सालों साल रिसर्च करने के बाद JNU को दिया क्या है इन क्रांतिकारियों ने?

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JNU में बढ़ी फीस को लेकर बवाल थमने का नाम नहीं ले रहा है. सोशल मीडिया पर लाल तशरीफ़ वाले जेएनयू छात्रों की तस्वीरें वायरल हो रही है. छात्राओं की केजरीवाल टाइप कालजयी पोज में तस्वीरें वायरल हो रही है. तरह तरह के मीम्स भी छाये हुए हैं. लेकिन फिर भी छात्र झुकने को तैयार नहीं. ये तो हुई मज़ाक की बातें लेकिन विषय गंभीर है और इसपर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए और इसके लिए आपको अंत तक ये विडियो देखना पड़ेगा.

ये कोई ऐसा मुद्दा नहीं था जिसे बैठ कर नहीं सुलझाया जा सकता था. बात कर ये मुद्दा आराम से हल हो सकता था. यूनिवर्सिटी प्रशासन का कहना है कि तीन दशक से हॉस्टल फीस को नहीं बढाया गया था. तीन दशक यानी कि 30 साल. सिर्फ इतनी सी बात JNU प्रशासन तक पहुंचानी थी कि चलो अगर तीन दशकों से नहीं बढ़ी फीस को बढाने की इतनी ही जरूरत आन पड़ी है तो BPL छात्रों के लिए इसे जस का तस रखा जाए. बाकी जो संपन्न पृष्ठभूमि से आने वाले छात्र हैं उन्हें ये चार्ज देने में कोई दिक्कत नहीं है.

ऐसा नहीं है कि JNU में सिर्फ गरीब छात्र ही पढ़ते हैं. वहां अमीर छात्र भी पढने आते हैं. अमीर पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों को हर महीने इतना चार्ज भरने में कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए लेकिन हाँ जो गरीब है उनके लिए सोचा जाना चाहिए. इसमें कोई शक नहीं कि गरीब पृष्ठभूमि से आने वाले छात्रों के लिए ये बहुत ज्यादा है. बहुत से परिवार ऐसे भी हैं जिनकी मासिक आय 12,000 रुपये या इससे भी कम है. उनके लिए सोचा जाना चाहिए.

लेकिन अगर JNU में कोई मुद्दा बात करने से सुलझ जाए वो उसके JNU से होने पर लानत है. बिना क्रांति किये तो JNU वाले एक हफ्ता नहीं रह सकते.

सबसे पहले जब हॉस्टल चार्ज बढाने की घोषणा हुई तो सिंगल सीटर रूम का फीस 20 रुपये से बढाकर 600 रुपये और डबल सीटर रूम का फीस 10 रुपये से बढाकर 300 रुपये कर दिया गया. वन टाइम मेस सिक्योरिटी चार्ज जो पहले 5500 था उसे बढ़ाकर 12,000 रुपये कर दिया गया. इसके अलावा हर महीने सर्विस चार्ज 1700 रुपये कर दिया गया. पहले सर्विस चार्ज नहीं लिया जाता था. उसके अलावा बिजली का बिल भी देना पड़ेगा अब से.

उसके बाद छात्रों का विरोध शुरू हुआ तो इसे रिवाइज्ड किया गया. विरोध करने के लिए गरीब छात्रों का हवाला दिया गया था इसलिए फीस स्ट्रक्चर को जब रिवाइज्ड किया गया तो बस BPL छात्रों के लिए रिवाइज्ड किया गया. बाकी अमीर छात्रों के लिए जस का तस रखा गया. BPL छात्रों के लिए फीस स्ट्रक्चर को रिवाइज्ड कर के सिंगल सीटर रूम का फीस जिसे बढ़ा कर 600 किया गया था उसे 300 किया गया और डबल सीटर रूम का फीस जिसे बढ़ा कर 300 किया गया था उसे 150 कर दिया गया. मेस सिक्योरिटी चार्ज को वापस 5500 पर लाया गया, बिजली बिल 50 फीसदी देना होगा और सर्विस चार्ज को भी 50 फीसदी पर ले आया गया.

