मुलायम सिंह यादव और साधना गुप्ता की प्रेम कहानी

729

आग़ाज़मोहब्बत का अंजाम बस इतना है

जब दिल में तमन्ना थी अब दिल ही तमन्ना है!

ये शेर है जिगर मुरादाबादी का जो मोहब्बत का अंजाम बताता है. लेकिन कुछ मोहब्बतों की कहानियां इससे अलग होती हैं.

ऐसी ही एक अलग मोहब्बत की कहानी है सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और उनकी दूसरी पत्नी साधना गुप्ता की. इस कहानी में प्यार है, अलगाव है, ईमानदारी है, भरोसा है, रिश्तों के इलज़ाम भी और पारिवारिक लड़ाई भी. एक मोड़ पर ये कहानी सब छोड़कर प्यार को, प्यार के परिवार को अपनाती नज़र आती है तो एक मोड़ पर कुर्सी और सियासत की जंग दिखाती है.

80 का दशक मुलायम सिंह यादव की ज़िंदगी का वो दौर था जब सियासत के गलियारों में उनके नाम वाली तूती की हल्की धुन सुनाई देने लगी थी. उनका सितारा बुलंदियों पर चढ़ रहा  था और चमक बढ़ रही थी. ऐसा बताया जाता है कि साल 1982 में जब मुलायम सिंह यादव लोकदल के अध्यक्ष बने तो उनकी मुलाक़ात एक तीखे नैन-नक्श वाली कार्यकर्ता से हुई.

मुलायम सिंह यादव ने जब उसको देखा तो देखते ही रह गए. प्यार ने अपनी पहली दस्तक दे दी. नाम था साधना गुप्ता. साधना मुलायम सिंह यादव से उम्र में करीब 20 साल छोटी थीं और मुलायम सिंह यादव को भा गई थीं. मुलाक़ात नई थी सो दिल की बात दिल में ही दब गई और सोच कहानी ना बन सकी. मुलायम सिंह यादव इज़हार ना कर सके और वक़्त यूँ ही बीतता रहा. नतीज़ा ये हुआ कि 4 जुलाई 1986 को इटावा के बिधूना की रहने वाली साधना गुप्ता की शादी फर्रुखाबाद के चंद्रप्रकाश गुप्ता के साथ हो गई. शादी के एक साल बाद ही 1987 में 7 जुलाई को साधना ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया प्रतीक यादव.

साधना गुप्ता और उनके पति के बीच शादी के बाद से सबकुछ ठीक नहीं चल रहा था. यही वज़ह रही कि प्रतीक का जन्म होने के करीब दो साल बाद साधना गुप्ता और चंद्रप्रकाश गुप्ता एक-दूसरे से अलग हो गए. अपने पति से अलग होने के बाद साधना गुप्ता की नजदीकियां मुलायम सिंह यादव से काफी बढ़ने लगीं. लोग कहते हैं कि दोनों ने एक लम्बे अरसे तक एक-दूसरे से मुलाकातें कीं. इन सारी मुलाकातों का नतीज़ा ये निकला कि शादीशुदा मुलायम और तलाकशुदा साधना गुप्ता दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे. इश्क परवान चढ़ने लगा और यहीं से शुरुआत हुई एक अलग सी प्रेम कहानी की.

कुछ समाचार पोर्टल्स की मानें तो मुलायम सिंह यादव की पत्नी मालती देवी को अखिलेश के जन्म के बाद ही लकवा मार गया था और साधना गुप्ता को करीब लाने की वज़ह मुलायम सिंह यादव की माँ मूर्ति देवी ही बनी थीं. अक्सर बीमार रहने वाली मूर्ति देवी एक बार बीमार हुईं तो उन्हें लखनऊ के एक नर्सिंग होम में भर्ती कराना पड़ा और साधना गुप्ता उनकी देखभाल में लग गईं.

