लोगों को खूब पसंद आ रही कंगना की फिल्म ‘मणिकर्णिका’

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इस फ़िल्म के बारे में कुछ भी लिखने से पहले ये क्लियर कर दूं कि इसे देखने से पहले ये श्योर कर लेना कि आपने कोई बेहतरीन वॉर फ़िल्म या तो देखी नहीं है या अब आपको याद नहीं है या आप तुलनाएं करने से बचते हैं। कहानी शुरू होती है शिकार करती एक लड़की से, जो ज़बरदस्त तीरंदाज है, दयालु है क्योंकि वो शेर को मारती नहीं बस बेहोश करती है, जांबाज़ है, खूबसूरत है, तलवारबाज़ है, पेशवा (बिठूर के – सुरेश ओबेरॉय) की लाडली है।

यही मणिकर्णिका है। पूरी फ़िल्म इस एक करैक्टर के चारज़ू घूमी है। शुरुआत में ही दीक्षित जी (कुलभूषण खरबंदा) को पसंद आने पर वो झांसी के नरेश गंगाधर राव की रानी बनी, लक्ष्मी बाई बनी फिर कैसे वो आम लोगों से जुड़ी, झांसी के लिए लड़ीं, फिर अंत तक लड़ीं और वीरांगना कहलाईं। कहानी नो डाउट अच्छी है, प्रॉमिसिंग है पर स्क्रिप्ट कई जगह लचकती है। इंटरवल से पहले कई बार लगता है कि ‘ये क्यों हो क्यों रहा है आख़िर’, ख़ैर…
डायरेक्शन में कंगना पहली बार कूदी हैं, फिर खुद को लेकर आने की वजह से उनके और क्रिश जगरलामुड़ी के डायरेक्शन में विरोधाभास दिखता है।कुछ सीन बहुत अच्छे बन पड़े हैं तो कुछ वाकई अझेल। कंगना तकरीबन हर सीन में हैं, आख़िर टाइटल ही उनका है। एक समय ऐसा अहसास होता है मानों हम सीरियल देख रहे हैं।

क्रिश इससे पहले तेलगु फ़िल्में ही डायरेक्ट करते थे, कंगना इससे पहले सिर्फ़ एक्टिंग करती थीं, दोनों ने स्ट्रगल किया है और दोनों ने एडजस्ट किया है।लेकिन क्लाइमेक्स बहुत बढ़िया बन पड़ा है। अंत सेटिस्फाई करता है।एक्टिंग तो कंगना अच्छी करती ही हैं, नशेबाज़ी की एक्टिंग उनकी पेटेंट बनती जा रही थी लेकिन इस बार कंगना ने बहुत मेहनत की है। उनकी तलवारबाज़ी हो या चाल ढाल, सबपर मेहनत साफ़ झलकती है पर डायलॉग डिलीवरी वही ढाक के तीन पात हैं।
उनकी टोन, उनका लहजा देसी नहीं बन पाता। बाकी सब बढ़िया है। वो दिल से और ज़ोर से चिल्लाई हैं।

कुलभूषण खरबंदा से ज़बरन ये फ़िल्म करवाई है। यही हाल अतुल कुलकर्णी का भी है, वो तात्या टोपे बने हैं पर नाम को। जिशु सेनगुप्ता भी ढीले-ढाले ही हैं लेकिन रोल के हिसाब से ठीक हैं।
अंकिता लोखंडे टीवी से बाहर नहीं आ पाई हैं। बहुत ओवरएक्टिंग करती हैं। काशीबाई बनी मिष्टी की एक्टिंग अच्छी है। इन सबसे हटकर, बेहतरीन एक्टिंग है डैनी की (ग़ुलाम गौस खां)। बाकी ज़ीशान आयूब ने भी निराश ही किया। जनरल ह्यू रोज़ के रोल में रिचर्ड कीप की एक्टिंग भी अच्छी थी।

