रानी लक्ष्मीबाई के बारे में वामपंथियों का नया प्रोपगैंडा

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आज रानी लक्ष्मीबाई की जन्मतिथि है. रानी लक्ष्मी बाई, जो भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की नायिका है. अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई की पहली बिगुल 1857 में बजी थी. इतिहास में रानी लक्ष्मीबाई एक वीरांगना और देशभक्त है, आपके स्कूल के किताबों में रानी लक्ष्मीबाई एक वीरांगना और देशभक्त हैं. आपकी कहानियों में रानी लक्ष्मीबाई एक वीरांगना और देशभक्त है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि बौद्धिक आतंकवादियों की नज़र में वो क्या है? अगर नहीं जानते तो हम आपको बताते हैं, बौद्धिक आतंकवादियों की नज़र में रानी लक्ष्मीबाई एक असंतुष्ट बागी हैं. प्रोपगैंडा वेबसाईट द क्विंट पर रानी लक्ष्मी बाई के बारे में एक आर्टिकल पब्लिश हुआ है. जिसकी हेडलाइन है “झांसी की रानी लक्ष्मीबाई : बगावत की नायिका या असंतुष्ट बागी”

पंजाब में एक कवी थे अवतार सिंह संधू, जो “पाश” के नाम से मशहूर हुए. उन्होंने एक कविता लिखी थी जो कालांतर में काफी मशहूर हुई.
मेहनत की लूट सबसे खतरनाक नहीं होती
पुलिस की मार सबसे खतरनाक नहीं होती
गद्दारी और लोभ की मुट्ठी सबसे खतरनाक नहीं होती


सबसे खतरनाक होता है
मुर्दा शांति से भर जाना
तड़प का न होना सब सहन कर जाना
घर से निकलना काम पर
और काम से लौटकर घर जाना


सबसे खतरनाक होता है
हमारे सपनों का मर जाना

आज पाश नहीं है. वो खालिस्तानी आतंकवादियों का शिकार हो गए. लेकिन अगर आज पाश होते तो अपनी कविता में एक लाइन और जोड़ देते. सबसे खतरनाक होता है “विचारों का ब्रेनवाश कर देना”. विचारों का ब्रेनवॉश यानी कि आपके सोचने समझने की शक्ति को ख़त्म कर देना. एक ऐसी स्थिति पैदा कर देना कि सामने वाला जो कह रहा है आप उसकी बातों को सुनकर उसपर विचार करने लगते हैं. पहली बार नहीं करेंगे. दूसरी बार नहीं करेंगे. तीसरी बार नहीं करेंगे लेकिन जब बार बार एक ही बात आपके दिमाग में डाली जाएगी तो एक दिन आप उसपर यकीन कर लेंगे. ये विचारों का ब्रेनवॉश करने वाली गैंग कहलाती है इंटेलेक्चुअल टेरेरिस्ट यानी कि बौद्धिक आतंकवादी और ये कृत्य कहलाता है बौद्धिक आतंकवाद.

पिछली डेढ़ सदी से रानी लक्ष्मीबाई भारत के लिए बगावत की नायिका तो हैं इसमें कोई शक नहीं. लेकिन “असंतुष्ट बागी” वाला नया इतिहास द क्विंट ले कर आया है. आज ये आर्टिकल पहली बार पब्लिश नहीं किया गया. साल 2018 में इस आर्टिकल को पहली बार पब्लिश किया गया था और मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि इस आर्टिकल को क्विंट तब तक रीपब्लिश करता रहेगा जब तक कि लोगों का ब्रेनवॉश नहीं कर देता कि रानी लक्ष्मीबाई बगावत की नायिका नहीं बल्कि एक असंतुष्ट बागी थीं.

ये उसी प्रोपगैंडा का हिस्सा है जिसके जरिये ये साबित करने की कोशिश की जाती है कि मुगलों ने भारत लो लूटा नहीं बल्कि अमीर बनाया. ये उसी प्रोपगैंडा का हिस्सा है जिसके जरिये आपको ये इतिहास सिखाया जाता है कि युद्धिष्ठिर को अशोक से प्रेरणा मिलती थी. ये उसी प्रोपगैंडा का हिस्सा है जिसके जरिये मुग़ल आक्रान्ताओं को सेक्युलर साबित करने की कोशिश की जाती है. ये बौद्धिक आतंकवाद नहीं तो और क्या है. आपके मन से चाणक्य, चन्द्रगुप्त, रानी लक्ष्मीबाई जैसे नायकों के इतिहास को मिटाकर मुगलों का इतिहास बैठाया जा रहा है.

ये इंटेलेक्चुअल टेरेरिस्ट आपके मन में आपके नायकों के प्रति अविश्वास भरेंगे. उनकी छवि को धूमिल करने कि कोशिश करेंगे और मुग़ल, चे ग्वेरा, फिदेल कास्त्रो, मार्क्स के हिरोइज्म को थोपने की कोशिश करेंगे और तब तक करेंगे जब तक वो अपने प्रोपगैंडा में कामयाब नहीं हो जाते. और सबसे खास बात कि इस प्रोपगैंडा को स्थापित करने के लिए वो आपसे ही पैसे लेंगे 500, 2000, 5000. इसलिए सबसे खतरनाक है विचारों का ब्रेनवॉश हो जाना.