प्रणव मुखर्जी के बेटे के खिलाफ माफूज़ा ख़ातून

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पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी के खिलाफ पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी, अपनी पहली मुस्लिम महिला उम्मीदवार, माफूज़ा ख़ातून को उतार रही है. वो मुर्शिदाबाद जिले के जंगीपुर संसदीय सीट से उम्मीदवार हैं.

विपक्ष हमेशा ही भारतीय जनता पार्टी पर ये आरोप लगाता रहा है कि पार्टी मुस्लिमों के साथ दोहरा व्यवहार करती है. पार्टी मुस्लिम उम्मीदवारों को आसानी से पार्टी का टिकट नहीं देती, क्योंकि उनपर भरोसा नहीं करती.

माफूज़ा ख़ातून भाजपा की पहली महिला अल्पसंख्यक उम्मीदवार हैं, और भाजपा ने जिस तरह से उन्हें अभिजीत मुखर्जी के खिलाफ उतारा है, वो कुछ और ही कहानी कह रहा है. भाजपा ने उनपर भरोसा कर अपने एक ही कदम से विरोधियों की दस बातों का जवाब दे दिया है. लेकिन भाजपा के इतना भरोसा जता देने से माफूज़ा ख़ातून जिम्मेदारियों बहुत बढ़ गई हैं.

क्योंकि जंगीपुर कांग्रेस का गढ़ है, और ऐसी सीट के लिए भारतीय जनता पार्टी का माफूज़ा पर भरोसा जताना बड़ी बात है.

माफूज़ा ख़ातून साल 2001 और 2006 में सीपीएम के टिकट पर दक्षिण दिनाजपुर जिले की कुमारगंज सीट से पहले भी दो बार विधायक रह चुकी हैं. साल 2016 के विधानसभा चुनाव में हार मिलने के बाद उन्होंने 2017 में भाजपा का हाथ थाम लिया था.

भारतीय जनता पार्टी का हाथ थामने के लगभग एक साल बाद यानी 2018 में पंचायत चुनावों के दौरान उनके भाषणों ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया. और उनके यही भाषण उनको टिकट मिलने की वज़ह बने.

माफूज़ा ख़ातून इस ज़िम्मेदारी को निभाने के लिए तैयार हैं, और टिकट मिलते ही उन्होंने कमर भी कास ली है. जैसे ही उनकी उम्मीदवारी का ऐलान हुआ, वैसे ही उन्होंने जंगीपुर जाकर चुनाव अभियान की शुरुआत कर दी.

वो भारतीय जनता पार्टी की उस छवि को जनता के मन से मिटा देना चाहती हैं जो कुछ विपक्षी नेताओं ने पिछले कुछ सालों में, जनता के मन में बना दी है. इसी वज़ह से माफूज़ा ख़ातून सुबह 8 बजे उठ जाती हैं, और पैदल ही क्षेत्र में प्रचार पर निकल जाती हैं. वो छोटी- छोटी सभाएं करती हैं, जनता से मुलाक़ात करती हैं, रात तक क्षेत्र के नेताओं के साथ बैठक करती हैं, और अगले दिन के कार्यक्रम तय करती हैं.

उनका मानना है कि भारतीय जनता पार्टी में अब कोई नेता बंद कमरों में भी मुस्लिमों का विरोध नहीं करते, लेकिन लोगों को लगता है कि ये पार्टी मुस्लिमों के खिलाफ़ है. विपक्ष ने इसकी छवि ही खराब बना दी है, और मैं लोगों की नज़रो में बनी इसी छवि बदल देना चाहती हैं.

एक चर्चित मीडिया संस्थान से बात करते हुए उन्होंने बताया कि क्षेत्र के अल्पसंख्यक संगठन भाजपा के खेमे में आ रहे हैं. सबका साथ सबका विकास पर लोग भरोसा जता रहे हैं.

वो मानती हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मुस्लिम महिलाओं की तकलीफ़ें दूर करने पर बहुत ध्यान दिया है, और भारतीय जनता पार्टी का यह कदम सराहनीय है. मुस्लिम महिलाओं को इन कदमों की खास ज़रूरत थी जो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके लिए उठाए हैं.

जंगीपुर के क्षेत्र में 24 लाख से ज्यादा लोग रहते हैं. और इन लोगों में से कम से कम 60 फीसदी लोग किसी ना किसी तरह से बीड़ी बनाने के काम से जुड़े हुए हैं. बीड़ी बनाशे वाले इन लोगों सामने बहुत सी छोटी- बड़ी दिक्कते आती हैं, लेकिन उनकी इन दिक्कतों पर ना तो राज्य सरकार ध्यान देती है, और ना ही कोई सांसद या विधायक.

माफूज़ा ख़ातून इन बीडी बनाने वालों की समस्याओं को समझने की कोशिश में जुटी हुई हैं, ताकि सबकुछ समझ लेने के बाद भविष्य में वो इनकी समस्याओं को सरकार के सामने रख सकें.

बीजेपी उम्मीदवार माफूज़ा खातून इलाके की मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों के बारे में बताती हैं. वो उन्हें समझाती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने महिलाओं के लिए क्या- क्या किया. और कैसे उन्होंने उनकी ज़िंदगी को पहले से बेहतर बनाया.

जंगीपुर इलाक़े में रहने वाले ज्यादातर लोग खेती कर के और बीड़ी बनाकर ही रोज़ी-रोटी का इंतजाम करते है. इन लोगों में से करीब 67 प्रतिशत लोग अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. यही वज़ह है कि यहाँ से अधिकतर राजनैतिक दलों के उम्मीदवार भी इसी अल्पसंख्यक समुदाय से हैं. सिर्फ एक कांग्रेस ही ऐसी पार्टी है जिसपर अल्पसंख्यक उम्मीदवार नहीं है.

लेकिन कांग्रेस का दबदबा यहाँ की सीट पर फिर भी कायम है, और एक लम्बे वक़्त से ये क्षेत्र कांग्रेस का गढ़ बना हुआ है. यहाँ की जनता का कांग्रेस में अटूट विश्वास बना रहा है, और यही वज़ह है कि पहले प्रणव मुखर्जी, और उनके बाद उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी इस सीट पर जमे हुए हैं.

लेकिन कांग्रेस पर से लोगों का लगातार उठता भरोसा, और माफूज़ा ख़ातून की मेहनत इस बार कुछ अलग ही कानाफूसी करते नज़र आ रहे हैं. माफूज़ा ख़ातून के भाषणों से प्रभावित होकर उनकी सभाओं में भीड़ उमड़ रही है, और इस भीड़ में सबसे ज्यादा मात्रा में महिलायें हैं. अब देखना ये है कि ये भीड़ वोटों में बदलती है या नहीं.

हम ये देखने के लिए बेताब है कि क्या माफूज़ा खातून कांग्रेस के इस गढ़ को भेद पाएंगी? क्योंकि अगर वो ऐसा कर लेती हैं तो ये किसी इतिहास को बदलने से कम नहीं होगा. एक लम्बे वक़्त से इस क्षेत्र में ऐसा नहीं हो पाया है.

और माफूज़ा ख़ातून को चिलचिलाती धूप में पैदल चलता, गाँव- गाँव सभाएं करता देख ऐसा लगता है कि उन्होंने जिद पकड़ ली है इस इतिहास को बदल डालने की. और शायद इस इतिहास को बदलने की जिद का ही असर है, जो माफूज़ा ख़ातून को मजबूर कर रहा है कि वो तेज़ धूप में पैदल चलते हुए, क्षेत्र का पूरा भूगोल नाप लें.

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