वो नेता जो कांग्रेस में रहते हुए भी संजय गाँधी के सामने ना झुका

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सियासत हमेशा से एक समंदर सी रही है. ये कहाँ पर कितनी गहरी है और कहाँ पर कितनी उथली पता ही नहीं चलता. किस सीप में मोती है और किस सीप के अन्दर घोंघा पता ही नहीं चलता. बशीर बद्र साहब का एक शेर है इसी सियासत पर,

“मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए,
कभी सोने कभी चांदी के क़लम आते हैं!”

शेर में बताये गए हालातों से ही शुरुआत हुई थी इंद्र कुमार गुजराल के आम से ख़ास हो जाने की. उन्हें राजनीति में एक मोहरे के तौर पर लाया गया, लेकिन किसी को क्या पता था कि यही मोहरा एक रोज़ आधी रात को सोते से जागकर देश का प्रधानमंत्री बन बैठेगा.

इंद्र कुमार गुजराल की कहानी एक ऐसी कहानी है जो किस्मत, काम और दूसरों की कारस्तानी के चलते कहानी बन गई.

किसी भी पार्टी, या किसी भी राजनेता की गुलामी ना कर के उन्होंने वो सब किया जो उन्हें अच्छा लगा. अपनी बात रखने में वो कभी डरे नहीं, और अपने मन का करने में वो कभी ठिठके नहीं.

एक तरफ वो इंदिरा गांधी के सबसे भरोसेमंद नेताओं में भी शामिल रहे, और दूसरी तरफ उन्होंने संजय गांधी को ये भी समझा दिया कि वो अपनी हद में ही रहे तो अच्छा है.

तो आइये आपको बताते हैं कि हमने राजनीति की किताबों में जब उनके नाम के पन्ने खोले तो हमें क्या मिला. बात तब की है जब देश आज़ाद नहीं हुआ था, और टुकड़ों में नहीं बंटा था. तारीख थी 4 दिसम्बर और साल था 1919, पंजाब के झेलम कस्बे में एक स्वतंत्रता सेनानी दम्पति, पुष्पा गुजराल और अवतार नारायण गुजराल के यहाँ एक बच्चे का जन्म हुआ. इस बच्चे का नाम रखा गया इंद्र कुमार गुजराल.

पिता स्वतन्त्रता सेनानी थे, और उन्ही की छाप इनपर भी पड़ी, साल 1931 में जब इनकी उम्र महज़ 11 साल थी, इन्होने स्वतंत्रता संग्राम में भाग लिया, और झेलम के युवा बच्चों का नेतृत्व किया. इस आन्दोलन के दौरान पुलिस ने उनको गिरफ्तार किया और बेरहमी से मारा.

इंद्र कुमार गुजराल बचपन से ही पढ़ने में काफी तेज़ थे. लाहौर के डीएवी कॉलेज में पढ़ाई के दौरान वो मशहूर कलमकार फैज़ अहमद फैज़ के छात्र भी रहे. ये बात साल 1940 के करीब की है. ब्रिटिश हुकूमत के पाँव अभी देश से उखड़े तो नहीं थे, लेकिन भारत में हो रहे विरोध को देखकर इनमें कंपकंपी होने लगी थी.

और ऐसे में फैज़ अहमद फैज़ इंद्र कुमार गुजराल को पढ़ा रहे थे.

“रौशन कहीं बहार के इमकान हुए तो हैं”

ये उनका ही लिखा एक शेर था, जो इस उम्मीद से भरा था कि आज़ादी आयेगी तो रौशनी होगी. लेकिन फिर आज़ादी और बंटवारे के दौरान हो रहे दंगों को देखकर इन्ही फैज़ अहमद फैज़ को ये लिखना पड़ा था कि,

ये दाग़ दाग़-उजाला, ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतज़ार था जिसका, ये वो सहर तो नहीं
ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर
चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं

साल 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में भाग लेने के दौरान इंद्र कुमार गुजराल को एक बार फिर गिरफ्तार किया गया, और जेल भी भेजा गया. साल 1946 में इन्होने शीला देवी से शादी कर ली.

