नए दौर में लिखेंगे हम नई प्रेम कहानी

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हम सुनते हैं एक लड़का और एक लड़की मिलते हैं.. उनकी नजरें मिलती हैं वो एक दुसरे को पसंद करने लगते हैं, फिर चुपके चुपके मुलाकातें होती हैं, इकरार होता है, इज़हार होता है, प्यार परवान चढ़ता है, फिर अगर परिवार सहमत होता है तो होती है शादी नहीं तो बगावत

इसीलिए कहा भी जाता है यह इश्क नहीं आसान बस इतना समझ लीजिये एक आग का दरिया है और डूब कर जाना है…… ये होती है आम प्रेम कहानी… लेकिन ये नए दौर की प्रेम कहानी है और यहाँ है कहानी में ट्विस्ट क्यूंकि जिस प्रेम कहानी से हम आपको रू ब रू करने वाले हैं वो किसी प्रेमी या प्रेमिका की नहीं बल्कि दो प्रेमिकाओं की है जिनका नाम है अभिलाषा और दीपशिखा.. अभिलाषा और दीपशिखा दोनों ही शादीशुदा थी लेकिन एक दुसरे के प्यार में दोनों अपने अपने पतियों को तलाक देकर अब एक दुसरे से शादी कर चुकी हैं और साथ साथ रह रही हैं और इस से भी ज्यादा हैरानी तब होती है जब पता चलता है इस में उनका साथ दे रहे हैं खुद अभिलाषा के पिता जिन्होंने ना केवल इनके प्यार को समझा बल्कि उनको अपने घर में रहने की मंजूरी भी दी और दोनों को पढ़ाई पूरी कर नौकरी करने के लिए प्रेरित भी कर रहे हैं. इसी को कहते हैं मेरा देश बदल रहा है… आगे बढ़ रहा है  खैर, समलैंगिक रिश्तों पर ऐसी बहुत सी कहानियां हम आजकल सुनते ही रहते हैं लेकिन समाज के नियम कायदों की परवाह किये बगैर इस बार यह हिम्मत किसी मेट्रो सिटी में रहने वाले लड़के या लड़कियों ने नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले के छोटे से गाँव राठ में रहने वाली दो लड़कियों ने दिखाई हैये कहानी आज हम आपको इसलिए सुना रहे हैं क्यूंकि ऐसे कितने ही किस्सों से हम अवगत हो, बेशक सुप्रीम कोर्ट ने भी समलेंगिक रिश्तों को कानूनन मंजूरी दे दी हो लेकिन हमारी सोच ने अभी भी इन रिश्तों को अपनाया नहीं है. जाहिर भी है जिस समाज में अलग जाति और धर्म में शादी करना आज तक पूरी तरह से ना अपनाया गया हो वहां एक ही जेंडर में शादी कि बात को पचाने में तो हमें शायद सदियाँ लग जाये लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि जब मियां बीवी राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी.. या यूँ कहें कि मियां मियां राज़ी या बीवी बीवी राज़ी तो क्या करेगा क़ाज़ी और अब जब संविधान और क़ानून भी प्यार पर से जात, धर्म और जेंडर के पहरे को हटा चुका है तो हमें भी अपनी सोच पर से ये पहरे हटा देने चाहिए और हर प्यार करने वाले का साथ देना चाहिए क्यूंकि प्रेम से बढ़कर ना तो कोई जात है, ना धर्म, ना समाज और ना हम खुद. हैं ना..??