कार सेवकों पर गोलियाँ चलवाने से पहले Phone पर किससे बात कर रहे थे Mulayam Singh Yadav ?

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30 अक्टूबर 1990, दिन मंगलवार… लाखों की संख्या में कारसेवक अयोध्या की तरफ बढ़ रहे थे…उस वक़्त देश के प्रधानमंत्री थे वीपी सिंह… और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे मुलायम सिंह यादव… राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था… 1987 में ताला खुल चुका था… तत्कालीन राजीव गांधी सरकार पर मंदिर बनाने को लेकर काफी दबाव था…  जाते जाते उन्होंने मन्दिर का शिलान्यास करा दिया था… विश्व हिंदू परिषद के बुलावे पर… लाखो की संख्या में 30 अक्टूबर को रामभक्त इक्कट्ठे हो रहे थे… उस वक़्त मुलायम के सबसे खास सहयोगी रहे बेनी प्रसाद वर्मा नें मुख्यमंत्री मुलायम सिंह को एक कॉल किया… और बोले साहब कारसेवक अयोध्या की तरफ बढ़ रहे है… उन्हें रोकिए नही तो अनर्थ हो जाएगा… मुलायम नें फोन पे कहा… कोई बात नही कारसेवकों को अयोध्या में घुसने दीजिये माहौल में गर्मी तो तभी आएगी… मुलायम सिंह माहौल में गर्मी आने का इंतज़ार करते रहे … कारसेवकों का हुजूम अयोध्या में इक्कठा हो गया… और जब उनका कारवां रामजन्मभूमि की ओर बढ़ने लगा तभी वो हुआ जिसकी कल्पना कभी किसी ने सपने में भी नही की होगी…. सिवाय मुलायम  सिंह यादव के… कारसेवकों को जन्मभूमि परिसर पे जाने से रोकने के लिए उनपर गोलियाँ चलाने का आदेश दे दिया गया…  निहत्थे कारसेवको पर अंधाधुंध फायरिंग शुरू हो गयी देखते ही देखते कई कारसेवक वहीं ढेर हो गए …. जो मरे वो तो मरे ही सैकड़ो की संख्या में गम्भीर रूप से घायल भी हो गए… कुछ जीवन भर के लिए अपाहिज हो गए… कितनो के बच्चे अनाथ हो गए… कितनो का हंसता खेलता घर एक झटके में उजड़ गया… माहौल की गर्मी अब शांत थी… कारसेवकों नें प्रशासन से ऐसी करवाई की उम्मीद नही की थी… आंदोलन भंग हो गया… मुलायम सिंह यादव अब मुलसमानों के नए मसीहा थे… उनका वो बयान “अयोध्या में परिंदा भी पर नही मार सकता” अगले दिन तक अखबारों की सुर्खियां बन चुका था… केंद्र में चल रही वीपी सिंह की सरकार में उस वक़्त बीजेपी भी हिस्सेदार थी…. दवाब बना और मुलायम को अपने इस कारनामे के लिए इस्तीफा देना पड़ा… दुबारा यूपी में चुनाव हुए…  पहली बार बीजेपी की सरकार बनी और मुख्यमंत्री बने कल्याण सिंह… और उसके बाद की कहानी आप सबको पता है… आजतक रामन्दिर का मुद्दा वहीं का वहीं है … आज भी श्रीराम तिरपाल में है… कितनी सरकारें आईं गयी लेकिन सवाल आज भी वहीं है… राजनीतिक लड़ाइयों की भेंट चढ़े उन बेकसूर कार सेवको की गलती क्या थी… आखिर उनके ज़िन्दगी  की कीमत सिर्फ इतनी थी कि उन्हें अपने आराध्य में आस्था रखने की वजह से गोलियों से उड़ा दिया जाए… और एक भावनात्मक मुद्दे को एक राजनीतिक मुद्दा बना के छोड़ दिया जाए…. सवाल आपके बीच में छोड़ता हूँ… जवाब खुद से ढूंढियेगा…. कि आखिर उन कारसेवकों की गलती क्या थी साहब…क्या जो कुछ हुआ उसे रोका नही जा सकता था… और अगर रोका जा सकता था… तो रोका क्यों नही गया… क्या सत्ता का खेल इतना खूनी होना चाहिए…कि  कुछ इंसानों की ज़िंदगी एक सत्तासीन मुख्यमंत्री के महज एक आदेश की मोहताज हो… 

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https://youtu.be/NSbfLaHiBp4