जाए, इससे पेड़ नहीं काटने पड़ेंगे. जबकि मेट्रो कारपोरेशन का कहना है कि प्रोजेक्ट से जुड़ा पर्यावरण आंकलन बहुत पहले किया गया था. अगर मेट्रो डिपो को आरे के जंगल एरिया से कहीं और ले जाया गया तो यह सफल नहीं हो पाएगा.

क्यों है आरे कॉलोनी फ़ॉरेस्ट

आरे कॉलोनी मुंबई का एकमात्र ग्रीन जोन है. साल 1949 में आरे मिल्क कॉलोनी 12 गाँवों को मिला कर बनाया गया था. यहाँ करीब 250 रजिस्टर्ड पशुपालकों के पास 16000 गाय और भैंसे है, जिनसे प्रतिदिन एक लाख लीटर दूध का उत्पादन होता है. 16 वर्गकिलोमीटर में फैले इस क्षेत्र में 32 बड़े बड़े चारागाह हैं, जंगल, गार्डन, नर्सरी और मिल्क प्लांट भी है. ये पूरी मुंबई का सबसे हरियाली वाला क्षेत्र है. इसे अगर मुंबई शहर का फेफड़ा कहें तो गलत नहीं होगा. पेड़ काटने से नुक्सान होते हैं ये सही है लेकिन जब जरूरी हो जाए तो काटना ही पड़ता है. नुक्सान तब है जब आप पेड़ काट कर दुबारा पेड़ न लागायें. लेकिन मेट्रो कारपोरेशन कह रही है कि वो जितने पेड़ काटेगी उससे तीन गुना पेड़ लगाएगी.

दो हिस्सों में बंट गया बॉलीवुड

इस पुरे मसले पर बॉलीवुड भी दो हिस्सों में बंट गया है. एक तरफ अमिताभ बच्चन और अक्षय कुमार जैसे सेलेब्रिटीज हैं जिनका ये मानना है कि मेट्रो के आने से प्रदुषण में कमी आएगी और सड़कों से ट्रैफिक घटेगा. ये उस तर्क से सहमत हैं कि 2700 पेड़ों के बदले में कारपोरेशन तीन गुना पेड़ लगाने का वादा कर रही है. जबकि दूसरी तरफ दिया मिर्ज़ा, मनोज वाजपेयी और स्वरा भास्कर जैसे स्टार हैं जिनका कहना है कि पेड़ नहीं काटे जाने चाहिए.

ये सही है कि पेड़ नहीं काटे जाने चाहिए. इससे पर्यावरण को नुक्सान होता है. हमें नए पेड़ लगाने चाहिए .लेकिन दुनिया में ऐसा कौन सा विकास का काम है जो बिना पेड़ काटे हुआ है या हो सकता है? अमिताभ बच्चन के घर के बाहर जो लोग जिस बैनर, पोस्टर और तख्ती को लहराते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं, उसके लिए भी किसी ने किसी हिस्से में कोई पेड़ कटा होगा.

फिल्म सिटी का निर्माण आरे ग्रीन जोन में ही हुआ है

आज यहाँ मेट्रो शेड के निर्माण के लिए खिलाफ फ़िल्मी सितारे चीत्कार कर रहे हैं. लेकिन 1977 में फिल्म सिटी बनाने के लिए 490 एकड़ जमीन को आरे ग्रीन जोन से काट कर अलग किया गया था. फिल्म सिटी के निर्माण में कितने पेड़ काटे गए इसकी कोई गिनती ही नहीं है और आज भी काटे जा रहे हैं.
ये फिल्म स्टार जिस फिल्म सिटी में काम करके करोड़ों कमा रहे हैं और बड़ी बड़ी गाड़ियों में घूम रहे हैं वो फिल्म सिटी आरे के जंगलों को काट कर ही बनाया गया है. पेड़ नहीं काटने वाले विवाद में कवी कुमार विश्वास भी कूद पड़ें और उन्होंने विकास के नाम पर पेड़ काटने का विरोध किया. सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि मेट्रो डिपो के निर्माण के विरोध में ट्वीट करने से पहले कुमार विश्वास उसी फिल्म सिटी में कपिल शर्मा के शो की शूटिंग कर के आये थे. जिसे बनाने के लिए 1977 से अब तक कई पेड़ काटे गए.

आरे कॉलोनी के जिस रॉयल पाम के आलिशान इमारतों में बैठ कर ये फ़िल्मी सितारे पर्यावरण पर ट्वीट कर रहे हैं वो रॉयल पाम भी इन्ही आरे जंगलों को काट कर बनाया गया है. लेकिन पर्यावरण का नुक्सान मेट्रो शेड के निर्माण से हो रहा है.

धुआं छोडती चमचमाती मर्सिडीज में बैठ मुंबई लोकल की भीड़ में दबते और लटकते लोगों को पर्यावरण का ज्ञान देना बहुत आसान है. सारे पर्यावरण की चिंता इन फ़िल्मी सितारों को ही होती है. इनकी मर्सिडीज और ऑडी ऑक्सिजन छोडती है, मिडिल क्लास की मेट्रो पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाती है. इन सितारों के आलिशान फ्लैट्स आसमान से टपके हैं और मिडिल क्लास की मेट्रो के लिए पेड़ काटे जा रहे हैं.

पर्यावरण प्रेमी फ़िल्मी सितारों को हीरानंदानी और रॉयल पाम के उन आलिशान फ्लैट्स को त्याग देना चाहिए जिसने हज़ारों पेड़ों की जान ली. उन्हें उस फिल्म सिटी का बहिष्कार करना चाहिए जिसने लाखों पेड़ों का बलिदान लिया. लेकिन वो ऐसा नहीं करेंगे क्योंकि इनके लिए पेड़ काट कर उनकी फिल्म सिटी और आलीशान फ्लैट्स बनाना तो जायज है लेकिन मुंबई के आम लोगों की सहूलियत के लिए बस कुछ हेक्टेयर जमीन पर मेट्रो कार शेड के लिए 2700 पेड़ काटना बहुत गलत है. वो भी तब जब सरकार कह रही है कि वो तीन गुना पेड़ लगाएगी उस इलाके में.