LGBT कम्युनिटी के प्राइड मार्च में लगे देश विरोधी नारे

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रविवार 24 नवम्बर को दिल्ली में LGBT कम्युनिटी ने प्राइड मार्च का आयोजन किया. LGBT कम्युनिटी यानी कि समलैंगिक लोग. ये प्राइड मार्च समलैगिकों ने अपने अधिकारों की रक्षा की मांग करने के लिए निकाला लेकिन ये बस एक वामपंथी प्रोपगैंडा और एजेंडा बन कर रह गया. ये हम यूँ ही नहीं कह रहे. अगर आपने इस प्राइड मार्च में लगते नारों और लहराए जाते तख्ती- बैनरों को देखा होता तो आप भी समझ जाते.

बारहखम्बा रोड से लेकर जंतर मंतर तक निकाले गए इस मार्च में आज़ादी के नारे लगे. अगर आप को लग रहा है कि ये लोग प्यार करने की आज़ादी मांग रहे थे तो आप गलत सोच रहे थे. ये आज़ादी के नारे जेएनयू वाले नारे थे- कश्मीर मांगे आज़ादी, ब्राह्मणवाद से आज़ादी, संघवाद से आज़ादी, मनुवाद से आज़ादी. अब कश्मीर की आजादी से समलैंगिकों के अधिकारों का क्या सम्बन्ध ये कोई नहीं जानता. इस तथाकथित प्राइड मार्च में पीएम मोदी के बारे में भी अपशब्दों और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया. भारत माता वांट्स गर्लफ्रेंड, रेनबो ओवर सैफरन जैसे बैनर लहराए गए.

बात सिर्फ इस बार की नहीं है. साल 2018 में भी ऐसी प्राइड मार्च का आयोजन किया गया था और उस मार्च में भी हिन्दू विरोधी नारे लिखे पोस्टर भी लहराए गए. ब्राह्मणवादी पितृसत्ता का नाश हो, “मंदिर राज नहीं चलेगा”, “ये लव जिहाद क्या है इस्लामोफोबिया है” जैसे नारे लिखे बैनर भी लहराए गए.

“मंदिर राज नहीं चलेगा, होगी प्यार कि जीत” का इशारा अयोध्या की तरफ था. इस्लामिक आतंकवाद को इस्लामोफोबिया कह कर नकारना लिबरल गैंग का जाना माना एजेंडा है. कश्मीर कि आजादी की ख्वाहिश वामपंथी गैंग को कितनी बेसब्री से है ये किसी से छुपा नहीं है और इसे प्राइड मार्च का नाम दिया जाता है. ये प्राइड मार्च तो कतई नहीं था बल्कि ये हिन्दू विरोधी और देश विरोधी मार्च जरूर था. ऐसा लग रहा था जैसे जेएनयू और वामपंथी गैंग ने इस तथाकथित प्राइड मार्च को हाइजैक कर लिया हो  और अपने एजेंडे के लिए इस्तेमाल किया हो.

LGBT समुदाय चाहता है कि लोग उन्हें अलग नहीं माने, उन्हें अपनाए. वो भी इंसान है, बस ऊनकी पसंद औरों से अलग है. लेकिन अगर उन्हें लगता है कि ऐसी हरकतों से लोग उन्हें अपनाएंगे तो वो गलत सोच रहे हैं. ऐसी हरकतों के कारण LGBT कम्युनिटी खुद को लोगों से दूर कर रहा है खुद को देश विरोधी और हिन्दू विरोधी साबित कर रहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने 6 सितम्बर 2018 को धारा 377 को समाप्त कर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि समलैंगिकता अपराध नहीं है. कोर्ट ने धारा 377 को अतार्किक और मनमानी बताते हुए कहा कि LGBT समुदाय को भी समान अधिकार है. कोर्ट का कहना था कि यौन प्राथमिकता बाइलोजिकल और प्राकृतिक है. अंतरंगता और निजता किसी की निजी च्वाइस है. इसमें राज्य दखल नहीं दे सकता. किसी भी तरह का भेदभाव मौलिक अधिकारों का हनन है.

देश ने समलैंगिकों को स्वीकार किया है. सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए उनके अधिकारों का सम्मान किया है लेकिन इसके बावजूद देश विरोधी नारे. इसके बावजूद एक खास कम्युनिटी और धर्म के खिलाफ इस तरह नफरत का इजहार समझ से परे है. ऐसा लगता है कि LGBT कम्युनिटी के भविष्य की तरह इनकी बुद्धि और सोच भी अंधकारमय है.