कभी कश्मीरी पंडित खौफ में थे, आज मुफ़्ती, अब्दुल्ला और गिलानी खौफ में हैं

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बीते एक हफ्ते से कश्मीर सहमा हुआ है . जो कश्मीर सर्दियों में बर्फ की आलोग में लिपटा होता है वो कश्मीर मानसून में 40 हज़ार सैनिकों की बूटों की थाप से थरथराया हुआ है . अमरनाथ यात्रा बीच में रुकवाकर तीर्थ यात्रियों को वापस भेज दिया गया, पर्यटकों को घाटी छोड़ने का फरमान सुना दिया गया , हॉस्टलों में रहने वाले गैर कश्मीरी छात्रों को घर जाने का आदेश दिया गया .किसी को समझ नहीं आ रहा क्या होने वाला है लेकिन ये सबको अहसास है कि कुछ बड़ा होने वाला है .

मुफ्तियों और अब्दुल्लाओं ने जिस कश्मीर को तंदूर बना कर उसपर अपनी सियासत की रोटियां सेंकी उनकी आँखों से नींद गायब है. अपनी औलादों को विदेशों में बसा कर कश्मीरी बच्चों की हाथों में पत्थर पकडाने वाले मीर वाइज और सैयद गिलानी के चेहरे पर खौफ है . वही खौफ जो 90 के दशक में कश्मीरी पंडितों के चेहरे पर हुआ करता था .क्या होने वाला किसी को नहीं पता लेकिन कुछ बड़ा होने वाला है इसकी चर्चा सबके जुबान पर है .

आइये आपको एक ट्वीट दिखाते हैं  – इस ट्वीट को इस ग्रह पर रहने वाले सभी मुसलमानों के लिए एक एसओएस (सेव आवर सोल्स) संदेश के रूप में लिया जाना चाहिए. यदि हम सब मर जाते हैं और आप काफी हद तक अल्लाह के लिए जवाबदेह रहेंगे. भारतीय मानव जाति के इतिहास में सबसे बड़ा नरसंहार शुरू करने वाले हैं। अल्लाह हमारी रक्षा करे.

ये ट्वीट किया है कश्मीर के अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गिलानी ने . इस ट्वीट में गिलानी के खौफ को महसूस कीजिये . कभी इन्ही गिलानी की वजह से इसी तरह के खौफ के दौर से गुजरे से कश्मीरी पंडित . क्या हुआ था उस दौर में कश्मीर में . कौन था इन सबके पीछे? आइये नज़र डालते हैं उस दौर पर . जिस कश्मीर की वादियों में कश्मीर की कली और जंगली जैसी कालजयी बॉलीवुड की शूटिंग हुआ करती थी, उन वादियों में 90 के दशक की शुरुआत होते होते बंदूकें गरजने लगी थी.

साल था 1987, उस दौरान राज्य में विधानसभा चुनाव हुए थे . फारुख अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस और कांग्रेस ने आपस में गठबंधन किया और चुनाव में जीत दर्ज की . उस चुनाव में लगाववादियों के मोर्चे मुस्लिम यूनाइटेड फ्रंट ने भी हिस्सा लिया था. इस ग्रुप को पाकिस्तान का समर्थन हासिल था. लेकिन चुनाव की हार को पचा नहीं पाया और चुनाव में धांधली का आरोप लगते हुए घाटी में विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया . इसी दौरान मौके का फायदा उठा कर पाकिस्तान की ख़ुफ़िया एजेंसी ISI ने हथियारबंद युवाओं को घाटी में घुसाना शुरू कर दिया. उसके बाद घाटी में हिंसक प्रदर्शन शुरू हो गए और कश्मीर घाटी में आतंकवाद और अलगाववाद का दौर शुरू हुआ.