म्यूजिक अच्छा है। बैकग्राउंड स्कोर (अंकित/संचित) भी अच्छा है। सारे गाने अच्छे हैं पर एक गाना डंकिला समझ से परे हैं। यकीन नहीं होता कि ये गाना भी प्रसून जोशी से ही लिखवाया है। बाकी शंकर की आवाज़ में विजयी भवः बहुत अच्छा है। कास्टिंग करने में बहुत भारी चूक हुई है। ये फ़िल्म कंगना के लिए थी ही नहीं। ये तब्बू के लिए थी। पर तब्बू की अब उम्र हो चुकी है शायद ये सोचकर उन्हें निगलेक्ट किया गया होगा और तब्बू जैसी दूसरी कोई बलशाली हीरोइन अभी आई ही नहीं है।कुलभूषण और ज़ीशान आयूब भी मिसकास्ट थे।

सिनेमेटोग्राफी सेकंड हॉफ में बेहतर है। हालांकि कॉस्ट्यूम तो ठीक पर मेकअप से इसे पीरियड फ़िल्म मानने में थोड़ी मुश्किल होती है। कहीं हैवी फाउंडेशन है तो कहीं शैडी लैक्मे लिपस्टिक। क्लाइमेक्स फाइट सीन में sfx और vfx दोनों अच्छे हैं। बाकी फ़िल्म में sfx हल्का है। एडिटिंग के खाते में क़रीब पंद्रह मिनट और काटने चाहिए थे।कुलमिलाकर फ़िल्म एक बार देखी जा सकती है लेकिन बाहुबली जैसी वॉर फ़िल्म आने के बाद से आपकी उम्मीदें बहुत बढ़ गयी हैं तो टीवी पर देखी जा सकती है। फ़िल्म बुरी नहीं है, बहुत अच्छी भी नहीं है, ठीक है।

कुछ बातें इस फ़िल्म के वातावरण को हल्का करती हैं जैसे – कंगना का पापा कहना
गंगाधर राव की लाइब्रेरी में ली चाइल्ड की बुक (क्लासिक कवर में)
नाचते नाचते एक आंटी ने आंखें बड़ी करके देखीं
और बोल दिया ये प्रेग्नेंट है। तुरंत ही राजा भी आ गए।
घोड़ा डेढ़ सौ फीट से कूद गया और स्लो मोशन में दौड़ता हुआ रानी को बच्चे समेत ले गया।

कुछ अच्छी बातें भी हैं जैसे –
अंग्रेज़ो का खुद मानना कि आप जैसे विभीषण ना होते तो हम देश से बाहर होते।
अंत में स्लो मोशन तलवारबाज़ी
रानी का ग्वालियर में लोगों को जगाना
एक सीन में कई अंग्रेजों को तलवार से मारना
और बैकग्राउंड में अष्टभुज माता की मूर्ति।
लेडी वारियर्स तैयार करना। अद्भुत।
और भी बहुत कुछ है अच्छा-अच्छा बस नज़रिया अच्छा हो तो।
बहरहाल फ़िल्म देखने के बाद ये महसूस नहीं होगा कि पैसे ख़राब हुए।

फाइनल रेटिंग – 5 में से 3 स्टार
इसके इतर एक मन की बात। जब भी आज़ादी से पहले की कोई क्रांतिकारी फ़िल्म देखो तो यही एहसास होता है कि कितनी बुज़दिल कौम हैं हम। हम से मतलब हम सारे भारतीय।
किसी धर्म मे बटे हुए नहीं, बस देश में जुड़े हुए। हमारे सामने जो आया हमने घुटने टेक दिए और अपने घर की चाबी उसे दे दी। वो हमें एक बार झटके से ना मार दे इसलिए हमने रोज़ सिसक-सिसक के हलाल होना चुना। अंग्रेज़ी सेना में 60 प्रतिशत भारतीय सैनिक। जिन्हें क्रांतिकारी अगर मार दें तो वो हत्यारे कहलायें, न मारें तो वही भारतीय उन्हें मार दें। आज़ादी के इतने सालों बाद भी कुछ बदला या नही?? ये सवाल आज आपके लिए…