कुंभ में पहली बार एंट्री ‘किन्नर अखाड़े’ की , मेले में मिली हैं VIP सुविधाएं

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क्योंकि मैं एक किन्नर जो हूँ ।
बेटा कुल का दीपक है
तो बेटी है अनमोल ।
यदि जन्म लूं मैँ भूलकर तो
घर मे पसर जाता है मातम
क्योंकि मैं एक किन्नर जो हूँ ।

हमारे समाज का ताना-बाना मर्द और औरत से मिलकर बना है. लेकिन एक तीसरा जेंडर भी हमारे समाज का हिस्सा है. इसकी पहचान कुछ ऐसी है जिसे सभ्य समाज में अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता. समाज के इस वर्ग को थर्ड जेंडर, किन्नर या हिजड़े के नाम से जाना जाता है. इस बार किन्नर के हक में एक और चीज़ जुड़ चूका है जैसा की सभी जानते है प्रयागराज में 15 जनवरी से कुंभ मेले की भव्य शुरुआत हो गई है। 4 मार्च तक चलने वाले कुंभ मेले के आय़ोजन की कई बातें ऐसी हैं जो काफी मायने में खास है।

इस कुंभ में लाखों करोड़ों की संख्या में साधु-संत जुटे हैं। जिनमें मान्यता प्राप्त 13 अखाड़े शामिल होत हैं . कुंभ के इतिहास में पहली बार मकर संक्रांति पर्व पर उपासक किन्नर अखाड़े ने शाही स्नान किया था .किन्नरों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी की अगुवाई में अप्रैल 2016 के कुंभ के दौरान पहली बार किन्नर अखाड़ा सामने आया था . इस कुंभ की खासियत ये है कि हर बार की तरह इसबार यहां 13 नहीं बल्कि 14 अखाड़े शामिल है । इनमें से 7 शैव, 3 वैष्णव व 3 उदासीन (सिक्ख) अखाड़े है ।

इन सभी अखाड़ों की अपनी-अपनी विशेषता और महत्ता होती है। इनके कानून अलग होते हैं इनकी दिनचर्या और इनके इष्टदेव भी अलग अलग होते हैं। ऐसा मानना है कि कुंभ में उसी अखाड़े का आधिपत्य होता है, जिनके पास नागाओं की संख्या ज्यादा होती है. क्योंकि कुंभ की जान और शान नागा साधु ही हैं. उनकी एंट्री के बाद ही कुंभ में रौनक आती है. लेकिन प्रयागराज कुंभ में इस बार एक नया अध्याय जुड़ गया है.पहली बार “किन्नरों” ने अखाड़े के तौर पर, दूसरे अखाड़ों की तरह शाही पेशवाई के रूप में कुंभ में एंट्री की जो काफी भव्य था .लेकिन प्रयागराज कुंभ में किन्नर अखाड़े की एंट्री इतनी आसान नहीं थी.

इसके लिए किन्नर अखाड़े ने एक लंबी लड़ाई लड़ी है. किन्नर अखाड़े को प्रयागराज के कुंभ में एंट्री देने को लेकर काफी विवाद हुआ था. अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने किन्नर अखाड़े के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था. दरअसल कुंभ शुरू होने से पहले ही अखाड़ा परिषद और किन्नर अखाड़ा आमने-सामने आ गए थे. हालांकि किन्नर अखाड़े ने हार नहीं मानी. लैंगिकता के आधार पर उसने मेला प्रशासन से हक मांगा. जिसे उन्हें देना पड़ा.
भले ही अखाड़ा परिषद किन्नर अखाड़े के खिलाफ हो लेकिन मेला प्रशासन की ओर से किन्नर अखाड़े को वीआईपी सुविधाएं दी गई हैं.
शिविर के लिए25 बीघा जमीन,
200 स्विस कॉटेज,
200 फैमिली काटेज टेंट,,
250 अपर फ्लाई टेंट,
सुरक्षा के लिए दो कंपनी पीएसी,
प्रवचन के लिए मैटिंग के साथ 500×500 पाइप टिन, 500 वीवीआईपी कुर्सी, 200 सोफा, 250 तख्त, 500 ट्यूबलाइट, 500 शौचालय की सुविधा उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया था. बताया जा रहा है कि इनमें से अधिकांश मांगें पूरी हो चुकी हैं.

किन्नर अखाड़े की आचार्य महामंडलेश्वर लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी कहती हैं-
कुंभ में एंट्री के लिए हम लोगों ने बड़ी लम्बी लड़ाई लड़ी है. काफी मेहनत और मशक्कत के बाद मंजिल मिली है. ये इतिहास है प्रयागराज में. उज्जैन में हमारा अखाड़ा स्थापित हुआ था. प्रयाग में इसका वजूद बरकरार है. ये कुंभ सच में दिव्य कुंभ है. ये कुंभ भव्य कुंभ है. और ये कुंभ दर्शाता है मेरे भारत की विविधता और सनातन धर्म का विस्तार है कि वो हर एक जाति और हर एक लैंगिकता को अपने अंदर समाता है.

धर्म के ज़रिए किन्नरों को मुख्यधारा से जोड़ने की बात कही जा रही है. पर क्या मुख्यधारा से जोड़ने की ये कोशिश कामयाब हो रही है?उम्मीद है थर्ड जेंडर के हक़ में आवाज़ उठाते रहने वालो के लिए ये कुम्भ एक मिशाल बनेगा