कश्मीर को अस्थिर करने की स्क्रिप्ट तो बहुत पहले से ही लिखी जा रही थी लेकिन अब वक़्त था उस स्क्रिप्ट पर अमल करने का . देश में 1989 के लोकसभा चुनावों में राजीव गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी चुनाव हार गई और 2 दिसंबर 1989 को वीपी सिंह देश के नए प्रधानमंत्री बनें. कश्मीर अशांत होना शुरू हो चूका था. कश्मीरियों का दिल जीतने के लिए पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के नेता मुफ़्ती मोहम्मद सईद को वीपी सिंह की सरकार में गृहमंत्री बनाया गया  . 6 दिन बाद ही जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के आतंकियों ने मुफ़्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद का अपहरण कर लिया . केंद्र सरकार ने रिहाई की कोशिशें शुरू की . इंद्र कुमार गुजारल और आरिफ मोहम्मद खान को श्रीनगर पहुंचे . 122 घंटों बाद रुबिया की रिहाई संभव हुई लेकिन बदले में केंद्र सर्कार ने 5 आतंकवादी छोड़े . रुबिया आतंकवादियों के चंगुल से रिहा होकर दिल्ली पहुंची . एयरपोर्ट पर बेटी को लेने के लिए मुफ़्ती मोहम्मद सईद पहुंचे थे . उनसे पूछा गया – अगर होम मिनिस्टर की बेटी की जगह कोई और लड़की होती तो भी क्या सरकार इसी तरह से बर्ताव करत? सईद ने कहा मैं नहीं जानता, क्योंकि मैं भी इंसान हूं, लड़की तो लड़की ही होती है.

इधर रुबिया रिहा होकर दिल्ली पहुंची और उधर श्रीनगर की सड़कों पर जश्न मनाने के लिए हजारों लोग इकट्ठे हो गए …. लेकिन कश्मीरियों का जश्न रुबिया की रिहाई के लिए नहीं था बल्कि 5 आतंकियों की रिहाई के लिए था … घाटी आज़ादी के नारों से गूँज उठी ठंडी वादी हिंसा की आग में जलने लगी …

कश्मीरी युवा बॉर्डर पार से हथियार चलाने की ट्रेनिंग ले कर घाटी में लौटने लगे. जुम्मे की नमाज के दौरान पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते और आज़ादी के नारे लगते . कश्मीर के मस्जिदों से युवाओं को जिहाद और कश्मीर की आज़ादी के लिए उकसाया जाता . गैर मुस्लिमों पर हमले शुरू हो गए . मस्जिदों के लाउडस्पीकर से  आवाजें गूंजती – आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो या वादी छोड़कर भागो’. 4 जनवरी 1990 को उर्दू अखबार आफताब में हिज्बुल मुजाहिदीन ने छपवाया कि सारे पंडित कश्मीर की घाटी छोड़ दें. अखबार अल-सफा ने इसी चीज को दोबारा छापा.

फिर आई तारीख 19 जनवरी 1990 की रात हज़ारों कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर चले गए. अगले कुछ महीनों में सैकड़ों निर्दोष कश्मीरी पंडितों को प्रताड़ित करके मौत के घाट उतार दिया गया और कई महिलाओं के साथ बलात्कार किय गया . करीब 4 लाख तक कश्मीरी पंडितों को घाटी छोड़कर भागना पड़ा। इनमें से ज्यादातर ने जम्मू और कुछ अन्य जगहों पर शरण ली.

गिलानी के ट्वीट में जिस खौफ का जिक्र है . ये वही खौफ है जो कभी कश्मीरी पंडितों की आँखों में थे . उस वक़्त कश्मीरी पंडितों के लिए किसी ने आवाज नहीं उठाई . न मुफ्तियों ने, न अब्दुल्लाओं ने, न किसी गांधी ने …कोई आवाज उठाता भी क्यों, सबको इस देश में सेक्युलर कहलाना था . लाखों कश्मीरी पंडित अपने ही देश में शरणार्थी बन गए लेकिन देश की गंगा जमुनी तहजीब की रक्षा के लिए सबने अपने होठ सिल लिए . आज जब उसी कश्मीर में सब ठीक होने की उम्मीद जग रही है तो . तब चुप्पी ओढने वालों के जुबान खुलने सुरु हो गए हैं. जिन्हें कश्मीरी पंडितों के साथ जुल्मों पर दर्द नहीं हुआ वो आज सिर्फ 35A के हटने के जिक्र भर से दर्द से तड़प रहे हैं.