इसके बाद मूर्ति देवी को किन्ही कारणों से सैफई के मेडिकल कॉलेज ले जाना पड़ा, लेकिन साधना गुप्ता यहाँ भी जी जान से उनकी सेवा में जुटी रहीं. कुछ वेबसाइट्स तो यहाँ तक बताती हैं कि एक बार मेडिकल कॉलेज स्टाफ की गलती से मूर्ति देवी को गलत इंजेक्शन लगने जा रहा था, तब साधना गुप्ता ने ही नर्स को रोक दिया और मूर्ति देवी को गलत इंजेक्शन लगने से बचाया.

साधना गुप्ता को जी-जान से अपनी माँ मूर्ति देवी की सेवा में लगा देख मुलायम सिंह साधना गुप्ता को अपना दिल दे बैठे. दोनों एक-दूसरे से प्यार करने लगे लेकिन अपनी राजनीतिक साख के चलते मुलायम सिंह यादव और साधना गुप्ता ने इस बात की खबर किसी को नहीं होने दी. लेकिन वो कहा जाता है ना कि इश्क बहुत दिनों तक छुपा नहीं रहता. यही यहाँ भी हुआ, ना जाने कैसे चोरी-छिपे चल रहा ये रिश्ता 80 के दशक में ही अमर सिंह की नज़र में आ गया. अमर सिंह ने भी इस बात को जानने के बाद चुप्पी साथ ली और ये रिश्ता चलता रहा.

ये इश्क लगातार परवान तो चढ़ रहा था लेकिन लोगों के सामने अभी तक नहीं आया था. इस मामले ने असली करवट ली तब जब 90 के दशक में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने और हर तरफ यह फुसफुसाहट होने लगी कि मुलायम सिंह यादव की दो बीवियां हैं.

ये बात कह तो सभी रहे थे, लेकिन बस दबी जुबान में. किसी की ये हिम्मत नहीं हो रही थी कि वो सामने आकर दोनों के रिश्ते के बारे में आवाज़ उठा सके. मुलायम सिंह यादव के बारे में ये बात भी कही जाने लगी कि वो साधना गुप्ता की हरे छोटी-बड़ी बात को मानते हैं.

वो 90 के दशक का आख़िरी दौर था जब दोनों का रिश्ता अखिलेश यादव और मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी के सामने आ गया. लेकिन बात को फिर से दबा दिया गया. वज़ह फिर से राजनीतिक कारण ही बने.

एक दशक से ज्याद का वक़्त बीत चुका था लेकिन साधना गुप्ता को अभी तक मुलायम सिंह यादव की आधिकारिक पत्नी का दर्ज़ा नहीं मिला था, और ना ही प्रतीक यादव को मिला था मुलायम सिंह यादव के बेटे का दर्ज़ा.   

लोगों की जुबानी पता लगता है कि हुआ था तो बस इतना कि साल 1994 में साधना गुप्ता के बेटे प्रतीक यादव के स्कूल फॉर्म में पिता के नाम वाले कॉलम में एम.एस यादव लिखा गया था. और पते वाले कॉलम में सपा सुप्रीमो के ऑफिस का पता भरा हुआ था. ठीक इसी तरह ही यह बात भी उस वक़्त खूब फ़ैली थी कि 2000 में भी प्रतीक यादव के गार्डियन के तौर पर मुलायम सिंह का ही नाम था.

साल 2003 में जब मुलायम सिंह यादव की पहली पत्नी मालती देवी का निधन हुआ तो साधना गुप्ता ने मुलायम सिंह यादव पर यह दबाव बनाया कि वो उन्हें अपनी आधिकारिक पत्नी घोषित करें. लेकिन परिवार, राजनीति और खासकर अपने बेटे अखिलेश यादव को ध्यान में रखते हुए मुलायम सिंह यादव ने ऐसा नहीं किया.

