अगर इनकी प्लानिंग फेल ना हुई होती तो गांधी आज राष्ट्रपति ना होते! पढ़िए ये पूरी रिपोर्ट

आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वालों में एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसका प्लान अगर कामयाब हुआ होता, साथी ने गद्दारी नहीं की होती तो देश को ना गांधी की जरूरत पड़ती और ना बोस की। देश भी 32 साल पहले ही यानी 1915 में आजाद हो गया होता। उस दौर का हीरो था वो, जब खौफ में लोग घरों में भी सहम कर रहते थे, वो अकेला जहां अंग्रेजों को देखता, उन्हें पीट देता था, यतीन्द्रनाथ मुखर्जी के बारे में यही मशहूर था।
एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्रनाथ ने अकेले ही आठ आठ अंग्रेजों को पीट दिया था। बलिष्ठ देह के स्वामी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी साथियों के बीच बाघा जतिन के नाम से मशहूर थे। बंगला के नादिया में पैदा हुए थे, जतिन जो अब बांग्लादेश में है।


11 साल की उम्र में ही उन्होंने शहर की गलियों में लोगों को घायल करने वाले बिगड़ैल घोड़े को काबू किया, तो लोगों ने काफी तारीफ की। उनकी मां कवि स्वभाव की थीं, और वकील मामा के क्लाइंट रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ उनके परिवार का अक्सर मिलना होता था। जतिन पर इस सबका बहुत प्रभाव पड़ा। उनके बलिष्ठ शरीर और चैरिटेबल कामों की चर्चा होने लगी। दूसरी तरफ वो ध्रुव, प्रहलाद, हनुमान और राजा हरिश्चंद्र जैसे रोल नाटकों में करने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक भारतीय का अपमान करने पर एक साथ चार अंग्रेजों को पीट दिया। अंग्रेज उनसे उलझने से बचने लगे।
कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में पढ़ने के दौरान वो स्वामी विवेकानंद के पास जाने लगे,विवेकानंद के सम्पर्क में आकर उनके अंदर ब्रहम्चारी रहकर देश के लिए कुछ करने की इच्छा तेज हुई। फिर वो 1899 में मुजफ्फरपुर में बैरिस्टर पिंगले के सेक्रेटरी बनकर पहुंचे, जो बैरिस्टर होने के साथ-साथ एक इतिहासकार भी था, जिसके साथ रहकर जतिन ने महसूस किया कि भारत की एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए। शायद यह भारत की नेशनल आर्मी बनाने का पहला विचार था। जो बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के चलते अस्तित्व में आई
एक बार उनके गांव में एक तेंदुए का आतंक है, तो वो उसे जंगल में ढूंढने निकल पड़े, लेकिन सामना हो गया रॉयल बंगाल टाइगर से। वो खतरनाक बाघ देखकर ही कोई सदमे से मर जाता, लेकिन जतिन ने उसको अपनी खुखरी से मार डाला। बंगाल सरकार ने एक समारोह में सम्मानित किया।
अंग्रेजी अखबारों में जमकर उनकी तारीफ हुई, लोग उन्हें बाघा जतिन के नाम से पुकारने लगे। इसी बीच 1905 में हुआ कलकत्ता में प्रिंस ऑफ वेल्स का दौरा हुआ, ब्रिटेन के राजकुमार। अंग्रेजों की बदतमीजियों से खार खाए बैठे जतिन ने प्रिंस के सामने ही उनको सबक सिखाने की ठानी। प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत जुलूस निकल रहा था। एक गाड़ी की छत पर कुछ अंग्रेज बैठे हुए थे, और उनके जूते खिड़कियों पर लटक रहे थे, गाड़ी में बैठी महिलाओं के बिलुकल मुंह पर। भड़क गए जतिन और उन्होंने अंग्रेजों से उतरने को कहा, लेकिन वो नहीं माने तो ऊपर चढ़ गए बाघा जतिन और एक-एक करके सबको पीट दिया। तब तक पीटा जब तक कि सारे नीचे नहीं गिर गए।
