मनोहर पर्रिकर एक सत्यनिष्ठ, मिलनसार और उत्कृष्ट नेता अब नहीं रहे

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गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर का 63 साल की उम्र में 17 मार्च रविवार को निधन हो गया. पर्रिकर लंबे वक्त से बीमार चल रहे थे. वह काफी समय से पैनक्रियाटिक कैंसर से जूझ रहे थे. राष्‍ट्रपति कोविंद ने ट्वीट कर उनके निधन की जानकारी दी. पर्रिकर के निधन पर शोक व्यक्त करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया कि रक्षा मंत्री के तौर पर पर्रिकर ने जो फैसले लिए उनके लिए देश हमेशा उनका आभारी रहेगा.

चार बार गोवा के मुख्यमंत्री के रूप में और भारत के रक्षा मंत्री के रूप में पर्रीकर जी के योगदान को हमेशा याद किया जायेगा. वे सादगी से जीने वाले एक सच्चे देश भक्त थे. सार्वजनिक जीवन में रह के एक सादगी भरा जीवन कैसे जिया जाता है ये पर्रीकर जी ने सभी को दिखाया है.

उनकी जीवन शैली और हर गोवा वासी कि उन तक पहुँच के कारण पर्रीकर को गोवा के “आम आदमी का मुख्यमंत्री” के तौर पर जाना जाता रहा.

कई बार आम जनता हैरान हो जाती थी जब वे पर्रीकर को टिकेट के लिए लाइन में खड़ा देखती थी, उन्हें स्कूटर चलाता देखती थी या फिर प्लेन में उन्हें इकॉनमी क्लास में सफ़र करता देखती थी. ये जान कर आपको वाकई आश्चर्य होगा की उनकी सादगी कि वजह से उन्हें कई बार पांच सितारा होटल में घुसने से दरबान ने रोक दिया था. ये वाकई आश्चर्य कि बात है क्योंकि मुख्यमंत्री VIP होते हैं जो हाई सिक्यूरिटी, तमाम सुविधाएँ और कड़े प्रोटोकॉल से घिरे रहते हैं.

पर्रिकर का जन्म मापुसा गोवा में हुआ था और उनकी पढ़ाई मराठी में हुई थी. उन्होंने IIT बॉम्बे से मेटलर्जिकल इंजीनियरिंग 1978 में की थी. इसी दौरान देश में इमरजेंसी लगायी गयी थी और पर्रीकर इसी के खिलाफ अंडरग्राउंड होकर काम कर रहे थे. पर्रिकर अपने हॉस्टल में लगातार चार साल तक मेस कोर्डिनेटर निर्विरोध चुने गए. उस समय किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक हॉस्टल का मेस कोर्डिनेटर आगे चल कर राज्य का मुख्यमंत्री और देश का रक्षा मंत्री बन जायेगा.

मेस कोर्डिनेटर एक कठिन काम था. यहाँ पर कम बजट में हॉस्टल के कई काम करने पड़ते थे. जैसे कि हाइजीन पर ध्यान देना, हॉस्टल में रह रहे साथियों से जुड़े काम करना और मेस वर्कर्स को मोटीवेट करना. एक बार जब मेस वर्कर्स हड़ताल पर चले गए थे तो पर्रिकर ने हॉस्टल के साथियों को किचन का काम करने के लिए मनाया था.

पर्रिकर को गर्व था कि वे एक आरएसएस सदस्य हैं जिससे उन्हें अनुशासन और देशभक्ति सिख ने को मिली. इसके साथ-साथ पर्रीकर ने कभी अपनी विचारधारा को अपने संबंधों के आड़े नहीं आने दिया. उनके राजनीतिक विरोधियों के साथ भी अच्छे सम्बन्ध थे.

हालांकि पर्रिकर 1990 कि शुरुआत से ही चुने हुए प्रतिनिधि थे लेकिन उसके बाद भी वे अपने परिवार के एक छोटे से मैन्युफैक्चरिंग बिज़नस में सहायता करते थे. लेकिन जब उनकी पत्नी मेधा का निधन सन 2000 में हुआ, तो इससे पैदा हुए खालीपन को दूर करने के लिए पर्रिकर पूरी तरह से सार्वजनिक जीवन में आ कर पब्लिक सर्विस में जुट गए.