खैर, इंद्र कुमार गुजराल ने एम.ए, बी.कॉम, पीएच.डी. और डी. लिट. की उपाधि प्राप्त की. इसके बाद साल 1958 में वो एक प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर “नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल” के उपाध्यक्ष बनकर दिल्ली आ गए.

देश को उस वक़्त कांग्रेस चला रही थी. और देश के प्रधानमंत्री थे पंडित जवाहरलाल नेहरु. कांग्रेस का अंदरूनी माहौल उन दिनों कुछ बदला हुआ सा था. पंडित जवाहरलाल नेहरु की बेटी इंदिरा गांधी खुद को अपने पिता की राजनीतिक उत्तराधिकारी साबित करने के लिए तैयारी करने लगी थीं.

राजनीति के बारे में एक बात कहा करते थे हमारे बुज़ुर्ग, कि राजा या नेता वही अच्छा होता है जिसके दरबार में कुशल राजनीतिज्ञों और ज्ञानियों की बड़ी फौज होती है. इंदिरा गांधी को नेता बनना था, और उसके लिए ज्ञानियों की फौज चाहिए थी.

दिल्ली आने के बाद इंद्रा कुमार गुजराल का उठना बैठना कांग्रेस के कुछ छोटे- मोटे नेताओं के साथ शुरू हो गया था. वो इंदिरा गाँधी से मिले और राजनीति में रूचि के कारण ये कांग्रेस में शामिल हो गए. साल 1964 में पंडित जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस, और दुनिया को छोड़ गए. इसी साल इंद्र कुमार गुजराल को राज्यसभा के लिए चुना गया.

साल 1967 में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री और संसदीय कार्य राज्यमंत्री का पद भी दिया गया. वो उमा शंकर दीक्षित और दिनेश सिंह की तरह ही इंदिरा गांधी के खास नेताओं में शुमार होने लगे थे.

सबकुछ ठीक चल रहा था लेकिन फिर साल 1977 में देश में एमरजेंसी की घोषणा हुई. एमरजेंसी का ये फैसला वैसे तो इंदिरा गांधी का था, लेकिन बहुत से लोग ऐसा भी बताते हैं कि, नाम भले ही इंदिरा का हो मगर ये काम उनके छोटे बेटे संजय गांधी के दिमाग का था.

संजय गांधी चाहते हे कि देश का मीडिया इंदिरा गांधी का हो जाए, और वो उतना ही बोले जितना उससे बुलवाया जाए. उनकी इस चाहत को पूरा करने का जो एकमात्र रास्ता था, वो इंद्र कुमार गुजराल के पास से होकर ही गुज़रता था, क्योंकि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की बागडोर उस वक़्त इंद्र कुमार गुजराल के हाथों में ही थी.

यही वज़ह रही कि एक रोज़ संजय गांधी ने इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री आवास बुलवाया. इंद्र कुमार गुजराल को लगा कि ये बुलावा इंदिरा गांधी की तरफ से आया है. और वो प्रधानमंत्री आवास पहुँच गए.

यहाँ पहुँच जाने के बाद उन्हें ये पता चला कि उनको जो बुलावा भेजा गया था, वो इंदिरा गांधी की तरफ से नहीं था बल्कि उनके बेटे संजय गांधी की तरफ से था. संजय गांधी ने इंद्र कुमार गुजराल को तीखे अंदाज़ में कुछ निर्देश दिया, और आखिर में अकड़ते हुए ‘ऐसे नहीं चलेगा’ कहते हुए अपनी बात ख़त्म की.

