जानिए IBC कानून के बारे में जिसने सुधारी भारत की अर्थव्यवस्था

494

निक्की (Nikkei) जापानी भाषा का एक शब्द है और इसका अर्थ है “जापानी मूल”. जापान कि एक बहुत बड़ी मीडिया क्षेत्र कि कंपनी है निक्की इंक. कारोबार के मामले में इसकी सबसे famous magazine है निक्की एशिया रिव्यु. यह मागज़ीन 140 साल से छप रही है. इस magazine का डिजिटल subscription इतना महंगा है कि सिर्फ बड़ी-बड़ी कम्पनियां, सरकार या हाई क्लास के लोग ही इसे पढ़ पाते हैं. इसी बात से इसकी क्वालिटी का अंदाज़ा भी लगाया जा सकता है.

इस हफ्ते भारत के ऊपर इस magazine में कई आर्टिकल लिखे गये. Magazine ने रिलायंस जिओ के सस्ते मोबाइल डेटा से भारत में आ रहे बदलाव पर कवर स्टोरी की है. इस magazine में एक आर्टिकल डिफ़ॉल्ट को लेकर भी लिखा गया है जिसका शीर्षक है India is no longer a defaulters’ paradise  मतलब भारत अब दोषियों को संरक्षण देने का देश नहीं रह गया है .

आर्थिक मोर्चे पर इस सरकार की सबसे शानदार उपलब्धि है IBC (Insolvency and bankruptcy code). यह कानून 2016 में बना. इसके एक साल पहले एक और अहम काम हुआ. रिज़र्व बैंक ने 2015 में डिफ़ॉल्ट के प्रावधानों में बदलाव किया. डिफ़ॉल्ट का मतलब होता है कर्ज की किश्त नहीं चुकाना.

एक और शब्द है NPA (Non performing asset). आसान शब्दों में NPA ऐसे कर्ज को कहा जाता है जो डूब गया होता है. पहले प्रावधान था कि डिफ़ॉल्ट होने के तीन महीने बाद संबंधित कर्ज NPA श्रेणी में जाता था. 2015 से इसे बदल दिया गया और डिफ़ॉल्ट के अगले ही दिन संबंधित कर्ज को NPA श्रेणी में डालने का प्रावधान तय हुआ.

रिज़र्व बैंक का यह काम भारत को ‘डिफाल्टर का स्वर्ग’ की मिली उपाधि से बचाने की दिशा में पहला कदम था. इसके बाद सरकार को बढ़ना था और सरकार ने IBC के जरिये बखूबी यह काम किया. निक्की के एडिटर ने इससे पहले की व्यवस्था के संबंध में कहा कि पहले भारत में ऐसा कानून ही नहीं था कि बैंकों का पैसा पचा ले गयी कंपनी या उद्योगपति से जबरदस्ती वसूल किया जा सके. एक और मजेदार सिस्टम था जिसे प्रधानमंत्री कई बार हलके अंदाज में “फोन बैंकिंग” नाम दे चुके हैं.

उदाहरण से समझिये. किसी बैंक ने एक उद्योगपति को कर्ज दिया. उद्योगपति ने कर्ज की किश्त चुकाना बंद कर दिया. इस स्थिति में बैंक तीन महीने बाद इस कर्ज को NPA में classify करते थे. साथ ही सभी बैंक अपने अकाउंट को चमकदार दिखाने के लिए सही NPA को दिखाते ही नहीं थे क्योंकि कर्ज को NPA घोषित करने कि प्रणाली बहुत अस्पष्ट थी.

इस कोशिश में बैंक उसी उद्योगपति को नया कर्ज दे देता था. पुराने कर्ज की किश्त चुकाने के लिए नया कर्ज. अब यदि उद्योगपति का सत्ता में बैठे किसी नेता से संबंध है तो एक कर्ज की किश्त चुकाने के लिए दूसरा कर्ज और दूसरे कर्ज की किश्त चुकाने के लिए तीसरा कर्ज. कुछ मामलों में एक कर्ज के बाद दूसरा और तीसरा कर्ज देते हुए जब बैंक का पैसा काफी अधिक हो जाता था तो बैंक के कर्ज को शेयर में बदल दिया जाता था. शेयर का भाव घटता बढ़ता रहता है और इसके साथ इसकी वैल्यू भी घटती बढ़ती रहती है. इसका फायदा कंपनी का मालिक उठता था. कंपनी के मालिक ने कोई तिकड़म अपना कर शेयरों का भाव गिरा दिया और सस्ते दाम पर वापस बैंक से खरीद लिया. पुराने नियम के मुताबिक कुछ भी इसमें गलत नहीं हुआ लेकिन बैंक का पैसा डूब गया.

मतलब अगर आपने बैंक से 10 लाख का कर्जा लिया है और आप बैंक को अपनी 10 लाख कि कार को 2 लाख बेच के वापस बैंक से वही कार 2 लाख में खरीद लेते हैं. तो इस तरीके से आपको आठ लाख का फिर भी फायदा मिलेगा, कार भी आपकी आपके पास आ जाएगी और बैंक से आपकी टेंशन भी ख़तम हो जाएगी. विजय माल्या का मामला हो या नीरव मोदी का हर जगह ऐसा ही हुआ.

2015 के बाद ऐसे मामले पकड़ में आने लगे. यही समय था जब बैंकों के NPA कि प्रणाली को सुधारा गया और इसके बाद बैंकों का NPA बढ़ता ही चला गया. ये कदम ज़रूरी इसलिए था क्योंकि किसी को नहीं पता था कि हमारी इकॉनमी में कितना NPA है. NPA के आधार पर ही बैंक लोन देता है. इसका मतलब पहले इकॉनमी “बस किसी तरह से चल रही थी” और देश को कभी भी इसका नुकसान उठाना पड़ सकता था. सोचिये आपको कहीं पहुंचना है और आपको बताया जा रहा हो कि गाड़ी में ईंधन पूरा है लेकिन अगर ईंधन हो ही ना तो?

IBC के तहत आया NCLT (National company law tribunal). अब डिफ़ॉल्ट करने वाली कंपनियों के खिलाफ बैंक NCLT के जरिये पैसा वसूल कर पाने में सक्षम हो गये है. अब बैंक डिफ़ॉल्ट छिपा नहीं सकते और डिफ़ॉल्ट पब्लिक हो जाने के बाद बैंक को NCLT में जाना ही होगा. साफ़ मतलब कि बैंक, उद्योगपति और नेताजी का गहरा कनेक्शन अब खत्म हो गया है. इस कानून कि सराहना खुद रघुराम राजन ने 2018 में संसद कि एक कमेटी के आगे भी की थी.

अब कुछ आकड़ों को देखते हैं. दुनिया भर में अच्छे देशों में NPA वसूली का औसत 72 प्रतिशत है. भारत में IBC से पहले यह औसत महज 20 प्रतिशत था. IBC के दो-ढाई साल में यह औसत बढ़कर अब 48 प्रतिशत हो गया है. आगे इस औसत में और वृद्धि होगी. पिछले साल दिसंबर तक IBC के तहत NCLT में 1,484 कंपनियों के मामले पहुंचे. जिसमें कई मामलों में पैसे कि वसूली भी हो गयी. निपट चुकी कंपनियों में भूषण पावर, भूषण स्टील, मोन्नेट इस्पात जैसी बड़ी कंपनियां शामिल हैं. Essar का पैसा भी लगभग वसूल होने वाला है.

 पिछले साल नवम्बर तक IBC से करीब “तीन लाख करोड़ रुपये” वसूल किए जा चुके थे. भारत में जो पूरा NPA है उसमें से 86 प्रतिशत सिर्फ सरकारी बैंकों का है. अब यदि ये पैसे वापस आ रहे हैं तो निश्चित ही फायदा भी सरकारी बैंकों को ही हो रहा है. इन बैंकों में पैसा आम लोगों का लगा हुआ है तो जो पैसे NPA हुए वे भी आम लोगों के ही थे. सरकार बैंकों की स्थिति सही करने के लिए अलग से इन बैंकों में जो पैसे झोंका करती है वे पैसे भी आम लोगों के ही होते हैं.

IBC कानून के बारे में आपने शायद कम सुना होगा क्योंकि सीधे तौर पर ये आपको प्रभावित नहीं करता है. लेकिन भारत कि अर्थव्यवस्था कि बात की जाये तो ये कानून भी GST जितना अहम है. इससे बैंकों के पैसे नहीं फंसेंगे और ये पैसे भारत कि अर्थव्यवस्था में काम आयेंगे और कर्ज में डूबी हुई कंपनियों को भी छुटकारा मिलेगा.

विडियो