अभिजीत बनर्जी को नोबेल मिलने के बाद पागल हो गया वामपंथी गैंग

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भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी को इश्तर डूफलो और माइकल क्रेमरके साथ संयुक्त रूप से साल 2019 के लिए अर्थशास्त्र के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इश्तर डूफलो अभिजीत बनर्जी की पत्नी है. इन तीनों को दुनिया भर में ग़रीबी दूरे करने के लिए एक्सपेरिमेंट अप्रोच के लिए ये सम्मान दिया गया है. एक्सपेरिमेंट अप्रोच यानी कि इन तीनों ने जो अध्ययन और रिसर्च किया उससे गरीबी दूर करने की लड़ाई में बहुत मदद मिल रही है .. ऐसा नोबेल कमिटी ने कहा है. हालाँकि गरीबी पूरी तरह दूर नहीं हुई है दुनिया से. दुनिया भर में ग़रीबों की आबादी 70 करोड़ के आसपास मानी जा रही है.

नोबेल मिलने से पहले अभिजीत बनर्जी की पहचान राहुल गाँधी के प्रमुख रणनीतिकार के तौर पर थी. लोकसभा चुनावों के दौरान गरीबी ख़त्म करने के लिए राहुल जी की महत्वकांक्षी योजना “न्याय” के पीछे अभिजीत का ही दिमाग था. जिसके जरिये  सालाना 72 हज़ार रुपये दे कर गरीबी दूर करने का दावा किया जा रहा था. हालाँकि लोगों को ये योजना पसंद नहीं आई और देश की गरीबी दूर नहीं हो सकी.

न्याय योजना से देश के खजाने पर 3.6 लाख करोड़ का सालाना खर्च आता. चुनावों के दौरान अक्सर राहुल गाँधी से सवाल पूछा जाता रहा कि ये रकम आएगी कहाँ से. लेकिन राहुल गाँधी हमेशा चुप्पी साध जाते थे. अब इस योजना के मास्टरमाइंड अभिजीत बनर्जी को अर्थशास्त्र का नोबेल मिल गया है तो संभव है शायद अब ये जवाब मिल जाए कि न्याय योजना के लिए पैसे कहाँ से जुटाने का लक्ष्य रखा गया था.

एक भारतीय को जब दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित सम्मान मिलता है तो पुरे देश के लिए गर्व का विषय होता है. नोबेल मिलने की घोषणा के बाद से ही अभिजीत सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रहे हैं. जश्न भी मनाया जा रहा है लेकिन जश्न मनाने का तरीका बड़ा अजीब है. पूरे मामले से भारतीयता गायब है और इसे दक्षिणपंथ पर वामपंथ की जीत के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है. इसकी वजह ये है कि अभिजीत ने जेएनयू से पढाई की है. वही जेएनयू जो अक्सर देशविरोधी हरकतों की वजह से चर्चाओं में रहता है. लिहाजा अभिजीत को नोबेल मिलने के बाद एक तबके द्वारा जश्न एक भारतीय को नोबेल मिलने के तौर पर नहीं बल्कि एक जेएनयू वाले के नोबेल मिलने के तौर पर मनाया जा रहा है. अभिजित को मिले नोबेल को वामपंथी गिरोह ने हैक कर लिया और इसकी आड़ में उन्हें अपने विरोधियों को जलील करने का मौका मिल गया और सोशल मीडिया पर जमकर जहर उगलने लगे. आपको एक ट्वीट दिखाते हैं. “प्रिय ढोकला खाने वालों, हमने तुम्हे 6 नोबेल दिए, 1 ऑस्कर लाइफ टाइम दिया, राष्ट्रगान दिया, वन्दे मातरम दिया. हम मांस मछली, पोर्क और बीफ खाते हैं. तुम अपना खंडवा, ढोकला, खांडवी, थेपला अपने पास रखो और यहाँ से दफा हो जाओ.”

इस ट्वीट में नोबेल, ऑस्कर, बीफ, पोर्क के साथ साथ ढेर सारा ज़हर भी है जो एक एक शब्द से टपक रहा है. शायद मोहतरमा को ये नहीं पता कि ढोकला, थेपला, खांडवी खाने वाले को ही देश राष्ट्रपिता कहता है, अगर मोहतरमा बीफ, पोर्क, चिकन, मटन खाने से समय निकाल कर थोडा पढ़ लेती तो पता चलता कि ढोकला, थेपला, खांडवी खाने वाले सरदार पटेल ने ही देश को एक बनाया था.

इन वामपंथियों को अपने जेएनयू के अलावा सबसे नफरत है और सबसे ज्यादा नफरत इन्हें गुजरात से है क्योंकि दो गुजरातियों ने इन दोगले वामपंथियों की दुकाने बंद कर दी है. दो गुजरातियों ने इन वामपंथियों को जेएनयू और शौचालय तक समेट कर रख दिया है. इन वामपंथियों को ये नहीं पता कि देश की इकॉनमी ऑस्कर, नोबेल से नहीं चलती बल्कि देश की इकॉनमी को ढोकला, थेपला, खांडवी खाने वाले गुजराती बिजनेसमैन चलाते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि मोहतरमा ढोकला, थेपला, खांडवी खाने वाले एक बिजनेसमैन के जियो नेटवर्क से ट्विटर चला कर ज़हर उगल रही हों. इन बीफ, पोर्क, मटन और चिकन खाने वालों ने बंगाल पर 30 सालों तक राज किया और उसका क्या हाल किया ये सब जानते हैं.

लम्बे अरसे से निराशा और कुंठा के गर्त में डूबे वामपंथियों को ख़ुशी मनाने का एक मौका मिला है अभिजीय बनर्जी के रूप में तो सुकून से खुशियाँ मन ले. क्या पता ढोकला, खांडवी, थेपला खाने वाले दो गुजराती अगला कौन सा कदम उठा लें और तुम्हारी खुशियाँ फिर मातम में बदल जाए.