मिलिए,931 हत्या करने वाले भारतीय इतिहास के सबसे खतरनाक सीरियल किलर से

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बचपन मे हमने ठगों की खूब कहानियां सुनी,कभी दादी तो कभी दादा ने हमे अपनी गोद में खूब कहानियां सुनाई है। कोई कोई कहानी तो वाकई डरा ही देती थी। खैर जब बात जब ठग की चल ही रही है तो आइये आपको एक ऐसे ठग की कहानी बताते चलते है.जिसने पूरे भारत में अपना ऐसा खौफ बनाया था की उसके सामने आने के बाद किसी का भी जिन्दा वापिस लौटना नामुमकिन ही था. वो जिधर जाता उधर ही इलाका उसकी आहट भर से खाली हो जाता था.

वो ठग अपने पास हमेशा पीले रंग का रेशम का एक रूमाल रखा करता था, जिसे गले में फंसाकर वह मुसाफिरों की हत्या करता और उसका सामान लूट लेता. उसने एक नही बल्कि 931 लोगो को मौत की नींद सुला दिया था. कहानी थोड़ी सी फ़िल्मी है पर कसम से है मजेदार.

ये कहानी आज से लगभग १५० साल पुरानी है। इस ठग की कहानी को ठीक से समझने के लिए हमें उसी टाइम में (1765-1840) में चलना होगा, जिसमें वो रहता था। 18वीं सदी खत्म होने को थी। मुगल साम्राज्य देश से खत्म हो चला था। ईस्ट इंडिया कंपनी हमारे मुल्क में अपनी जड़े जमा चुकी थीं।

यूँ तो ब्रिटिश-पुलिस देश में कानून व्यवस्था दुरूस्त करने में जुटी थी। लेकिन उसके बावजूद दिल्ली से जबलपुर के रास्ते में पड़ने वाले थानों मे कोई भीं ऐसा दिन नही गुजरता था जब कोई पीड़ित आदमी अपने किसी करीबी की गुमशुदगी या लूट की रिपोर्ट दर्ज ना कराने आता हो। अंग्रेज अफसर परेशान थे कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में लोग कैसे गायब हो रहे है । कराची, लाहौर, मंदसौर, मारवाड़, काठियावाड़ के व्यापारी बड़ी तादाद में अपने पूरे काफिले के साथ गायब हो जाते थे। लखनऊ की खूबसूरत तवायफ हों, डोली में बैठकर ससुराल जाती नई–नवेली दुल्हनें हो या फिर बंगाल से इलाहाबाद और बनारस की तीर्थयात्रा पर आने वाले दल, सभी मंजिल से निकलने के लिए निकल तो रहे थे लेकिन बीच से ही गायब हो जाते थे. थानों में रखी फाइले लगातार लोगो की शिकायतों से बढ़ती जा रही थीं।

अंग्रेज अफसरों को चाहकर भी कुछ समझ नही आ रहा था. लोग गायब तो हो रहे थे लेकिन न तो उनसे जुड़ा कोई सुराख मिलता था और ना ही उनकी लाश, धीरे धीरे आलम ये हो गया कि ईस्ट इंडिया कंपनी को एक फरमान जारी करना पड़ा। फरमान के मुताबिक कंपनी-बहादुर का कोई भी सिपाही या सैनिक इक्का-दुक्का यात्रा नहीं करेगा। यात्रा करते वक्त सभी सैनिक बड़े झुंड में चले और अपनी साथ ज्यादा नकदी ना लेकर चले। घटनाओ से परेशान ईस्ट इंडिया कम्पनी ने अंग्रेज अफसर कैप्टन विलियम स्लीमैन को भारत बुलाया और गायब हो रहे लोगों के रहस्य का पता लगाने की जिम्मेदारी सौपी। थोड़े ही दिनों मे कैप्टन स्लीमैन ने ये पता लगा लिया कि इन लोगों के गायब होने के पीछे किसका हाथ है। दरअसल इसके पीछे एक गिरोह का हाथ था और इस गिरोह में करीब 200 सदस्य थे. इन्ही में से एक था बेरहाम ठग नाम का एक क्रूर इंसान, जो हाईवे और जंगलों पर अपने साथियों के साथ घोड़ों पर घूमता रहता।

उसके निशाने पर व्यापारी, अमीर सेठ और वेश्याए होती थी। स्लीमैन जानते थे कि जबलपुर और ग्वालियर के आस-पास ही ठग गिरोह सक्रिय है। ये दोनों ऐसी जगह थी जहां से देश के किसी भी कोने में जाने के लिये गुजरना पड़ता था। साथ ही साथ इस इलाके की सड़कें घने जंगल से होकर गुजरती थी। इसका फायदा ठग बडे आराम से उठाते थे। एक तो इन सुनसान जंगलों में किसी को भी निशाना बनाना आसान होता था साथ ही साथ अपने शिकार का काम तमाम करने के बाद यहां छिपना भी आसान था।

