भूखे-प्यासे बच्चे घंटों जाम में फंसे रहे लेकिन सड़क के बीच से नहीं हटे ये लोग

रमजान का पाक महीना है और देश का एक अल्पसंख्यक समुदाय सरकार से अपनी बात मनवाने के लिए गर्मियों की भरी दोपहर में सड़क जाम कर देता है. स्कूल से वापस लौट रहे छोटे-छोटे बच्चे सर पर चढ़े हुए सूरज के नीचे कानपुर जैसे व्यस्त शहर की सड़कों पर जाम के बीच फंसे हुए हैं. भट्ठी सी तपती बसों के अन्दर उनके शरीर गर्मी से उबल रहे हैं और पूरी तरह से पसीज चुके हैं.

Source-Amar Ujala

थोड़ी ही दूर पर एक एम्बुलेंस फंसी हुई है. एम्बुलेंस के अन्दर लेटा मरीज भी दर्द से तड़प रहा है और उसके दर्द को देखकर उसके परिवार वाले भी. मरीज कराह रहा है और उसके परिवार वाले जाम खुलवाने के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं. वो लाचार खड़ी पुलिस पर भड़क रहे हैं, चीख रहे हैं,

“चूड़ियाँ पहनी हैं क्या, मरीज़ मर जाएगा तब जाम खुलवाओगे?”

पुलिस अब भी लाचार खड़ी है. वज़ह ये है कि जब वो जाम खुलवाने जाती है तो ये भड़का हुआ अल्पसंख्यक समुदाय हिंसक हो उठता है और पथराव करने लगता है. जाम को लगे हुए घंटों बीत चुके हैं. भड़के हुए अल्पसंख्यक समुदाय ने सड़क के बीचोबीच टेंट लगवा लिया है और टेंट के अन्दर नमाज़ अदा करनी शुरू कर दी है. पुलिस ने एक बार फिर रोकने की कोशिश की तो फिर से पथराव कर दिया है.

पुलिस फिर से शांत हो गई है क्योंकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, और भारत असल मायनों में लोकतंत्र की परिभाषा पर खरा भी उतरता है. एक लोकतंत्र की परिभाषा आखिर है भी क्या? वो तंत्र जो सबका अपना हो. वो तंत्र जो सभी को अपनी मर्जी से बोलने की आज़ादी दे. अपनी मर्जी का पहनने की आज़ादी दे. अपनी मर्जी से खाने की आज़ादी दे. और आज़ादी दे बिना किसी रोक-टोक अपने-अपने धर्म को मानने की.

लेकिन जिस तरह लोकतंत्र सभी का है उसी तरह पर्यावरण भी सभी का होना चाहिए. कानपुर में ये इतना उपद्रव जो हुआ वो इसलिए हुआ क्योंकि सरकार की एक टीम कानपुर में मौजूद टैनरियों की बिजली काटने पहुँची थी.

सरकार ने इन टैनरियों पर पिछले 6 महीने से रोक लगा रखी है, ये रोक कुम्भ के पहले 15 दिसम्बर 2018 से लगाई गई, क्योंकि इन टैनरियों में चमड़े की टैनिंग की जाती है, और चमड़े की टैनिंग के दौरान इस्तेमाल होने वाले केमिकल कचरे और पानी के साथ मिलकर गंगा में जाते हैं, गंगा को प्रदूषित करते हैं.

इस रोक के बावजूद भी गंगा प्रदूषण इकाई ने कई बार सरकार और पॉल्यूशन कण्ट्रोल बोर्ड से शिकायत करते हुए कहा कि प्रतिबन्ध के बाद भी टैनरियों को गुपचुप तरीके से चलाया जा रहा है. यही वज़ह रही कि जिलाधिकारी की तरफ से कुल 225 टैनरियों की बिजली काटने का आदेश दिया गया.