चूंकि ये घटना प्रिंस ऑफ वेल्स की आंखों के सामने घटी थी, तो अंग्रेज सैनिकों का भारतीयों के साथ ये बर्ताव उनके साथ सबने देखा। भारत सचिन मार्ले को पहले ही इस तरह की कई शिकायतें मिल चुकी थीं। बाघा जतिन की बजाय उन अंग्रेजों को ही दोषी पाया गया, लेकिन इस घटना से तीन बड़े काम हुए। अंग्रेजों के भारतीयों के व्यवहार के बारे में उनके शासकों के साथ-साथ दुनियां को भी पता चला, भारतीयों के मन से उनका खौफ निकला और बाघा जतिन के नाम के प्रति क्रांतिकारियों के मन में सम्मान और भी बढ़ गया।
इसी बीच एक दिन सिलीगुड़ी स्टेशन पर फिर अंग्रेजों के एक मिलिट्री ग्रुप से उनकी भिड़ंत हो गई। कैप्टन मर्फी की अगुवाई में अंग्रेजों ने जतिन से बदतमीजी की, तो जतिन ने अकेले उन आठों को जमकर मारा।


इंगलिश न्यूज पेपर्स में उनका मजाक बनाया गया, कि अकेले भारतीय ने आठ अंग्रेज मिलिट्री ऑफीसर्स को जमकर पीटा। मजिस्ट्रेट ने भी उन अफसरों से कहा कि केस वापस ले लो, जतिन ने खेद जता दिया, लेकिन इस चेतावनी के साथ कि अगर मेरे देश के लोंगों के साथ ऐसा होगा तो मैं भी ऐसे ही करूंगा। बाद में जतिन से उसने पूछा भी कि तुम कितने लोगों को एक साथ पीट सकते हो? तो जतिन का जवाब था, ईमानदार हो तो एक भी नहीं, बेईमानों की गिनती नहीं।
जतिन मुखर्जी ने अलग-अलग नामों से कई संस्थाएं शुरू कीं, कोई कॉटेज इंडस्ट्री के लिए काम कर रही थी। कोई वयस्कों के लिए नाइट स्कूल चला रही थी, होम्योपैथी डिस्पेंसरीज खोल रही थी, एग्रीकल्चर में एक्सपेरीमेंट के लिए काम कर रही थीं, यहां तक कि सर डेनियल की मदद से जतिन ने कई स्टूडेंट्स को देश से बाहर पढ़ने के लिए भेजा। हेम दास और पांडुरंग एम बापट ने रूसी क्रांतिकारी/आराजकतावादी निकोलस सेफ्रांसकी से बम बनाने की ट्रेनिंग भी ली।
इसी बीच फोर्ट विलियम में तैनात जाट रेजीमेंट को भड़काने के आरोप में जतिन दा को गिरफ्तार कर लिया गया, ये इसलिए और भी अहम हो जाता है, क्योंकि उन दिनों फोर्ट विलियम से देश की सरकार चलती थी। उस वक्त कोलकाता अंग्रेजों की राजधानी थी। अंग्रेज सरकार बाघा जतिन, अरविंदो घोष, रास बिहारी बोस जैसे कई बंगाली क्रांतिकारियों से तंग आ गई थी, उसको कोलकाता सुरक्षित नहीं लग रहा था।
अंग्रेजों ने अगर अपनी राजधानी 1912 में कोलकाता से बदलकर दिल्ली बनाई तो इसकी बड़ी वजह ये क्रांतिकारी थे, उनमें शायद सबसे बड़ा नाम बाघा जतिन का था]
कई हथियारों की खेप जतिन की लीडरशिप में लूट ली गईं। लेकिन जतिन का नाम सामने नहीं आता था। सीक्रेट सोसायटी की इन्हीं दिनों भारतीयों पर अन्याय करने वाले सरकारी अधिकारियों चाहे अंग्रेज हों या भारतीयों को मारने का ऑपरेशन भी शुरू कर दिया, लेकिन एक सरकारी वकील और अंग्रेज डीएसपी को खत्म किया गया, तो एक क्रांतिकारी ने जतिन का नाम उजागर कर दिया।