अगर आप JNU की वेबसाईट पर जा कर साल 2017-18 का एनुअल रिपोर्ट देखें तो आप पायेंगे कि उस साल यूनिवर्सिटी की कुल कमाई 383 करोड़ थी और खर्च हुआ 556 करोड़. खर्च और कमाई का गैप था 172 करोड़. 383 करोड़ की कमाई में छात्रों की फीस का योगदान मात्र 10 करोड़ था.

इस रिपोर्ट से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि JNU फंड की कितनी कमी से जूझ रहा है. तो इस फंड की कमी को कैसे दूर किया जाए ? कहा जाता है कि JNU में गंगा ढाबा के पत्थरों पर बैठ कर देश की अर्थव्यवस्था और दुनिया के मुद्दे डिस्कस होते हैं और ये डिस्कसन भी एक तरह से JNU छात्रों के रिसर्च का हिस्सा होता है. लेकिन दुनिया की अर्थव्यवस्था डिस्कस करने वाले छात्र क्या इस बात पर कभी रिसर्च कर पाए कि क्या उपाय कर के JNU की फंड की कमी को पूरा किया जाए? यहाँ से निकलने वाले छात्र तो अर्थव्यवस्था का नोबेल जीत जाते हैं. लेकिन ये जो कमाई और खर्च में 172 करोड़ का गैप है उसे कैसे भरा जाए, इसका कोई मॉडल उनकी रिसर्च से नहीं निकल सका है.

ऐसा नहीं है कि फंड की कमी से सिर्फ जेएनयू ही जूझ रहा है. IIT और IIM जैसे संस्थाओं में भी ये दिक्कत है. लेकिन उन्होंने अपनी दिक्कतों को दूर करने के उपाय भी खुद करने शुरू किये हैं. IIT बॉम्बे ने 1992 के सिल्वर जुबली अलमनाई बैच से 9.5 करोड़ रुपये जुटाए. इस बैच के 171 छात्रों ने पैसा दिया. यह रकम रिसर्च सेंटर, कैंपस इन्फ्रास्ट्रक्चर, फैकल्टी और स्टूडेंट डिवेलपमेंट, चेयर प्रफेसरशिप, इनोवेशन और आंत्रप्रन्योरशिप पर खर्च की जा रही है.

आईआईटी बॉम्बे ने एक डेडिकेटेड टीम बनाई है जिसका काम पुराने अलमनाई से फंडिंग जुटाना है. 1992 की बैच से 9 करोड़ का आंकड़ा 1993 बैच से 25 करोड़ तक पहुँच गया. मद्रास और खड़गपुर ने भी अपने पुराने अलमनाई से अच्छी खासी फंडिंग जुटा रहे है.

ऐसा नहीं है कि IIT और IIM में गरीब बच्चे नहीं पढ़ते. वहां भी गरीब बच्चे पढ़ते हैं वो भले ही नोबेल नहीं जीतते लेकिन हाई पॅकेज पर सेलेक्ट हो कर या फिर अपना स्टार्टअप खोल कर 40-50 बच्चों को नौकरी जरूर दे देते हैं. लेकिन सालों बाद भी आप जेएनयू के छात्रों को रिसर्च करते और क्रांति करते ही देखेंगे. जेएनयू  वालों का तर्क ये है कि वो इस पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा नहीं बनना चाहते, वो इस सिस्टम से सवाल करना चाहते हैं. इसलिए सबको उनसे दिक्कत है? लेकिन क्या जेएनयू वालों के नोबेल से देश चलेगा, सिस्टम से सवाल करने से देश चलेगा या देश की अर्थव्यवस्था चलेगी, जेएनयू वालों की क्रांति से देश चलेगा? देश की इकॉनमी चलेगी? खुद सोचिये?