इंद्र कुमार गुजराल को संजय गांधी का ये अंदाज़ काट गया. उन्होंने संजय गांधी को उनके ही अंदाज़ में जवाब देते हुए कहा,

“जबतक मैं हूँ तबतक तो ऐसा ही चलेगा, और तमीज से बात किया करो संजय, तुम मेरे बेटे की उम्र के हो, मैं आर्डर तुम्हारी मम्मी से लेता हूँ तुमसे नहीं.”

संजय गांधी को दो टूक जवाब देकर गुजराल वहाँ से चले गए. बहुत सी रिपोर्ट्स ये भी बताती हैं कि इससे पहले भी एक बार इंद्र कुमार गुजराल और संजय गांधी के बीच झड़प हो चुकी थी. ऐसा कहा जाता है कि संजय गाँधी कभी इंदिरा गाँधी के मंत्रिमंडल के मंत्रियों की इज्ज़त नहीं करते थे. और संजय गांधी के सारे फैसले मंत्रियों को मानने ही होते थे.

इस घटना से पहले एक कैबिनेट मीटिंग ख़त्म होने के बाद संजय गांधी ने इंद्र कुमार गुजराल को फरमान सुनाते हुए कहा था,


“मैं ऑल इंडिया रेडियो के न्यूज बुलेटिन प्रसारित होने से पहले देखना चाहता हूं.”

इंद्र कुमार गुजराल ने संजय गांधी को दो टूक जवाब देते हुए कहा,

“ये मुमकिन नहीं है, मैं भी प्रसारण से पहले कभी कोई बुलेटिन नहीं देखता.”

बात ये भी आगे बढ़ती लेकिन उस वक़्त इंदिरा ने आकर मामले को संभाल लिया था.

पहले हो चुकी बुलेटिन वाली घटना, और बाद में आवास पर हुई इस झड़प ने इंदिरा गांधी को दोराहे पर लाकर खड़ा कर दिया था. एक तरफ उनका अपना बेटा था और दूसरी तरफ भरोसेमंद और अनुभवी मंत्री इंद्र कुमार गुजराल.

इंदिरा दोनों में से किसी को नहीं खो सकती थीं, इसलिए उन्होंने एक बीच का रास्ता निकाला. इंद्र कुमार गुजराल से सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय वापस ले लिया गया, और उनकी जगह विद्याचरण शुक्ल को ये पद सौंप दिया गया. इसके बाद इंदिरा गांधी ने इंद्र कुमार गुजराल को सोवियत संघ में भारत का राजदूत बनाकर मास्को भेज दिया.

सन 1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई तब से हालातों का बिगड़ना शुरू हो गया. राजीव गांधी की सरकार आई तो एक तरफ बोफोर्स के घोटाले के बाद वीपी सिंह ने राजीव गांधी की खिलाफत करनी शुरू की. और दूसरी तरफ इंद्र कुमार गुजराल को भी महसूस होने लगा कि कांग्रेस में उनको वो सम्मान नहीं दिया जा रहा है जो पहले मिलता था.

वीपी सिंह ने एक नया दल बनाया जनता दल. और इंद्र कुमार गुजराल ने कांग्रेस को छोड़कर जनता दल का हाथ थाम लिया. उन्होंने राजदूत के तौर पर अपना कार्यकाल बीच में ही छोड़ दिया और इस्तीफ़ा देकर जनता दल में सक्रिय हो गए.

गुजराल पहली बार 1989 में पंजाब की जालंधर निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा में पहुंचे. साल 1998 में वो दोबारा भी इसी क्षेत्र से चुनाव लड़े और सांसद बने. इसके बाद 1989- 90 की विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार में और 1996-97 की एच.डी. देवगौड़ा की सरकार में इंद्र कुमार गुजराल विदेश मंत्री भी रहे.