खैर, स्लीमैन की मेहनत रंग लाई और करीब 10 साल की थक्के खाने के बाद स्लीमैन ने बेहराम ठग को गिरफ्तार कर ही लिया।

गिरफ्तार होने के बाद बेहराम ठग ने बताया कि उसके गिरोह के कुछ सदस्य व्यापारियों का भेष बनाकर जंगलों में घूमते थे। और रात के अंधेरे में जो भी व्यापारियों का काफिला जंगल से गुजरता था, नकली भेष धारण करने वाले ठग उनके काफिले में शामिल हो जाते थे। ठगों का ये गिरोह धर्मशाला और बाबड़ी (पुराने जमाने के कुएं) इत्यादि के आस-पास भी बेहद सक्रिय रहता था। काफिले के लोगों को जब गहरी नींद आने लगती तो दूर से गीदड़ के रोने की आवाज आने लगती। ये गीदड़ की आवाज पूरे गिरोह के लिए एक सांकेतिक आदेश होता था कि अब काफिले पर हमला बोला जा सकता है। थोड़ी ही देर में अपने गिरोह के साथियों के साथ बेहराम ठग वहां पहुंचा जाता। सारे ठग पहले सोते हुये लोगों का मुआयना करते।

बेहराम ठग अपने गुर्गे को अपना सबसे पसंदीदा रुमाल लाने का आदेश देता। पीला रुमाल मिलते ही बेरहाम ठग अपनी जेब से एक सिक्का निकालता और रुमाल में एक सिक्का डालकर गॉठ बनाता। सिक्के से गॉठ लगाने के बाद बेहरम ठग सोते हुये काफिले के लोगों का गला घोट देता। काफिले में शामिल सभी लोगों को मौत के घाट उतारने के बाद बेरहाम ठग साथियों के साथ मिलकर जश्न मनाता था। लेकिन जश्न से पहले उन्हें करना होता था एक और काम। ठग मरे हुये लोगों की लाशों के घुटने की हड्डी तोड़ देते। हड्डी तोड़ने के बाद लाशों को तोड़ मोड़कर मौका-ए-वारदात पर ही एक गड्डा खोदकर दबा दिया जाता। दरअसल, काफिले में शामिल व्यापारियों को मारने के बाद बेहराम ठग और उसके गिरोह के सदस्य उनकी वही कब्रगाह बना देते थे। अगर वही उनकी कब्रगाह बनाना संभव ना हुआ तो उनकी लाशों को पास के ही किसे सूखे कुएं या फिर नदी में फेंक देते थे। यही वजह थी कि पुलिस को गुमशुदा लोगों की लाश कभी नहीं मिलती थी। और ना ही इन ठगों का कोई सुराग मिल पाता था। जब तक बेहराम ठग और उसके साथी काफिले के लोगों को ठिकाने नहीं लगा देते, शिकार का काम तमाम होने तक वे दोनों हाथ में सफेद रुमाल लिये हिलाते रहते। सफेद रुमाल से वे दोनों ठगों को इशारा करते रहते कि सबकुछ ठीक है। दिलचस्प बात ये थी कि शिकार का काम तमाम करने के बाद ये गिरोह मौका-ए-वारदात पर ही जश्न मनाता था। जश्न के तौर पर जिस जगह मारे गये लोगों की कब्रगाह बनाई जाती थी उसके पहले नाच-गाना करते। कव्वाली का दौर चलता। गाने-बजाने से जब थक जाते तो कब्रगाह के ऊपर बैठकर ही वो गुड़ खाते थे। कहते है ठग जिस किसी भी नए सदस्य को अपने गिरोह में शामिल करते थे तो उसे कब्रगाह पर बैठकर गुड़ जरुर खिलाया जाता था। बेहराम ठग ने गिरफ्तार होने के बाद खुलासा किया कि उसके गिरोह ने पीले रुमाल से पूरे 931 लोगो को मौत के घाट उतारा है। उसने ये भी खुलासा किया कि अकेले उसने ही 150 लोगों के गले में रुमाल डालकर हत्या की है। बेहराम की गिरफ्तारी के बाद उसके गिरोह के बाकी सदस्य भी पुलिस के हत्थे चढ़ गए। कहा जाता है की स्लीमैन का एक पड़पोता इंग्लैड में रहता है और उसने अपने ड्राइंगरुम में उस पीले रुमाल को अभी भी संजों कर रख रखा है। ये वही पीला रुमाल जिससे बेहराम ठग लोगों को मौत के घाट उतारता था और जिसके चलते उसे इतिहास का अबतक का सबसे बड़ा सीरियल किलर माना जाता है।