महाराष्ट्र और हरियाणा में क्या बन रहे हैं चुनावी समीकरण ?

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लोकसभा चुनाव के बाद देश एक बार फिर चुनावी मूड में आ गया है. महाराष्ट्र और हरियाणा में विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान हो गया. 21 अक्टूबर को वोट डाले जायेंगे और दिवाली से तीन दिन पहले यानी 24 अक्टूबर को पता चलेगा कि किसकी मनेगी दीवाली और किसका निकलेगा दिवाला.

यूँ तो हर चुनाव महत्वपूर्ण होते हैं लेकिन इस चुनाव का कुछ अलग ही महत्त्व है. दोनों ही राज्यों में भाजपा अपनी सत्ता बचाने को उतरेगी. महाराष्ट्र की बात करें तो पिछली बार भाजपा और शिवसेना अलग अलग मैदान में थी. भाजपा ने शिवसेना को झटका देते हुए राज्य में बड़े भाई का दर्जा हासिल कर लिया. लेकिन इस बार दोनों पार्टियाँ साथ है. हालाँकि अभी सीटों का ऐलान नहीं हुआ है लेकिन अंदरखाने से खबर है कि सब फिक्स हो चूका है बस ऐलान बाकी है. ऐसे में दोनों पार्टियों का पलड़ा भारी है क्योंकि मोदी मैजिक तो है ही सहारा देने के लिए.

हरियाणा की बात करें तो वहां भी भाजपा फायदे में दिख रही है. चौटाला परिवार में फूट पड़ चुकी है. हुडा परिवार के विद्रोह से कांग्रेस परेशान है. मायावती अकेले मैदान में उतरने का मन बना चुकी है. ऐसे में हरियाणा में भाजपा की डगर आसान लगती है.

मुद्दों की बात करें तो आर्टिकल 370, तीन तलाक जैसे मुद्दे चुनाव को प्रभावित करेंगे इसमें कोई शक नहीं.

आर्टिकल 370 : कश्मीर से आर्टिकल 370 हटने के बाद ये पहला चुनाव है. मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस और लेफ्ट पार्टियाँ भले ही इसकी आलोचना करें लेकिन देश भर में इस फैसले का स्वागत किया गया और इस कठिन फैसले ने पीएम मोदी की छवि कड़े फैसले लेने वाले नेता के रूप में और पुख्ता कर दी. इसका विरोध करके कांग्रेस ने खुद की छवि ऐसी बना ली कि वो जनभावना की अनदेखी करने वाली पार्टी है. हालाँकि विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं लेकिन 2014 के बाद ट्रेंड बदल गया. चुनाव कोई भी हो, मुद्दा पीएम मोदी ही बन जाते हैं. और फिर आर्टिकल 370 हटाना तो उनका मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है.

तीन तलाक क़ानून :तीन तलाक क़ानून के बाद ये पहला चुनाव है. हालाँकि इस बिल का भी विपक्ष ने और पुरुष मुस्लिम समाज ने विरोध किया था लेकिन मुस्लिम महिलाओं ने इसका दिल खोल कर स्वागत किया. जो ऐतिहासिक फैसला लेने से 1987 में राजीव गाँधी चूक गए थे उसे लेने की हिम्मत नरेंद्र मोदी ने दिखाई. भाजपा को भी उम्मीद है कि मुस्लिम महिलाओं के वोट उसे मिलेंगे.

सुस्त कांग्रेस : लोकसभा चुनाव बुरी तरह हारने के बाद कांग्रेस का खोया आत्मविश्वास अभी तक डगमगाया हुआ है. राहुल गाँधी पीछे हो गए हैं और पार्टी की कमान सोनिया गाँधी के हाथों में है लेकिन उससे भी पार्टी को कोई फायदा हुआ ऐसा नहीं लगता. चुनाव की हार के बाद पार्टी संभली भी नहीं थी कि एक के बाद एक तीन तलाक और आर्टिकल 370 ने पार्टी को ऐसे झटके दिए कि वो समझ ही नहीं पाई उसे इन मुद्दों पर रिएक्ट कैसे करना है. जब तक पार्टी को कुछ समझ आता सबकुछ उसके हाथ से निकल चुका था.

अर्थव्यवस्ता :अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर घिरी सरकार ने अर्थव्यवस्था को बूस्ट देने के लिए कई कदम उठाये हैं और उसका असर दिखना शुरू भी हुआ है. विपक्ष चुनाव में मंदी का मुद्दा उठाएगी और भाजपा को इससे निपटना पड़ेगा. देखना है कि इस मुद्दे का क्या असर पड़ता है चुनाव में.

रणनीतियों और मुद्दों के लिहाज से देखें तो भाजपा, कांग्रेस के मुकाबले कहीं आगे दिखती है इन चुनावों में. चुनाव संभावनाओं का खेल है और आखिरी बाजी किसके हाथ आये कुछ कहा नहीं जा सकता. तो इंतज़ार करते हैं 24 अक्टूबर का.