बिहार के दलित नेता सीताराम केसरी को देवगौड़ा सरकार पसंद नहीं थी. उनकी महत्वकांक्षाएं उन्हें राजनीति में बहुत ऊपर बिठाना चाहती थीं. यही वज़ह रही कि उन्होंने कांग्रेस को भड़काया कि देवगौड़ा सरकार से समर्थन वापस लिया जाए.

बहुत से नताओं को कांग्रेस के इस फैसले से झटका लगा. ये सभी के लिए चौंकाने वाली बात भी थी. मगर सीताराम केसरी पूरा बही खाता बना चुके थे कि, कितना जोड़ने, और कितना घटाने से वो प्रधानमंत्री बन पायेंगे.

चर्चाएँ तेज़ होती रहीं और उस वक़्त के सियासी गलियारों की ज़मीन मानो तपने सी लगी. देवगौड़ा ने अपना इस्तीफा दे दिया. प्रधानमंत्री की कुर्सी अब खाली थी, पूरे देश के नेता इस कुर्सी पर अपनी दावेदारी बताने लगे. किसी का नाम उठता तो कोई मुकर जाता, और किसी का नाम उठता तो कोई. कोई जब कहता कि ये अच्छे हैं, तो दूसरा कह देता, अरे ये क्या अच्छे हैं, इनसे अच्छे तो वो हैं.

दावेदारी की बातें चलती रहीं, सुबह, दोपहर, शाम, बैठकें होती रहीं, और इन बैठकों में ही एक दिन फैसला आया कि प्रधानमंत्री बनेंगे इंद्र कुमार गुजराल. इस बात का कोई प्रमाण तो नहीं है, लेकिन राजनीति की बातों के बीच बहुत बार ये किस्सा भी सुनने को मिल ही जाता है कि, जिस दिन ये फैसला लिया गया कि इंद्र कुमार गुजराल को प्रधानमंत्री बनाया जाएगा, उस दिन एक सांसद ने आधी रात को 2 बजे उनके कमरे में जाकर, उन्हें जगाकर बताया कि उठिए आपको प्रधानमंत्री बनना है.

यह भी कहा जाता है कि पहले तो वो इस बात को सुनकर चौंके, और फिर बहुत खुश होते हुए उन्होंने उस सांसद को गले से लगा लिया. 21 अप्रैल 1997 को वो देश के प्रधानमंत्री बने. सभी को लग रहा था कि उनकी ये सरकार लम्बी नहीं चलेगी, और इसकी वजह बनेंगे सीताराम केसरी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ और वो लगभग 11 महीनों तक देश के प्रधानमंत्री रहे. तारीख 4 दिसम्बर साल 1997 को लोकसभा के भंग होने का ऐलान हुआ और बतौर प्रधानमंत्री ये उनका आख़िरी दिन साबित हुआ. और आप गौर करें तो आपको याद आयेगा कि 4 दिसम्बर ही उनका जन्मदिन भी है. उनका जन्मदिन ही प्रधानमंत्री पद पर उनका आख़िरी दिन साबित हुआ.

इसके बाद साल 1999 में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया, और लेखन से जुड़ गए. उन्होंने अपने लेखन के जरिए भारतीय राजनीति का मार्गदर्शन किया. उन्होंने ‘मैटर्स ऑफ डिस्क्रिशन’ नाम से अपनी आत्मकथा भी लिखी.

2011 में वो डायलिसिस पर चले गए. अगले साल उनको फेफड़ों का इन्फेक्शन हुआ. और 30 नवम्बर 2012 को वो गुरुग्राम में दुनिया को अलविदा कह गए.

राजनीति सच में अटपटी दुनिया है. एक तरफ राजनीति की इस दुनिया में इंद्र कुमार गुजराल दिखाई देते हैं, जो एकदम से रातों रात प्रधानमंत्री बन जाते हैं, और दूसरी तरफ इन्ही राजनीतिक गलियारों में टहलते हुए कुछ नेता अपना पूरा जीवन बिताने के बाद भी इस पद तक नहीं पहुँच पाते.

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