ये रास्ता काम नहीं आया तो साधना गुप्ता ने अमर सिंह से मुलाकात शुरू की और उनसे बार-बार कहा कि वो मुलायम सिंह यादव से को इस बात के लिए मनाएं कि वो दुनिया के सामने साधना गुप्ता को उनकी आधिकारिक पत्नी का दर्ज़ा दें.

अमर सिंह जो कि एक लम्बे वक़्त से सारी बातें जानते थे, मुलायम सिंह को मनाने की कोशिश में जुट गए. वो कोशिश करने लगे कि मुलायम सिंह यादव साधना गुप्ता को और प्रतीक गुप्ता को सार्वजनिक तौर पर अपना लें.

अमर सिंह ने खुद ही सार्वजनिक मंच पर खड़े हो यह बात कही कि वो साधना गुप्ता और प्रतीक गुप्ता को अपना लें. बात सबके सामने आई तो मुलायम सिंह यादव इसके लिए तैयार हो गए, और साधना 23 मई सन 2003 में साधना गुप्ता को मुलायम सिंह की पत्नी का दर्ज़ा मिल गया.

मुलायम सिंह का यादव परिवार तो पहले ही साधना गुप्ता को अपना चुका था लेकिन अखिलेश यादव उन्हें अपनी सौतेली माँ मानने को तैयार ही नहीं थे. खैर साधना गुप्ता को इस बात से कोई मतलब नहीं था. पत्नी का दर्ज़ा मिल जाने के बाद से साधना गुप्ता संपत्ति बनाने में जुट गईं.

उन्होंने अपने नाम इतनी संपत्ति बनाई कि आयकर विभाग में उनके पास आय से ज्यादा संपत्ति होने का मुकदमा भी लंबित है.

मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता को लोग हमेशा समाजवादी पार्टी में चल रहे झगड़े की वज़ह मानते रहे हैं. लोगों से दबे मुंह सुनने को मिलता रहा कि वो एक महत्वकांक्षी महिला है. और यहाँ तक कि उन्होंने खुद भी कहा कि वो राजनीति में आना और करियर बनाना चाहती थीं मगर नेता जी यानी मिलायम सिंह के मना कर देने की वज़ह से नहीं आ सकीं.

मुलायम सिंह यादव ने उन्हें राजनीति में आने के लिए मना कर दिया था लेकिन वो फिर भी परदे के पीछे से पार्टी के साथ काम करती रहीं.

अखिलेश यादव और साधना गुप्ता में हमेशा ही तना-तनी चलती रही. वज़ह कभी राजनीति तो कभी परिवार. साधना गुप्ता एक लम्बे अरसे से चाहती हैं कि उनका बेटा प्रतीक जो कि बॉडी बिल्डिंग कर रहा है, जिम चला रहा है और रियल एस्टेट के बिज़नस में है वो भी अखिलेश की तरह ही राजनीति में आ जाये.

एक तरफ साधना गुप्ता अखिलेश को अपना बड़ा बेटा कहती रहीं और दूसरी तरफ अखिलेश उनको कैकेयी. अखिलेश उनको समाजवादी झगडे की वज़ह मानते रहे और वो खुद को इस झगडे से अलग.

शुरुआत से लेकर अंत तक इस कहानी को समझने के बाद भी बहुत कुछ है जो अनसुलझा सा रह जाता है. समझ ही नहीं आता कि क्या सबकुछ उतना ही सीधा है जितना ये कहानियां कहती हैं? क्या सबकुछ उतना ही बेदाग़ है जितना साधना गुप्ता कहती हैं? या कि सबकुछ उतना ही उलझा हुआ है जितना अखिलेश समझते हैं?

जो भी हो लेकिन एक बात तो साफ़ है कि हर मोहब्बत को अपनी मंजिल पाने में मशक्कत बड़ी करनी पड़ी, और उसके बाद भी इन मशक्कती मोहब्बतों को कभी सराहा नहीं गया.

देखिये हमारा वीडियो: