आम आदमी पार्टी : सिर्फ सात सालों में सफलता की बुलंदियों से असफलता के गर्त का सफ़र

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एक पार्टी जिसने सात साल पहले 2012 में देश की राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान से नयी राजनीति का ख्वाब दिखाया, भ्रष्टाचार मुक्त राजनीति की उम्मीद जगाई, कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार को उखाड़ फेंका . उस पार्टी ने मात्र 7 सालों में ही सफलता की बुलंदियों से असफलता के गर्त तक का सफ़र पूरा किया . वो पार्टी है आम आदमी पार्टी

मोदी की लहर में आम आदमी पार्टी खाली हाथ रही. राज्य की सभी 7 लोकसभा सीटों पर न सिर्फ पार्टी को हार का सामना करना पड़ा बल्कि तीसरे नंबर पर पहुँच गई. उस राज्य में जहाँ पार्टी अस्तित्व में आई वहीँ इसका अस्तित्व ख़त्म होता नज़र आया. दिल्ली में लोकसभा चुनाव में मात्र 18.01 प्रतिशत वोट हासिल हुई AAP को. सात में से तीन सीटों पर तो पार्टी की जमानत जब्त हो गई. जिस कांग्रेस का अस्तित्व दिल्ली में ख़त्म हो चूका था उस पार्टी ने 22.5 प्रतिशत वोट के साथ दूसरा स्थान हासिल किया. हालाँकि सीटें तो कांग्रेस को भी एक भी नहीं मिली लेकिन उसने अपना वोट प्रतिशत बढ़ा लिया जिसका सीधा मतलब ये है कि उसका जो वोट बैंक उससे नाराज हो कर आम आदमी पार्टी के पास गया था वो वापस कांग्रेस के पास लौट रहा है.

2012 में पार्टी की स्थापना के एक साल बाद ही पार्टी को 2013 में विधानसभा चुनाव का सामना करना पड़ा था. 2013 के विधानसभा चुनावों में 29.5 प्रतिशत वोट हासिल किये जो साल भर पहले बनी पार्टी के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी. 2015 के विधानसभा चुनावों में पार्टी का वोट शेयर 54 प्रतिशत तक पहुँच गया. पार्टी ने विधानसभा में 70 में से 67 सीटें हासिल की. इस जीत के बाद अरविन्द केजरीवाल भारतीय राजनीति के वो हीरो बन गए जिससे लोगों को बहुत उम्मीदें थी . लेकिन अरविन्द केजरीवाल और उनकी पार्टी को अचानक मिली सफलता उनसे संभाली नहीं गई. जिन सिद्धांतों के दम पर वो सफलता के शिखर पर पहुंचे थे, उस सिद्धांतों की उन्होंने तिलांजलि दे दी. उनके पास मौके थे. वो चाहते तो दिल्ली में उसी तरह काम कर सकते थे जिस तरह ओडिशा में नवीन पटनायक काम कर रहे हैं पिछले 25 सालों से, लेकिन अरविन्द केजरीवाल की महत्वकांक्षाएं उनके अस्तित्व से भी बड़ी थी. उन्हें लगने लगा कि वो उस शख्स को चुनौती दे देंगे जिसने 13 साल तक एक राज्य की सत्ता संभाली हो और जिसने 30 सालों बाद देश को पूर्ण बहुमत की सरकार दी हो. अपनी महत्वकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अरविन्द ने गलतियाँ करनी शुरू कर दी.

ये बात सच थी कि पार्टी को सफलता अरविन्द के चेहरे पर मिली थी लेकिन किसी भी पार्टी की सफलता में एक टीम और कार्यकर्ताओं का योगदान होता है. अरविन्द पार्टी पर खुद का एकाधिकार चाहते थे. अरविन्द चाहते थे कि पार्टी में वही हो जो वो चाहते हैं. जिसने भी आवाज उठानी शुरू की उसे पार्टी से बहार का रास्ता दिखा दिया गया. पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से रहे योगेन्द्र यादव, कुमार विश्वास जैसे कई लोग दरकिनार कर दिए गए. जिन लोगों को भ्रष्ट बता कर और जिन लोगों पर आरोप लगाकर केजरीवाल सियासत के शिखर तक पहुंचे उन्ही भ्रष्ट लोगों के साथ मंच साझा करने लगे. चुनाव के वक़्त नेताओं पर बेबुनियाद आरोप लगाना और कोर्ट में माफ़ी मांग लेने की रणनीति ने उनकी छवि को नुक्सान पहुँचाया . बात बात पर वो पीएम नरेंद्र मोदी से टकराते रहे और उनपर यहाँ तक आरोप लगा दिया कि पीएम उनकी हत्या करना चाहते हैं. उनकी हरकतों ने उन्हें एक गैरजिम्मेदार नेता की छवि पुख्ता कर दी जो सिर्फ आरोपों की राजनीति करना जानता है.

2017 में दिल्ली में हुए निकाय चुनाव में उनकी पार्टी को जबरदस्त झटका लगा .उस चुनाव के बाद से केजरीवाल और आम आदमी पार्टी का बुरा दौड़ शुरू हुआ. लोकसभा चुनाव तक आते आते केजरीवाल उसी शीला दीक्षित और उसी कांग्रेस के साथ गठबंधन के लिए भीख मांगने लगे जिनके खिलाफ आरोपों की फ़ाइल लहरा कर केजरीवाल सत्ता में आये थे. केजरीवाल दिल्ली में गंभीरता से सरकार चलाने के बजाये उन नेताओं की जमात में शामिल हो गए जिनका एकमात्र लक्ष्य मोदी को सत्ता से बाहर करना था. केजरीवाल वक़्त का लिखा नहीं पढ़ पाए .. जनता ने उन्हें दिल्ली के लिए चुना था लेकिन वो दिल्ली की बजाये हर जगह नज़रें दौडाने लगे .

लोकसभा चुनाव में राज्य की 70 विधानसभा सीटों में से 65 पर भाजपा ने बढ़त बनाई और पांच पर कांग्रेस आगे रही .आम आदमी पार्टी के किसी भी उम्मीदवार को किसी भी विधानसभा सीट पर सबसे अधिक वोट नहीं मिले . अल्पसंख्यक वोट भी आम आदमी पार्टी से छिटक कर पूरी तरह से कांग्रेस को चले गए. मुख्यमंत्री केजरीवाल के विधानसभा क्षेत्र नयी दिल्ली में पार्टी उम्मीदवार बृजेश गोयल को सिर्फ 14, 740 वोट ही मिल पाया. मात्र 7 सालों में आम आदमी पार्टी सफलता की बुलंदियों से असफलता के गर्त में आ गिरी. 6 महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं. अगर केजरीवाल नहीं संभले तो उनकी पार्टी का अस्तित्व ख़त्म हो जाएगा और इसके एकलौते जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ वही होंगे.