काशी विश्वनाथ कॉरिडोर पर इतना हंगामा क्यों?

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बनारस में रहने वाला मुस्लिम समुदाय आजकल बहुत परेशान है. उनकी परेशानी की वज़ह है एक आशंका.

भारत एक आशंका प्रधान देश है. यहाँ आशंका को आधार मानकर बहुत कुछ कर दिया जाता है. देश में रहने वाले हर तबके के लोग अपनी किसी ना किसी आशंका को लेकर परेशान रहते हैं. और इसी आशंका के चलते वो बहुत से काम जिनसे हमारा और हमारे देश का विकास हो सकता है अटके रह जाते हैं.

लेकिन इन्ही विकास को अटका देने वाली आशंकाओं के बीच साल 2014 के बाद से देश का एक शहर बिना रुके बदलाव की राह पर चल रहा है. ये शहर है महादेव और माँ गंगा का  की नगरी कहा जाने वाला बनारस. धीरे-धीरे इस शहर का नवीनीकरण किया जा रहा है.

बदलाव और विकास की तरफ बढ़ रही इस नगरी के मुस्लिम तबके में भी अब आशंकाएं पनपने लगी हैं. इन आशंकाओं की वज़ह बन रहा है काशी विश्वनाथ कॉरिडोर. इस कॉरिडोर का लक्ष्य है माँ गंगा के ललिता घाट से बाबा काशी विश्वनाथ के मंदिर तक के रास्ते को चौड़ा और सुंदर बनाना.

अपनी पतली गलियों के लिए मशहूर इस इलाके में किसी एक रास्ते का चौड़ा होना सुनने में बड़ा ही अच्छा लगता है, लेकिन असलियत ये है कि ऐसा करने के लिए रास्ते के किनारे बसे ना जाने कितने ही पुराने घरों को गिराना होगा.

सरकार की तरफ से 5 लाख स्क्वायर किलोमीटर की जगह को खाली किया जायेगा. इतनी जगह को खाली करने के लिए करीब 300 घरों को रास्ते से हटाया जाएगा. ये करना बिलकुल आसान नहीं है, क्योंकि ऐसा करने के लिए सरकार को ये घर खरीदने होंगे. इन घरों में रहने वालों को मोटा मुआवजा देना होगा.

इन 300 घरों में से करीब 200 को सरकार ने खरीद भी लिया और मुआवजा भी दे दिया. कुछ रिपोर्ट्स की मानें तो वो लोग जिनको सरकार की तरफ से मोटा मुआवजा मिला वो काफी खुश दिखाई दिए, क्योंकि ये कीमत उनके पुराने घरों की असल कीमत से काफी ज़्यादा है.

लेकिन बनारस से आई कुछ रिपोर्ट्स ने ये भी बताया कि क्षेत्र का मुस्लिम समुदाय सरकार के इस फैसले से खुश नहीं है. उन्हें ना सड़क के चौड़े की खुशी है और ना ही विकास की. क्योंकि सरकार के द्वारा खरीदे गए ये घर जब गिराए गए तो नज़ारा सपाट मैदान सा हो गया, और इस मैदान के पार बाबा काशी विश्वनाथ के मंदिर से सटी नज़र आई ज्ञानवापी मस्जिद.

काशी विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के आसपास का इलाका लगभग सपाट सा हो गया है. मस्जिद के सामने दिखाई देने लगा है एक सपाट मैदान और इस जगह पर एक पार्क बनाया जाना है, और लोगों को लगता है कि यही मैदान मुस्लिम समुदाय की नाराजगी की वज़ह है.

उनको लगता है कि ये मैदान ज्ञानवापी मस्जिद के लिए खतरे का संकेत है. उनको आशंका है कि ये मैदान इसलिए बनाया गया है ताकि यहाँ बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हो सकें. कुछ मीडिया रिपोर्टस ने बाताया कि मुस्लिम समुदाय के दिल में ये बात घर कर गई है कि बाबरी मस्जिद की तरह ही ज्ञानवापी मस्जिद असुरक्षित हो गई है.

एक चबूतरा हुआ करता था छोटा सा मस्जिद के पास. आस-पास के इलाके को खाली करने की शुरुआत हुई तो साल 2018 में इस चबूतरे को हटा दिया गया. सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड की ज़मीन पर मौजूद ये चबूतरा मस्जिद का हिस्सा नहीं था, लेकिन फिर भी इसने माहौल को गर्म कर दिया.

एक बड़ी संख्या में समुदाय के लोग यहाँ इकट्ठा होने लगे. सरकार के काशी विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट का विरोध होने लगा, और फिर इस माहौल की संजीदगी को देखकर जिला प्रसाशन को दोबारा ये चबूतरा बनवाना पड़ गया.

बहुत से मुस्लिम कहते थे कि मस्जिद के आस-पास बनी ये इमारतें मस्जिद की सुरक्षा किया करती थीं, लेकिन अब जब इमारतें ही नहीं रहीं तो ये सुरक्षा कैसे होगी?

लेकिन इन सभी शंकाओं के जवाब में काशी विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी और प्रोजेक्ट के सीईओ विशाल सिंह ने चर्चित मीडिया संस्थान बीबीसी को बताया कि,

“ज्ञानवापी मस्जिद पूरी तरह सुरक्षित है. वो तीस फ़ीट ऊँचे और ढाई इंच मोटे बार से घेरा गया है, वहाँ चौबीसों घंटे तीन परतों की सुरक्षा है और वहाँ हथियारबंद केंद्रीय सुरक्षा बल तैनात हैं. उस इमारत के बीच से एक भी ईंट न हिलाई गई, न ऐसी योजना है. बल्कि उस स्थान को साफ़ करने से उसकी ख़ूबसूरती और बढ़ रही है.”

ये और इस तरह तमाम जवाबों, तमाम सहूलियतों, तमाम समझौतों के बाद भी काशी का अल्पसंख्यक समुदाय खुश नज़र नहीं आ रहा. इनकी आँखों में काशी के विकास को लेकर कोई चमक नज़र नहीं आ रही, बल्कि इन आँखों में जो कुछ नज़र आ रहा है वो है साल 1992 में अयोध्या में घटी घटना की आशंका.

वही आशंका जो हमें खुशी की बात पर भी दुःख में डुबाकर छोड़ जाती है. वही आशंका जो किसी भी खुशी को जीने ही नहीं देती. यही तो है वो आशंका जिसके चलते हमने शुरुआत में ही कहा था कि,

“भारत एक आशंका प्रधान देश है.”

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