वायसराय लॉर्ड मिंटो ने उस वक्त कहा था, “ A spirit hitherto unknown to India has come into existence , a spirit of anarchy and lawlessness which seeks to subvert not only British rule but the Governments of Indian chiefs. “ । इसी स्प्रिट को बाद में इतिहासकारों ने ‘जतिन स्प्रिट’ का नाम दिया। जतिन को डीएसपी के मर्डर के आरोप में गिरफ्तार किया गया, फिर जाट रेजीमेंट वाली हावड़ा कॉस्पिरेसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया, राजद्रोह का आरोप लगाया गया। जितने दिन जतिन पर ट्रायल चला उतने दिन जतिन ने साथी कैदियों के सहयोग से अपने संपर्क एक नए प्लान में लगाए। ये शायद उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा प्लान था, देश को आजाद करवाने का प्लान।
इतिहास में इसे ‘जर्मन प्लॉट’ या हिंदू-जर्मन कांस्पिरेसी के नाम से जाना जाता है। अगर वो कामयाब हो जाता तो देश को ना बोस की जरूरत पड़ती और ना गांधी की। इधर जतिन की कई सीक्रेट समितियों में अंग्रेज कोई कनेक्शन साबित नहीं कर पाए और जतिन को छोड़ना पड़ा, लेकिन अलीपुर, हावड़ा, जाट रेजीमेंट, डीएसपी मर्डर जैसे कई केसेज में जतिन का नाम आने से जतिन के लिए अब खुलकर काम करना मुश्किल हो चला था। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और उन्होंने एक रेलवे लाइन से जुड़ा एक कॉन्ट्रेक्ट ले लिया।


इधर, अंग्रेजों ने राजधानी 1912 में बदल ही ली। रास बिहारी बोस और विश्वास ने हाथी के ऊपर बैठकर दिल्ली में घुसते गर्वनर लॉर्ड हार्डिंग के ऊपर चांदनी चौक में बम फेंका तो जतिन के लिए भी उस साल मुश्किल हो गई, रास बिहारी अंडरग्राउंड हो गए। 1913 में जब दामोदर नदी में बाढ़ आई तो जतिन ने बड़े पैमाने पर राहत कार्य शुरू किए, रास बिहारी भी उनकी मदद के लिए आ गए। दोनों ने मिलकर 1857 जैसा विद्रोह फिर से करने की योजना बनाई।
सुभाष चंद्र बोस से पहले रास बिहारी ने जतिन में ही असली नेता पाया था। जतिन का औरा भी इंटरनेशनल था। जतिन दुनियां भर में फैले भारतीय क्रांतिकारियों के संपर्क में थे।
प्रथम विश्व युद्ध जिसके लिए गांधीजी अंग्रेजी सेना के लिए भर्ती अभियान चला रहे थे, उनको भर्ती करने वाला सार्जेन्ट भी कहा गया था। उस विश्व युद्ध को क्रांतिकारियों ने अपने लिए सुनहरा मौका माना। वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय के नेतृत्व में ज्यूरिख में बर्लिन कमेटी बनाई गई, तो लाला हरदयाल, सोहन सिंह भाखना ने गदर पार्टी ने अमेरिका और कनाडा के सिख क्रांतिकारियों को लेकर गदर पार्टी शुरू की और भारत में इसकी कमान जुगांतर पार्टी के नेता बाघा जतिन के हवाले थी। अब तैयार हुआ जर्मन प्लॉट, जर्मनी से हथियार आना था, और पैसा चुकाने के लिए जतिन के साथियों ने कई डकैतियां डालीं।
बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिंगापुर जैसे कई ठिकानों में 1857 जैसे सिपाही विद्रोह की योजना बनाई गई। फरवरी 1915 की अलग-अलग तारीखें तय की गईं, पंजाब में 21 फरवरी को 23 वीं कैवलरी के सैनिकों ने अपने ऑफीसर्स को मार डाला। लेकिन उसी रेंजीमेंट में एक विद्रोही सैनिक के भाई कृपाल सिंह ने गद्दारी कर दी और विद्रोह की सारी योजना सरकार तक पहुंचा दी। सारी मेहनत एक गद्दार के चलते मिट्टी में मिल गई।
अगले दिन पंजाब मेल को हावड़ा में लूटने की प्लानिंग थी, लेकिन पंजाब सीज कर दिया गया, ट्रेन कैंसल कर दी गई। आगरा, लाहौर, फिरोजपुर, रंगून में विद्रोह सूचना लीक हो जाने की वजह से दबा दिया गया। रास बिहारी बोस ने दो दिन पहले यानी 19 फरवरी को ही विद्रोह करवाने की कोशिश की, लेकिन उतनी कामयाबी नहीं मिली। मेरठ और बनारस में भी विद्रोही नेता गिरफ्तार कर लिए गए। केवल सिंगापुर में पांचवी लाइट इनफेंट्री में विद्रोह कामयाब रहा, लेकिन केवल एक हफ्ते तक। ऑपरेशन फेल हुआ तो रास बिहारी बोस को सुरक्षित जापान रवाना कर दिया गया। गदर पार्टी के कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, काला पानी की सजा दी गई।
लेकिन बाघा जतिन अभी भी अंडरग्राउंड रहकर क्रांतिकारियों के बीच एक्टिव थे, योजना बनी कि जर्मनी से जो हथियार आएंगे वो अप्रैल 1915 में उड़ीसा का बालासोर तट पर उतरेंगे, वहां से तीस किलोमीटर दूर मयूरभंज में जतिन को भेजकर अंडरग्राउंड कर दिया गया। हथियारों की खेप मंगाने के लिए एक फर्जी कंपनी यूनीवर्सल एम्पोरियम भी खड़ी कर दी गई।
इधर जतिन ने नरेन भट्टाचार्य यानी एमएन रॉय को जर्मनी के अधिकारियों के पास हथियारों की बातचीत के लिए भेजा, उनको बताया गया कि हथियारों की खेप निकल चुकी है, लेकिन एक चेक जासूस इमेनुअल विक्टर वोस्का, जो डबल एजेंट भी था, अमेरिका के लिए भी काम करता था, को भनक लगी और उसने सारा खेल खराब कर दिया।


चेक के ही रॉस हेडविक ने बाद में लिखा कि ‘इस प्लान में अगर इमेनुअल विक्टर वोस्का ना घुसता तो किसी ने भारत में गांधी का नाम तक ना सुना होता और राष्ट्रपिता बाघा जतिन को कहा जाता।‘वहां से खबर अमेरिका को मिली, अमेरिका से अंग्रेजों को मिली, इंगलैंड से खबर भारतीय अधिकारियों के पास आई और उड़ीसा का पूरा समुद्र तट सील कर दिया गया। उस वक्त ऐसा कोई संचार साधन नहीं था कि समंदर में जहाज को खबर हो पाती।
इधर, पुलिस को सुराग मिला कि जतिन और उसके साथी कप्टिपाड़ा गांव में हैं। जतिन के साथ मनोरंजन और चित्तप्रिया थे। वहां से वो निकल भागे, जतिन और उनके साथी जंगलों की तरफ भागे, अंग्रेजों ने जतिन पर भारी इनाम का ऐलान कर दिया, अब गांव वाले भी उन्हें ढूंढने लगे। इधर भारी मात्रा में जर्मन हथियार बरामद कर लिया गया। क्रांति फेल हो चुकी थी। सपना मिट्टी में मिल चुका था।
तो ये थी जतिन की जीवन की कहानी, विष्णु शर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह लेख उनकी किताब गुमनाम नायकों की गौरवशाली गाथाएं से लिया गया है।

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