पॉल्यूशन कण्ट्रोल बोर्ड के आदेश पर जिलाधिकारी ने इस काम के लिए 5 टीमों का गठन किया, लेकिन जैसे ही ये टीमें पुलिस बल के साथ बिजली काटने पहुँची, टैनरियों के संचालकों और कर्मचारियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी, विरोध शुरू कर दिया. टैनरियों को चलाने वालों का कहना है कि सरकार के कहे मुताबिक़ कुम्भ के बाद टैनरियों को फिर से शुरू कर दिया जाना था लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

नतीजतन इन टैनरियों में काम करने वाले मजदूरों ने दिल्ली-लखनऊ हाईवे को जाम कर दिया. ये सब हुआ विश्वकर्मा गेट और जाजमऊ नई चुंगी के पास. मौके पर मौजूद 15 थानों की पुलिस, पीएसी बल और डीएम, एसपी आदि अधिकारी सभी चुपचाप खड़े देखते रहे, और कुल 4 घंटों तक ये मनमानी चलती रही.

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ये सड़क पर नमाज़ अदा करते रहे. कई किलोमीटर तक गाड़ियों की कतारें लगी रहीं. गाड़ियों, बसों में फंसे बच्चों का और महिलाओं का गर्मी से बुरा हाल हो गया. किसी औरत ने अपने दुधमुहे को सीने से चिपका लिया तो किसी ने साड़ी के पल्लू से ढँक लिया. दुकानदारों ने रस्सियों के सहारे जाम में फंसे लोगों तक पानी और खाने का सामान पहुंचाया.

लोग बसों से उतरकर पैदल जाने लगे. बच्चों के घर वाले गोद में उठाकर उन्हें घर ले जाने लगे. मरीज को भी परिजनों ने गोद में उठाकर हस्पताल तक पहुंचाया लेकिन उन्हें नहीं हटना था वो नहीं हटे. इस जाम का नतीजा पूरे शहर को भुगतना पड़ा. इसके चलते हमीरपुर रोड, श्याम नगर बाईपास, नौबस्ता चौराहा, बर्रा बाईपास, कल्यानपुर, रावतपुर जैसे इलाकों में भी भरी दोपहर लंबा जाम लगा रहा.

इस तरह के उपद्रव की, विरोध प्रदर्शन की जो घटनाएं अक्सर हमें देखने को मिलती हैं, ये अपने पीछे बहुत से सवाल छोड़ जाती हैं. ऐसे सवाल जिनके जवाब ना पुलिस दे पाती है ना सरकार, ना प्रदर्शनकारी और ना ही इस प्रदर्शन का नतीजा भुगतने वाले.

जिस लोकतंत्र ने इन प्रदर्शनकारियों को अधिकार दिए हैं, उसी लोकतंत्र ने दूसरों को भी सामान अधिकार दिए हैं. इन्हें क्यों समझ नहीं आता कि इनके अधिकार हमेशा दूसरों के अधिकारों को मारते क्यों हैं? दूसरों को परेशान ही क्यों करते हैं?

आपका कौनसा अधिकार ये कहता है कि आप सुरक्षाबलों पर पथराव कर दो? कौनसा अधिकार ये कहता है कि अपनी बात मनवाने के लिए इस तरह के उपद्रव को चुन लो? पर्यावरण को बचाने का जिम्मा क्या सिर्फ सरकार का ही है? जिस दुनिया में तुम रहते हो क्या वो सिर्फ तुम्हारी ही है? और अगर ये दुनिया सिर्फ तुम्हारी भी है तो फिर तुम इसे बचाने की बात पर आगे क्यों नहीं आते? क्यों गंगा को साफ़ रखने की ज़रुरत तुम्हें समझ नहीं आती. और क्यों तुम्हें समझ नहीं आता कि बेगुनाह बच्चों को, औरतों को और बीमारों को परेशान कर के अदा की गई नमाज़ खुदा ने सुनी ही नहीं होगी?

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