1991 से 2011 तक बीजेपी का वोट शेयर 0.4% से 35% करने में मनोहर पर्रिकर का बहुत बड़ा योगदान रहा. उनके करीबी दोस्त और साथ काम करने वाले उन्हें उनके busy schedule और कड़ी मेहनत के लिए
याद करते हैं. उनके अनुसार पर्रिकर एक दिन में 16 घंटे तक काम किया करते थे. मंत्री होने के बाद भी उन्हें लिखने के साथ पढ़ने का बहुत शौक था.

बुद्धिजीवी होने के साथ-साथ उनकी राजनीतिक सूझबूझ भी कमाल की थी. मुश्किल परिस्थितियों को कैसे जनता के फायदे के इस्तेमाल करना है उन्हें बखूबी आता था. एक बार कि बात है जब वे गोवा के वित्त मंत्री थे तो उन्होंने एविएशन फ्यूल पर एक्साइज ड्यूटी को काफी घाटा दिया था. इस कदम से गोवा के फाइनेंस को नुकसान हो सकता था. लेकिन फ्यूल के सस्ते होने से तमाम एयर लाइन्स ने गोवा एअरपोर्ट से रेफुएलिंग कराना और बढ़ा दिया. इसका फायदा ये हुआ कि राज्य सरकार कि कमाई एविएशन फ्यूल से पहले के मुकाबले तीन गुना और बढ़ गयी.

पर्रिकर का रिश्ता गोवा राज्य से बहुत गहरा था. उन्होंने अपनी ज़िन्दगी गोवा के विकास के लिए झोंक दी. education, environment or infrastructure के क्षेत्र में उन्होंने बहुत योगदान दिया.

इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का आयोजन गोवा में कराने में भी उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी. इसी फेस्टिवल के दौरान ये भी सामने आया कि कैसे वे खुद वेन्यू के बाहर सारे इंतज़ाम का जायजा ले रहे थे. इसी साल पूरे देश ने ये भी देखा कि कैसे वे बीमारी कि हालत में नाक में नली होने के बावजूद भी गोवा में तमाम प्रोजेक्ट्स का निरीक्षण कर रहे थे और गोवा विधान सभा के सत्र में भी मौजूद थे. उनके इस जोश को पूरे देश ने सलाम किया था.

वहीं रक्षा मंत्री के रूप में भी उनका योगदान हमेशा याद किया जायेगा. उन्होंने रक्षा मंत्री रहते हुए भारत में डिफेन्स डील्स में भ्रष्टाचार बिलकुल ख़त्म कर दिया था, वायु सेना का ख्याल रखते हुए उन्होंने फ्रांस के साथ राफेल डील जल्द से जल्द फाइनल करने में भी अहम भूमिका निभाई थी, भारत में डिफेन्स मैन्युफैक्चरिंग को लेकर उन्होंने strategic partnership model को भी स्वीकृति दी थी. इस मॉडल के अंदर भारत में डिफेन्स मॉडर्नाइजेशन का लक्ष्य रखा गया जिससे भविष्य में भारत को डिफेन्स सिस्टम्स के लिए विदेशों पर निर्भर ना रहना पड़े.

इसके साथ पर्रिकर ने रूस के साथ S-400 मिसाइल डिफेन्स सिस्टम कि डील भी फाइनल की थी. इस मिसाइल सिस्टम के बाद पाकिस्तान की नुक्लियर हथियार कि धमकी भी बेअसर हो जाएगी क्योंकि भारत कि सीमा के 400 किलोमीटर दूर ही ये सिस्टम मिसाइल को intercept करके नष्ट कर सकता है और साथ ही इस सिस्टम कि वजह से भविष्य में भारत को शोर्ट रेंज मिसाइल्स के ऊपर खर्च भी काफी कम करना पड़ेगा. इससे भारत का करीब पचास हजार करोड़ रुपए भी बचेगा.

आखिर में पर्रिकर अपने मिलनसार व्यक्तित्व और पब्लिक सर्विस के लिए याद किए जायेंगे. वे एक ऐसे टेक्नोक्रैट, राजनेता और कुशल एडमिनिस्ट्रेटर थे जिनकी सत्यनिष्ठा और सादगी इस राजनीतिक ऊहापोह में भी कभी नहीं डिगी.